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मुंबई की इस चौपाल में बह निकलती है साहित्य, संगीत गीत और संस्कृति की धाराएँ

गीत ग़ज़ल साहित्य संगीत चौपाल के केंद्र में सदा रहे हैं।  कोशिश हमेशा यह रहती है कि सभी प्रस्तुत कर्ता अपनी रचनाओं के साथ-साथ ऊंचे दर्जे के साहित्यकारों गीतकारों संगीतकारों को भी याद करते रहें ।वरिष्ठों को निरंतर स्मरण करने की रवायत चौपाल का मूल स्वभाव  है।  दरअसल,  रचनाकार तो अपने काम को करके कालजयी हो जाते हैं  उनकी  रचनाएँ कालजयी  होती है आवृत्तियों से प्रस्तुतियों से। उस दिन भी गीत ग़ज़ल संगीत कविता के बहाने वरिष्ठ रचनाकारों की रचनाओं को पेश किया गया।
  अप्रैल की चौपाल कविता गुप्ता के आंगन में सजी। आगुंतकों की अगवानी करने हमेशा की तरह वे दरवाजे पर उपस्थित थी। ठीक समय पर सुभाष काबरा जी ने संचालन की बागडोर संभाली और नियमित चौपाली मनजीत सिंह कोहली को बुलाने से पहले बताया कि- कोहली साहब  चार सौ गीत लिख चुकें हैं और उनके गीतों को कई बड़े-बड़े गायक आवाज दे चुके हैं। कोहली साहब ने वही गीत सुनाया जो उन्होंने अमिताभ बच्चन साहब की बेटी के विवाह पर लिखा था और जिसे शेखर सेन  ने गाया था ।कई बार सुनने के बाद भी ये मार्मिक गीत आंखें नम कर देता है जो बेटी  अपने ब्याह के पहले  दिन  पिता के सामने गाती है–
कल से यह घर ना रहेगा मेरा घर

युवा कवि प्रशांत बेबार एक दो बार पहले भी अपनी कविताओं का जादू चौपाल में जगा चुके हैं। उस दिन बड़ी खूबसूरत नज़्म पढ़ी –सौ वीं काली रात का जज़्बा
परींदे लौट आएंगे सज़र मजबूत होते ही
अंधेरा भाग जाएगा शहर महफूज़ होते ही
प्रशांत बाल रचनाएं भी लिखते हैं उनकी मीठी सी लोरी को श्रोताओं ने खूब सराहा –
निन्दिश निन्दिश पलकों में

लोकप्रिय कवयित्री शायरा और मंजी हुई मंच संचालिका प्रज्ञा शर्मा ने बहुत ठीक कहा कि— चौपाल की यु एस पी (USP) है यहाँ लोग कानों से नहीं दिल से सुनते हैं।
मैं खुद को बेसब़ब  उलझा रही हूँ
तेरे बारे में सोचे जा रही हूँ
मेरे अंदर कोई सुनता नहीं है
कितनी देर से चिल्ला रही हूँ
राकेश शर्मा मुंबई के जाने-माने कवि व शायर है जितना बढ़िया वे लिखते हैं उससे भी बढ़िया कहने का अंदाज  है–
मैं अक्सर सोचता हूं जिंदगी का क्या किया जाए
गमों को सह भी लूँ हँस कर खुशी का क्या किया जाए
वो मेरा दोस्त होकर भी मेरे दुःख से है बेगाना
उसी से पूछिए उस आदमी का क्या किया जाए

सुभाष काबरा ने छोटी सी व्यंग्य रचना पढ़ी। उनके हर वाक्य पर ठहाके लगने ही थे। रचना का शीर्षक था-
बातें हैं बातों का क्या
कोई बोर न हो सबको बात करने का मौका मिलता रहे
इसलिए पति-पत्नी का रिश्ता बनाया
दोनों की शिकायतें एक जन्म में पूरी ही नहीं होती
इसलिए ही सात जन्म का रिश्ता बनाया

अर्चना जौहरी वर्षों से मंच से कविताएं सुनाती रहीं हैं तथा दूरदर्शन से भी जुड़ीं है।
मैं लिखती हूँ
तो कभी कुछ गुनगुनाती हूँ
अभी मैं जिंदा हूँ  यह बताती हूँ
जो मिला कद्र उसकी है नहीं
ना मिलने का रोना है
अगर रहना है खुद में  तो
खुद की यह आदत छुड़ानी है
जब कोई और चोट खाएंगे
फिर कोई नई ग़ज़ल गुनगुनाएँगे

वरिष्ठ कवि नरोत्तम शर्मा बहुत दिनों के बाद चौपाल में दिखे और उनकी सभी रचनाएँ बड़ी कमाल की रही जिन्हें श्रोताओं ने खूब सराहा–
मैं कभी इसलिए बाजार में नहीं आया
सोचा खरीददार खुद ही ढूँढ लेंगे

महलों के इस नगर में अपना भी बसेरा है
दो ईंट  का चूल्हा है दो बाँस का घर है
बड़े शहरों में जहाँ लोग बड़े रहते हैं
सीढ़ियाँ चलती है लोग खड़े रहते हैं
ठोकर को भूल जाओ कि तुम्हें गिरा दिया
पत्थर को दुआ दो कि तुमको चलना सिखा दिया

विष्णु शर्मा नियमित चौपाली है और हर बार अपनी आवाज के जादू से चौपालियों को रिझाते हैं। उस दिन उन्होंने आदरणीय नीरज जी के लहज़े में एक रचना सुनाई–
बहका मत कर चहका मत कर
बूँद- बूँद सागर से भरा कर
कौन तेरी बात मानेगा
शराबी चुप रहा कर

सुभाष काबरा ने नीरज़, काका हथरसी, तथा बाल कवि बैरागी के लहजे में  एक पैरोडी सुना कर  मनोरंजन ही नहीं किया बल्कि अग्रज   रचना कारों  को याद भी किया। इसी कड़ी में अशोक बिंदल ने  शिवमंगल सिंह सुमन की रचना बड़ी खूबसूरती से पढ़ी–
जिस राही से स्नेह मिला
उस राही को धन्यवाद

दीप्ति मिश्रा ने देश- विदेश के अनेक हिंदी व उर्दू मुशायरों  में अपनी प्रस्तुतियां दी हैं और वे अभिनेत्री भी बहुत अच्छी हैं ।उन्होंने मुनीर नियाज़ी की नज़्म से प्रेरित अपनी एक  नज़्म पढ़ी –
किसी से दूर जाने को
किसी को मनाने को
किसी के पास आने को
किसी को भूल जाने को
मेरा अब मन नहीं करता
पुरानी सेल्फ में रखे हैं जो
बेजान से एल्बम जिनमें
अभी सांस लेते हैं कुछ इश्क के लम्हे
उन्हें देखने को अब मन नहीं करता

अब तक कविताएं गज़लें शेर मुक्तक सुने जा रहे थे। फिर आईं शर्मिष्ठा बासु और राजा सेवक, जिनके सुरीले कंठ से चौपालियों का अनेक बार परिचय हो चुका है। दोनों ने कई गीत पेश किये और समूचा चौपाल का आंगन संगीत सरिता में ऊब- डुब  होने लगा। गौरतलब बात यह भी थी कि गीतों का चुनाव बड़ी ही खूबी से ऐसा किया गया था जिन में उँचे दर्जे का साहित्य हो, काव्य हो, रस हो। आम फिल्मी गाने गायक स्वयं ही चौपाल में नहीं चुनते, यह बात शर्मिष्ठा ने कही भी कि –चौपाल में गाने के लिए उन्हें कुछ विशेष गीतों को चुनना पड़ता है जो सरस तो ही, साथ ही उम्दा लफ्जों का जादू भी जगाते हो। राजा सेवक बिना तैयारी के ही आए थे लेकिन उन्होंने अपनी दमदार गायकी से श्रोताओं को मन जीत लिया। इस तरह चौपाल की वो शाम संगीत के नाम रही।

 
(लेखिका गृहिणी हैं और स्वांतः सुखाय लिखती हैं)
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