प्रोफेसर अंगस मेडिसन के आंकड़े ईसा के जन्म से प्रारंभ होते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार पहली सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का हिस्सा 33% से अधिक था। अर्थात विश्व के कुल व्यापार का एक तिहाई व्यापार हम कर रहे थे। अगले हजार – डेढ़ हजार वर्ष, वैश्विक व्यापार में अपना सर्वोच्च स्थान अबाधित था। मुस्लिम आक्रांताओं ने किए हुए अत्याचारों के कारण, और बाद में अंग्रेजों ने ध्वस्त की हुई व्यवस्थाओंके कारण, वैश्विक व्यापार में हमारी हिस्सेदारी कम होती गई।
अर्थात ईसा पूर्व कालखंड का अध्ययन किया, तो साधारणतः दो हजार से ढाई हजार वर्ष, हम वैश्विक व्यापार में निर्विवाद रूप से सर्वोच्च स्थान पर थे। हमारा निर्यात जबरदस्त था।
इसका दूसरा अर्थ यह है, कि हमारे जहाज भारत में तैयार हुआ माल लेकर दुनिया के हर कोने में जाते थे, व्यापार करते थे और भारत में समृद्धि, संपन्नता लाते थे।
लेकिन हम सबको बचपन में शाला में क्या पढ़ाया गया? ‘भारत की खोज’ वास्को डी गामा ने सन 1498 में की’। ऐसा विकृत इतिहास हमने पढ़ा। यह हमारा दुर्भाग्य है..!
हजारों वर्ष पहले हम नौकायन क्षेत्र में अत्यंत प्रगत थे। उस समय के अत्याधुनिक जहाज हम बनाते थे। हमने तैयार किए हुए जहाज,
हम अन्य देशों को बेचते भी थे। हमारा समुद्र का दिशा-ज्ञान बहुत अच्छा था। लगभग सवा दो हजार वर्ष पूर्व, भारतीय नाविक जिस ‘दिशा दर्शक’ (मरीन कंपास) का उपयोग करते थे, वह उपलब्ध है। उसे ‘मच्छ यंत्र’ कहते थे। ऐसे ही दिशा की अचूकता नापने के लिए, दो बिंदुओं के बीच के कोण का मूल्य निकालना होता है। यह काम करने वाला यंत्र, वर्तमान में सेक्सटंट (Sextant) कहलाता है। हमारे नविक ऐसे यंत्र का उपयोग करते थे। इसका नाम था, ‘वृत्त शंख भाग’।
कुल मिलाकर, व्यापार के लिए हमारे उद्योगपति, व्यापारी और नाविकों ने दुनिया भर में संचार किया। विश्व में अनेक स्थानों पर पहली बार हमारे व्यापारी गए हैं। प्राचीन भारत के व्यापार के संदर्भ में कई लोगों ने लिखकर रखा है। उसमें पश्चिमात्य प्रवासी प्रमुखता से है।
सिझर ऑगस्टस, (ईसा पूर्व 63 वर्ष – वर्ष 14) इस प्रसिद्ध राजा के राज्य शासन में ‘स्ट्राॅबो’ नाम का ग्रीक इतिहासकार था। उसने उस समय बहुत प्रवास किया। स्ट्राॅबो ने लिखकर रखा है कि, ‘सीजर ऑगस्टस के समय भारत का रोम से बहुत व्यापार होता था। उस कालखंड में लगभग 120 जहाज प्रतिवर्ष भारतीय माल लेकर केवल रोम साम्राज्य में, इजिप्त होते हुए, जाते थे।
इजिप्त में उस समय दो प्रमुख बंदरगाह थे। मायोस हार्मोस (Mayos Hormos) और बेरेनिके (Berenike / Berenice)। इनमें से बेरेनिके का उल्लेख ‘भारतीय ज्ञान का खजाना’ में आया है। बेरेनिके इजिप्त का प्राचीन बंदरगाह था। टोलेमी (द्वितीय) ने अपनी मां की स्मृति में इसको बनवाया था। नब्बे के दशक में यहां उत्खनन प्रारंभ हुआ। अनेक देश और अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं मिलकर यह उत्खनन कर रहे हैं। विश्व के सभी उत्खननों में यह सबसे बड़ी परियोजना है। यहां अभी भी उत्खनन चल रहा है।
लगभग 20 वर्ष पहले, इस उत्खनन में 8 किलो काली मिर्च, भारतीय बाटिक प्रिंट के वस्त्र ऐसी अनेक वस्तुएं, एक बड़े लकड़ी के बक्से में मिली थी। इस सशक्त प्रमाण के मिलने से, ‘भारत का यूरोप से व्यापार करने का मसाला मार्ग (Spice Route – समुद्री मार्ग) था’, यह सिद्ध हुआ।
कोरोना के बाद प्रारंभ हुए उत्खनन में, मार्च 2022 में, बेरेनिके में बुद्ध की एक मूर्ति मिली। आधुनिक तकनीकी का उपयोग करते हुए उस मूर्ति की आयु निकाली गई। वह वर्ष 90 से वर्ष 140 (पहले और दूसरे सदी के मध्य) इस कालखंड की निकली। इसी स्थान पर संस्कृत में लिखा हुआ एक शिलालेख मिला है, जो तत्कालीन रोमन सम्राट ‘फिलिप द अरब’ (वर्ष 204 से 249। इसमे सम्राट पद का कालखंड है – वर्ष 244 से 249, अर्थात तीसरी सदी) को संबोधित करते हुए लिखा है। साथ ही यहां सातवाहन राजवंश के सिक्के मिले हैं, जो दूसरे सदी के है।
दक्षिण भारत में पुडुचेरी (पांडिचेरी) के पास एक बंदरगाह है, अरिकामेडू (Arikamedu)। इसका प्राचीन नाम है पोदुके (Poduke)। यहां नब्बे के दशक में उत्खनन प्रारंभ हुआ, और भारत रोम व्यापार के अनेक प्रमाण मिले। रोमन शैली में बने हुए सोने के मणी, कांच सामान, दिए और अनगिनत रोमन सिक्के मिले। आरिकामेडू भारत के दक्षिण-पूर्व दिशा में है। इसका अर्थ, यहां से भी रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार होता था।भारतीय जहाज श्रीलंका होते हुए हिंद महासागर में जाते थे, और वहां से इजिप्त की दिशा में प्रस्थान करते थे।
भारत के दक्षिण-पश्चिम के बंदरगाहों से भारत – रोमन व्यापार के अनेक प्रमाण मिले हैं। तुलना में यह मार्ग छोटा और आसान था। श्रीलंका को चक्कर मार कर भारत के पूर्व तट पर जाने की आवश्यकता नहीं थी। इसमें एक प्रमुख जगह है, पट्टनम। केरल के एर्नाकुलम जिले का एक छोटा सा गांव। कोचीन से 25 किलोमीटर उत्तर दिशा में।
सन 2007 में जब यहां उत्खनन प्रारंभ हुआ तब से भारत – रोमन व्यापार के अनेक प्रमाण मिलने लगे। कुछ इतिहासकार इस जगह को प्राचीन काल का मुझिरिस शहर मानते हैं, तो कुछ इतिहासकार केरल के त्रिशूर जिले के कोंडुगल्लूर गांव को मुझिरिस मानते हैं। इस मुझिरिस का इतना महत्व क्यों है?रोमन साम्राज्य के कालखंड में, अर्थात पहली सदी में, लिखे गए ‘पेरीप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ ( एरिथ्रियन समुद्र में भ्रमण) इस पुस्तक में मुझिरिस का भारत – रोमन व्यापार में एक महत्वपूर्ण केंद्र होने का उल्लेख आया है। भारत – रोमन व्यापार के मसाला मार्ग का मुझिरिस यह एक आवश्यक बंदरगाह था।
महत्वपूर्ण व्यापारिक व्यवहार (बही खाता) लिखकर रखने के लिए इजिप्त में पेपरस (या पपाईरस) नाम के मोटे कागज का उपयोग किया जाता था। केरल में दूसरे सदी के प्रारंभ के कुछ कागज मिले हैं, जिन्हें ‘मुझिरिस पेपिरस’ नाम से जाना जाता है।
यह ‘मुझिरिस पेपिरस’ यानी अलेक्जेंड्रिया में रहने वाले एक रोमन इजिप्शियन व्यापारी के, भारत से किए गए व्यापार का लेखा जोखा है। उस व्यापारी का एक जहाज मुझिरिस से इटली आने वाला था, उसका नाम था ‘हर्मापोलन’। इस जहाज में काली मिर्च और अन्य मसाले थे, जो यह व्यापारी भारत से आयात करता था।
इस सामान की क्या कीमत होगी? विलियम डार्लिंपल कहते हैं, ‘उस जमाने में इजिप्त में 24 एकड़ की सबसे अच्छी खेती खरीदी जा सकती थी, या इटली के बड़े शहर की प्रमुख, महत्वपूर्ण और विशाल ऐसी जगह आसानी से खरीद सकते थे’, इतनी कीमत उस एक जहाज के सामान की थी।
केवल एक जहाज में इतना बेशकिमती माल होगा, तो भारत का कितना बड़ा व्यापार उस समय रोमन साम्राज्य के साथ होता होगा? अकेले इजिप्त में ही भारत के बड़े-बड़े ऐसे लगभग 120 जहाज, ठसाठस माल भर के, साल भर में जाते थे, ऐसा स्ट्राबो इस इतिहासकार ने लिखकर रखा है। आगे चलकर इन जहाजों की संख्या दोगुनी हुई।
भारत में से आने वाले माल के कर से रोमन साम्राज्य को जितनी कमाई होती थी, वह कमाई उनके सरकारी तिजोरी की, अर्थात कुल कमाई की, एक तिहाई थी..!
कुल मिलाकर, केवल रोमन साम्राज्य से भारत इतना प्रचंड व्यापार करता था। फिर अन्य देशों के साथ हो रहे व्यापार को इससे जोड़ दे, तो भारत के समृद्धि का कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। कुछ कल्पना की जा सकती है।
इसी कालखंड में भारत के व्यापार का एक और जबरदस्त प्रमाण मिला है, इटली के पोंपेई (Pompeii) इस शहर में। नेपल्स शहर के पास बसे हुए इस छोटे से शहर की एक विशेषता है। पहली सदी में, सन 79 में, इस शहर के निकट माउंट वेसुविअस में ज्वालामुखी का प्रचंड विस्फोट हुआ। उसमें से निकले लावारस में यह शहर पूरी तरह दब गया। अगले अनेक वर्ष, यह इस मलबे में 15 से 20 फीट अंदर दबा रहा। इसकी खोज हुई, सोलहवीं सदी में। और आगे चलकर उन्नीसवीं सदी में इसका उत्खनन प्रारंभ हुआ। 1960 तक यह शहर लगभग पूरा मलबे से बाहर निकल सका। इतने वर्ष मलबे में दबने के बाद भी, दबी हुई वस्तुएं अच्छी स्थिति में मिली।
इस उत्खनन में उन्हें एक देवी की मूर्ति मिली। ईसा पूर्व 200 वर्ष (अर्थात आज से 2200 वर्ष पूर्व) यह प्रतिमा तैयार हुई होगी। हाथी के दांतों की यह प्रतिमा, पूर्णतया भारतीय है। अक्टूबर 1938 में यह देवी की प्रतिमा खोज निकाली Amedeo Maiuri नाम के इटालियन पुरातत्व विशेषज्ञ ने। प्रारंभ में यह प्रतिमा देवी लक्ष्मी की मानी गई। विश्व में यह प्रतिमा ‘पोंपेई लक्ष्मी’ नाम से प्रसिद्ध हुई। परंतु बाद में अध्ययन के बाद यह माना गया कि यह प्रतिमा लक्ष्मी की नहीं, किसी यक्षिणी की है।
यह प्रतिमा मथुरा में तैयार की गई होगी ऐसा एक मत है। अन्य मतानुसार महाराष्ट्र के जालना जिले के भोकरदन में यह मूर्ति तैयार हुई होगी। क्योंकि ऐसी ही एक मूर्ति वहां भी मिली है। इस मूर्ति के साथ ही, सातवाहन कालखंड का, राजा वशिष्ठिपुत्र पुलुमवी (पहली सदी) का सिक्का मिला है। यह सातवाहनोंके सागरी व्यापार का प्रमाण है।
इटली की पोंपेई लक्ष्मी कि ईसा पूर्व 200 वर्ष की मूर्ति, यह भारत – रोमन साम्राज्य में होने वाले व्यापार का जबरदस्त प्रमाण तो है ही, परंतु इसी मूर्ति के कालखंड के आसपास, भारत – रोमन व्यापार का और एक मजबूत प्रमाण मिला है, भारत में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में..!
‘पेरिप्लस ऑफ द एरीथ्रिरियन सी’ इस प्राचीन प्रवास वर्णन में उल्लेख होने के कारण, कोल्हापुर शहर के पश्चिम दिशा में, पंचगंगा नदी के तट पर, सन 1877 में सर्वप्रथम उत्खनन किया गया। आगे चलकर सन 1945 – 46 में, डेक्कन कॉलेज, पुणे के माध्यम से पुरातत्ववेत्ता हसमुख सांकलिया और मोरेश्वर दीक्षित के नेतृत्व में विस्तृत उत्खनन हुआ। यह भाग ब्रह्मपुरी नाम से जाना जाता था। इस उत्खनन में उनको अनेक वस्तुएं मिली। उसमें ग्रीको रोमन रचना की भी वस्तुएं थी। इसके अलावा इसमें उन्हें ‘पोसायडन’ इस ग्रीको रोमन समुद्र देवता की ब्रांझ की मूर्ति मिली। यह मूर्ति लगभग 7 इंच की है। पहली सदी मे, ग्रीस के अलेक्जेंड्रिया में यह मूर्ति तैयार की गई होगी। ब्रह्मपुरी के परिसर में उस समय सातवाहनोंका साम्राज्य था। इस पोसायडन मूर्ति के साथ-साथ, अनेक रोमन सिक्के भी मिले हैं।
इन सब प्रमाणों से वैज्ञानिकों ने यह अनुमान निकला की, इस ब्रह्मपुरी (आज का कोल्हापुर) में, ग्रीक व्यापारियों की रहने की बस्ती (बसाहट) होगी। यह ग्रीक व्यापारी, उनके पोसायडन इस समुद्र देवता को हमेशा साथ लेकर प्रवास करते होंगे।
भारत के रोमन-ग्रीक इन देशों के साथ प्राचीन व्यापार के और कितने स्पष्ट प्रमाण चाहिए?
‘कोल्हापुर पोसायडन’ यह मूर्ति और एक महत्वपूर्ण बात की ओर इशारा करती है। रोम और ग्रीस के साथ व्यापार के लिए उपयोग में आने वाला ‘मसाला मार्ग’ (स्पाइस रूट, समुद्री मार्ग) यह केवल भारत के दक्षिण मे, विशेष रूप से केरल के बंदरगाहों तक, सीमित नहीं था, तो कोकण और गुजरात से भी सीधे समुद्र मार्ग से यूरोपीय देशों के साथ व्यापार होता था।
सन 2023 में भारत में G20 का समिट हुआ। इसकी अध्यक्षता भारत ने की थी। इस समिट में एक आर्थिक कॅरिडाॅर की संकल्पना रखी गई। यह संकल्पना संबंधित देशों के साथ-साथ अन्य देशों को भी पसंद आई। ‘भारत – मध्य पूर्व – यूरोप’ ऐसा यह आर्थिक कॅरिडाॅर (India – Middle East – Europe Economic Corridor – IMEEC) होने वाला है।
भारत के संदर्भ में गहन अध्ययन करने वाले विलियम डार्लिंपल ने इस संकल्पना का स्वागत किया है। उनका कहना है कि, ‘लगभग 2000 वर्ष पूर्व, यही भारत का सही और महत्वपूर्ण व्यापारी मार्ग था’। डार्लिंपल के कहने के अनुसार, ‘सिल्क रुट यह एक तरह से नई संकल्पना है। सिल्क रुट या सिल्क रोड यह संकल्पना सर्वप्रथम उन्नीसवी सदी में, जर्मन भूगोल वैज्ञानिक, ‘फार्मिंग – बोन – रिश्टोफेन’ ने सबके सामने रखी। वह अंग्रेजी साहित्य और भाषा में सन 1930 से शामिल हुई। लेकिन विगत 20 /25 वर्षों में सही मायने में यह शब्द जनमानस में लोकप्रिय हुआ’।
वस्तुस्थिति यह है कि उस कालखंड में, सबसे जलद गति का, सबसे सस्ता और तुलनात्मक रुप से सबसे सुरक्षित व्यापारी मार्ग, यह मसाला मार्ग था, जो बीच समंदर से जाता था।
पहली सदी के आसपास, रोमन साम्राज्य के ‘प्लिनी द एल्डर’ (गायस प्लिनियस सेकुंडस – वर्ष 23 से 79) ने भारत समेत अनेक देशों में बहुत प्रवास किया। उसने लिखकर रखा है-
‘हमारी रोमन महिलाओं को क्या हुआ है? भारतीय वस्त्रों और हीरे – माणिक से बने हुए गहनों की ओर, वह इतनी ज्यादा आकर्षित क्यों होती है? यह महिलाएं रोमन ऊनी वस्त्र पहनकर खुश नहीं रह सकती क्या? इससे यह हो रहा है कि भारत की निर्यात प्रचंड मात्रा मे होने के कारण, भारतीय माल के बदले में हमें उतना ही (अर्थात, भरपूर) सोना देना पड़ रहा है। हमारा सब सोना भारत में जा रहा है’।
हमारे व्यापार करने की क्षमता पर प्लिनी जैसे इतिहासकारने इतने स्पष्ट रूप से लिख कर रखा है। पर हमारा दुर्भाग्य की ‘भारत का वैश्विक व्यापार में इतना मजबूत स्थान था’ यह हमें किसी ने, कभी सिखाया ही नहीं।
डार्लिंपल के अनुसार, यूरोप के साथ व्यापार करते समय भारतीय बहुत महंगी या कीमती वस्तुएं आयात नहीं करते थे। ओलिव ऑयल, वाइन जैसी वस्तुएं आयात होती थी। लेकिन यूरोपीय देशों का इससे उल्टा था। वह अत्यंत महंगी वस्तुएं आयात करते थे। हिरे, माणिक, मोती के गहने, मसाले, सूती वस्त्र, नील…. अर्थात, इस व्यापार में भारत हमेशा ‘जमा’ वाली स्थिति (ट्रेड सरप्लस) में रहता था, और यूरोपीय देशों का ‘ट्रेड डिफिसिट’ रहता था। इसलिए भारत में हजारों की संख्या में प्राचीन रोमन सिक्के मिले हैं।
‘पेरीप्लस ऑफ द एरीथ्रिरियन सी’ इस पुस्तक में भडोच का उल्लेख आता है। उस समय वहां ‘नहपान’ नाम का शक राजा राज्य करता था। भडोच से नील, हांथीदात की वस्तुएं, गहने, सूती कपड़ा, सूती वस्त्र, रेशीम, लॅपिसलझुली (रत्न), काली मिर्च आदी मौल्यवान वस्तूएं रोम में निर्यात होती थी।
महाराष्ट्र के शुर्पारक (आज के नालासोपारा), कल्याण, चौल आदि बंदरगाहों में ग्रीक जहाज आते थे, ऐसा उल्लेख इस पुस्तक में आया है।
मुख्यतः भारत के पश्चिमी किनारे से इजिप्त और यूरोप के साथ होने वाला व्यापार हमने देखा। उसके कारण भारत मे आई हुई प्रचंड समृद्धि भी हमने देखी।
अब भारत के पूर्व किनारे से चीन और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों से होने वाले व्यापार की क्या स्थिति थी, यह पढ़ने के लिए, पढिएं – ‘खजाने की शोधयात्रा’

(आगामी प्रकाशित ‘खजाने की शोधयात्रा’ इस पुस्तक के अंश)

