Homeमन की बातमेरे इंदौर की सोनम और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट

मेरे इंदौर की सोनम और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की ‘विश्व जनसंख्या की स्थिति 2025’ की रिपोर्ट मंगलवार को आई। भारत की प्रजनन दर घटकर प्रति महिला 1.9 जन्म रह गई है जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है। सरल शब्दों में देश में महिलाएँ जनसंख्या के आकार को बनाए रखने के लिए आवश्यक स्तर से कम बच्चे पैदा कर रही हैं। बढ़ती जनसंख्या के आँकड़ों से डरे देश के लिए यह सुकून भरी बात हो सकती है लेकिन चिंताजनक भी है। पहले सात पीढ़ियों की चिंता की जाती थी अब बच्चे ही पैदा नहीं होंगे तो केवल अपने बारे में सोचना है। अपनी मर्जी से जीना है। ‘मुझे क्या चाहिए’ यह सोच हावी हो रही है और ‘मेरे लिए क्या सही है’ इस सोच को पीछे धकेला जा रहा है। वैश्विक स्तर पर प्रजनन दर में कमी आई है मतलब वैश्विक स्तर पर ‘आज जी लो, आज में जी लो’ का चलन चल पड़ा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 15 से 49 वर्ष की आयु की 51 प्रतिशत भारतीय महिलाएँ गर्भनिरोधक का उपयोग कर रही हैं। मतलब वे बच्चे पैदा करने, न करने के अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। महिलाओं को यह आजादी मुबारक, लेकिन इस आजादी को वे ऐश करने से जोड़ रही हों तो गलत है। पर क्या गलत-क्या सही इसकी समझ भी तो विकसित होनी चाहिए।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की दो तिहाई (68 प्रतिशत) आबादी 15 से 64 वर्ष के आयु के बीच है, जो कि कामकाजी उम्र है। जबकि 65 वर्ष से अधिक आयु के लोग केवल 7 प्रतिशत हैं। घर में बड़े-बूढ़ों की संख्या कम हो गई है। यदि है भी तो संयुक्त परिवार नहीं रहे हैं। यदि सभी स्थितियाँ आदर्श हों तो बुजुर्गों के पास बैठने का समय किसके पास हैं। बच्चे भी मोबाइल में लगे हैं, बड़े भी और बूढ़े भी। हर कोई फ़िल्टर तस्वीरें देख रहा है। आत्म केंद्र के चरम पर पहुँच रहा है। दूरदर्शन नया-नया आया था तो उस पर जो दिखाया जाता था, पूरा परिवार वही देखता था। चयन का विकल्प किसी के पास नहीं था। कृषि दर्शन  से लेकर समाचारों तक सब साथ मिलकर देखते। समाचार भी चटकदार नहीं होते थे। दूरदर्शन के संयमित समाचार वाचक होते थे।

अब समाचार वाचक भी इतने जोर-शोर से खबरें सुनाते हैं कि न सुनना चाहें तो भी आप तक सारी खबरें पहुँच जाती हैं। रही-सही कसर सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम-यूट्यूब-व्हाट्स ऐप पूरी कर देते हैं। इंदौर के रघुवंशी दंपत्ति की खबर भी इतनी वायरल हो रही है कि उससे कोई अछूता नहीं रह पा रहा है। दंपत्ति के लापता होने से, पति की लाश मिलने और पत्नी के ही कातिल होने की खबर सबकी जुबान पर है। जो प्रेम उदात्त होना चाहिए वह प्रेम खून के उन्माद से भरा है। मजनू पर लोग पत्थर बरसाते थे, वहाँ से लेकर अब मजनू मार खाने के बजाय मार डालने पर आमादा है।

जहाँ आपके जीवन का पूर्वार्ध बीता हो, ताउम्र आप खुद को उसी गाँव-शहर का मानते हैं, आप उस ज़मीन पर अधिक विश्वास करते हैं। जैसे प्रेमी राज कुशवाह ने किया कि उसे लगा प्रेमिका सोनम उसके अपने शहर गाजीपुर में सुरक्षित रहेगी। सोनम की वजह से इंदौर का नाम उछला और लोगों ने कहा अरे देखो तुम्हारे इंदौर की सोनम। हाँ, मेरे इंदौर की सोनम। ऐसी-कैसी और कितनी आत्मकेंद्रित सोनम कि पति की हत्या के बाद इंदौर में आकर नौ दिन रुकी रही। सारी खबरें उस तक भी पहुँच ही रही होंगी। उसका प्रेमी दोनों परिवारों से मिल रहा था। दोनों परिवारों के हालात से प्रेमी-प्रेमिका वाकिफ थे पर पसीज नहीं रहे थे। टस से मस नहीं हो रहे थे, उन्हें कोई मलाल नहीं था। वे मामले के ठंडे होने का इंतजार कर रहे थे और यदि वे टूटते नहीं, तो मामला ठंडा हो भी जाता और शायद वे पकड़े भी नहीं जाते। पर इस बीच कई सवाल उठने लगे कि उसे राज से शादी करनी थी तो राजा से क्यों की? क्या अब उसके पिता को दिल का दौरा नहीं पड़ेगा, जिसका कारण देकर उसने राजा से शादी कर ली थी? पहले ही क्यों नहीं भागी? क्यों नहीं सोचा कि उसके एक कदम से कितने परिवार, कितने घर और कितने लोगों के जीवन तहस-नहस हो जाएँगे?

कुछ लोग इसे महिलाओं की बदलती स्थिति से जोड़ रहे हैं। हाँ यह भी सही है। पिछले कुछ सालों में अधिक से अधिक महिलाएँ घर की चार दीवारी से निकली हैं। कई लड़कियाँ स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। पर पढ़ने-शिक्षित होने और समझदार होने में अंतर है। जिस तेजी से लड़कियाँ हर मामलों में लड़कों में बराबरी कर रही है, वह भी चौंकाने वाला है। लड़के सिगरेट पीते हैं, तो हम भी पिएँगे, केवल सिगरेट ही नहीं शराब और गांजा भी। लड़के गालियाँ देंगे, तो हम भी देंगे। लड़कों का भी सिगरेट, शराब, अफीम-गांजा लेना, गालियाँ बकना गलत है, वह आज़ादी नहीं है। लेकिन सही-गलत की पहचान कर पाने की समझ ही विकसित नहीं हो रही है, या वे चाहते भी नहीं हैं। अभी इस पल के लिए जो सही लग रहा है, वह करना है। जोख़िम उठाना है, इंजॉय करना है, बस।

सत्तर के दशक में जया भादुड़ी की फिल्म ‘गुड्डी’ आई थी, उसकी प्रार्थना थी ‘हमको मन की शक्ति देना’। हमारी पीढ़ी जब टीन-एज में पहुँची तब तक भी स्कूलों का वातावरण, यूनिफॉर्म,प्रार्थना गीत लगभग वही था, दुनिया इतनी तेजी से नहीं बदल रही थी, जितनी अब बदल रही है। सुनने में आ रहा है कि सोनम ने माँ को आगाह किया था कि यदि उसकी शादी किसी और से करवाई तो पति का हाल कर देगी, और उसने कर भी दिया। हम स्कूल में थे तो डरा करते थे, शिक्षकों से, माता-पिता से और अब के माता-पिता बच्चों से डर रहे हैं। यदि बच्चों की नहीं सुनी तो वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। यह हमारी सहमी हुई पीढ़ी का समाज है जिसमें छोटे बच्चे अपनी बात मनवाने के लिए केवल हाथ-पैर पटककर रो-धो नहीं रहे बल्कि सबको खून के आँसु रुलाने पर तुले हैं।

अब हर दो साल के बाद की पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से अलग लग रही है। अधिक आत्मकेंद्रित होती जा रही है। मनोविज्ञान का सहारा लेकर पिछली पीढ़ी को कोस रही है। यकीकन वर्तमान पीढ़ी जैसा व्यवहार करती है, उसके लिए दोषी उसकी पिछली पीढ़ी ही होती है। हमारी पीढ़ी के हाथों में कॉमिक बुक्स थे, जो सच में खुली किताब थे, उसमें लॉक नहीं होता था कि कोई और देख ही नहीं पाए कि हम क्या पढ़-समझ रहे हैं पर हम ही थे जिन्होंने अपने बच्चों को छोटी उम्र में मोबाइल पकड़ा दिए। बच्चों ने उसमें अपने लॉक सेट कर लिए। वे उसमें क्या देख रहे हैं, हम उससे बेखबर हैं। छद्म दुनिया में जीने वाले बच्चे माता-पिता के सामने छद्म व्यवहार करने लगे। माता-पिता के सामने भोले और अच्छे बनने का स्वाँग वे इस बखूबी से करते हैं, कि बाहर वे क्या कर रहे हैं, उसकी भनक तक लगने नहीं देते। पति राजा को मारने के आधे घंटे बाद ही सास का फ़ोन आने पर उनसे सोनम इतने सहज तरीके से बात करती है, चहकती है, खिलखिलाती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

पहले की दुनिया कितनी आसान थी। राक्षस होते थे, जिनके सिर पर सींग होते थे और पहचान जाते थे कि यह राक्षस हैं। वे राक्षसी हँसी हँसते थे। उसके बाद फ़िल्मों में विलेन आने लगे तो वे भी उनके पहनावे, हाव-भाव, कुटिल हास्य से समझ में आ जाते थे कि ये विलेन हैं। नब्बे के दशक में शाहरुख खान की मूवी ‘बाजीगर’ आई और जैसे दृश्य परिवर्तन ही हो गया। वह नायक है, जो वास्तव में खलनायक है। सब गड्डमड्ड हो गया। अब भेद करना मुश्किल था। ऐसा कतई नहीं है कि सिनेमा से ही लोग बिगड़ते हों। कभी साहित्य समाज का दर्पण होता था, अब सिनेमा या छोटा-बड़ा परदा वह दर्पण गढ़ रहा है, जिसमें समाज अपना चेहरा देखना चाहता है, और वैसा ही जैसा वह दिखा रहा है। ग्लैमर में जीना है। पहले लोग दूसरों के बारे में सोचते थे, अब सब केवल अपना विचार कर रहे हैं। पहले कहा जाता था कि बुरे काम का बुरा नतीजा। अब बुरे काम का बुरा नतीजा क्यों हुआ उसके लूप-होल्स पर चर्चा हो रही है और बुरा काम करने वाले उससे बचने के रास्ते तलाश रहे हैं। सोनम की योजना पुख्ता थी कि लाश बहकर बंगाल की खाड़ी में जा सकती थी और वह नेपाल भाग सकती थी। कुछ समय बाद लौटकर बता सकती थी कि उसका भी अपहरण हुआ था और सिम्पैथी कार्ड खेलते हुए अपने प्रेमी से शादी कर सकती थी। अपराध से जुड़े कितने ही धारावाहिक उसे किस तरह प्लानिंग की जाए, योजना बनाई जाए की ट्रेनिंग देने वाले साबित हुए होंगे। अब उसकी योजना में कहाँ गड़बड़ हुई तो उनमें से एक साथी ने किराए का स्कूटर लेते हुए अपना सही आईकार्ड (पहचान पत्र) दे दिया। समाचार बताने वाले इसे बता रहे हैं, सीख लेने वाले ले रहे हैं कि – अरे नकली पहचान पत्र देना था। वे यह नहीं सीख रहे कि गलत काम किया तो आज नहीं तो कल पकड़े जाएँगे, वे सीख रहे हैं कि काम को और अधिक सफाई से करना है।

‘सोनम बेवफा है’ से लेकर जाने कितने मीम बन रहे हैं कि शादी करने से पहले सावधान हो जाओ। मतलब बिना शादी किए भी, ऐश की जा सकती हैं, बच्चे पैदा करने का झंझट भी नहीं। हर चीज को कितने हल्के में लिया जा रहा है। किसी बात की कोई गंभीरता नहीं रही। सोनम ने अपने बैंक के खाते से व्यावसायिक कातिलों को पैसा दिया, सुपारी दी। वे भी 20-25 की उम्र के आसपास के युवा हैं, जिन्हें झट से पैसा मिल रहा हो तो उन्होंने भी हाँ कह दी। आराम से जिंदगी काटने की सोच है। मेहनत से पैसा कमाना भी अब भला कौन चाहता है?

अब यूएनएफपीए की मंगलवार की रिपोर्ट पर फिर आते हैं। सोनम खुद कमा रही थी, जैसे कि रिपोर्ट भी बता रही है कि कामकाजी उम्र के लोग भारत में ज्यादा हैं। उसे अपने पैसों का हिसाब किसी को देना नहीं था। यह जो किसी को हिसाब नहीं देना का फलसफा चल पड़ा है वह भी नुकसान पहुँचा रहा है। सोनम ने जिस दिन राजा को मारा उस दिन के बारे में वह सास से फोन पर कहते सुनी गई कि ग्यारस (एकादशी) का व्रत है। एक ओर भगवान् के नाम पर व्रत किया, दूसरी ओर कत्ल किया। भगवान् को भी हिसाब नहीं देना क्योंकि तर्क का गणित है, ‘मानो तो गंगा माँ, न मानो तो बहता पानी’। डर ही चला गया है, भगवान् का डर, बड़े-बूढ़ों का डर, घर-परिवार के लोगों का डर, समाज का डर, कानून का डर।

अच्छी बात है कि आत्मविश्वास बढ़ा है पर हमारी पीढ़ी को यह अधिक खौफनाक लग रहा है कि आज की पीढ़ी को किसी बात का डर नहीं रहा, उन पर किसी का अंकुश नहीं रहा। हम डर रहे हैं और हमारे बच्चे हमें ब्राउन पैरेंट्स कह धता दिखा रहे हैं। वे कह रहे हैं कि कुछ नहीं होता, हम अधिक चिंता करते हैं। कूल रहना उनकी फितरत हैं। वे और चार मीम्स बनाएँगे सोनम और राज और राजा ने भी क्या बेवकूफियाँ कीं, उस पर कंधे उचकाएँगे। समाचारों के लिए कल कोई और सनसनीखेज खबर होगी और सोनम को सब भूल जाएँगे। अच्छा है ये लोग न बच्चे पैदा करेंगे, न इनसे इनके बच्चे किसी बात का हिसाब माँगेंगे तो मतलब इन्हें किसी को किसी बात का कोई हिसाब नहीं देना है, इनकी कोई अकाउंटेबिलिटी ही नहीं है।

(लेखिका कई समाचार पत्रों में अपनी सेवाएँ दे चुकी है और इन दिनों स्वतंतर् लेखन कर रही है) 

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