मौसम के लिहाज़ से देखें तो नवतपा चल रहा है, सूरज को बहुत तपना चाहिए। पर लग रहा है पावस आ गया है। पुणे में इतनी बारिश, इतनी बारिश हो रही है कि सावन भी लजा जाए और ऐसे मौसम में फिल्म इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया (एफटीआईआई) के सभागार में आषाढ़ का एक दिन नाटक देखने जाने का अवसर मिला। नाटक के बाद रामगोपाल बजाज का वक्तव्य भी था तो वह भी एक आकर्षण था।

रामगोपाल जो जाने कितनी बार इस नाटक को कर चुके हैं, जिन्होंने पंजाबी भाषा में भी इसे किया है। उनका कहना है कि नाटक की पात्र अंबिका का जो अक्खड़पन है वह पंजाबी भाषा में अधिक सटीकता से दिखता है। जो बजाज को इस तरह नहीं जानते उनके लिए ये वही बजाज हैं जो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक रह चुके हैं,जिनका नाम मिर्च मसाला जैसी फ़िल्मों के साथ जुड़ा है। वे उम्र की इस दहलीज़ पर हैं कि उन्होंने अथाह ज्ञान और अनुभव हासिल कर लिया है। नाटक के तुरंत बाद उनसे चर्चा थी तो नाटक के सभी पात्र अपनी वेशभूषाओं में ही व्याख्यान सुनने बैठे थे। उन्हें और श्रोताओं को भी लगा था कि अधिकतम 40 मिनट का सत्र होगा पर वह दो घंटे खिंच गया।

कहने को उनसे प्रश्न करने मंच पर डॉ. सुनील देवधर और सूत्रधार धनश्री हेबलीकर भी थीं लेकिन बजाज को जैसे किसी के होने न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था। देवधर ने उनसे गिनकर तीन प्रश्न पूछे जिसके जवाब उन्होंने वही दिए, जो वे देना चाहते थे। मतलब वे जो कहना चाहते थे, उन्होंने वही कहा, सवाल से उनके कहने का कोई लेना-देना नहीं था।
नाटककार मोहन राकेश पर केंद्रित पुणे में हिंदी नाटक की परंपरा निभाने वाले स्वतंत्र थियेटर ने दो दिवसीय नाट्य उत्सव का आयोजन किया था। पहले दिन आषाढ़ का एक दिन तथा दूसरे दिन आधे-अधूरे की प्रस्तुति थी। बजाज ने आषाढ़ का एक दिन नाटक के बारे में बताया कि नाटक संवाद के स्तर पर नए आयाम बुनता है। ध्वनि का विस्तार व संयोजन मोहन राकेश के नाटकों की विशेषता है।
1962 में आषाढ़ का एक दिन पहली बार खेला गया। तब से आज तक यह अपने कथा क्रम की कसावट की वजह से हमेशा सबका पसंदीदा बना है। यह कहकर एक तरह से उन्होंने पात्रों के अभिनय को दूसरे पायदान पर रख दिया। उनका कहना था कि नाटक की कथावस्तु ही इतनी खास है कि अभिनय इतना मानी नहीं रखता।
जबकि देखा जाए तो निर्देशक अभिजीत चौधरी ने हर मुख्य पात्र को दो अभिनेताओं से कराया था। यह अपनी तरह का अनूठा प्रयोग था, जो पात्र की आयु बढ़ने के साथ उसमें आने वाले भीतरी-बाहरी परिवर्तन को दिखाता है, जिसे रेखांकित किया जाना चाहिए था। पहले अंक की अंबिका (साराक्षी पुराणिक) की भाषा पर पकड़ और अभिनय की दक्षता पहले दृश्य से ही दर्शकों को हतप्रभ कर रही थी। तब भी वह बूढ़ी थी लेकिन इतनी नहीं कि अपनी बात को पूरी ठसक से कह न सके और ऐसा हुआ भी। दूसरी अंबिका (आशा शिंदे) थकान और बीमारी से अधिक बुढ़ा गई थी, इसके साथ भी न्याय हुआ। निर्देशक की सोच का विस्तार ऐसा था कि दर्शकों ने अंबिका की अभिनेत्रियों को बदलते महसूस तो किया लेकिन उन्हें वह गैर वाजिब नहीं लगा।
पहली मल्लिका (मोक्षा शाह )की चंचलता और दूसरी मल्लिका (मृणालिनी फपले) की कुछ तटस्थता को भी दोनों अभिनेत्रियों ने एकदम सही पकड़ा। कालिदास की भूमिका में पहले कुशल शहाणे और और बाद में प्रेम गौड़ा आते हैं, इन दोनों के अंतर को भी दर्शकों ने जाना, समझा, महसूस किया। विलोम की भूमिका पहले प्रवेश साकोरे ने और बाद में मोहित रानडे ने निभाई। इस पात्र का कलेवर पूरे नाटक में एक समान रहता है, उसे उस तरह बनाए रखना प्रवेश और मोहित के लिए मुश्किल रहा होगा क्योंकि दोनों को उसी एक टोन को पकड़ना था। प्रियगुनमंजिरी की भूमिका में धनश्री थीं जिन्होंने सधी हुई प्रस्तुति दी।

