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हॉलीवुड की एक दो फिल्मों की कमाई ही मुंबईया फिल्मों के साल भर की कमाई से ज्यादा होती है

चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई के सिने संवाद में बोलते हुए प्रतिष्ठित रंगमंच एवं फ़िल्म समालोचक अजित राय ने कहा कि शुरुआती दौर के सिनेमा में सत्य, अहिंसा, त्याग जैसी भावनाओं का चित्रण किया गया। सिनेमा को कला और उद्योग का दर्जा नहीं मिला। सिनेमा को एक आवश्यक बुराई माना गया। आगे चलकर श्री 420 और संगम जैसी फ़िल्में विदेशी भाषा में डब होकर ईरान, इजिप्ट आदि देशों में प्रदर्शित हुईं और कामयाब हुईं तो वहां से विदेशी मुद्रा भारत में आई।
रविवार 27 अप्रैल 2025 को मृणालताई हाल, केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव, मुम्बई में आयोजित इस कार्यक्रम में विश्व सिनेमा पर बात करते हुए अजित राय ने कहा कि हॉलीवुड की एक दो फ़िल्में साल भर में जितनी कमाई कर लेती हैं वह पूरे बॉलीवुड की साल भर की कमाई से ज़्यादा होती है। इसका एक कारण यह भी है कि वहां लेखक को बहुत ज़्यादा पैसा मिलता है और यहां बहुत कम मिलता है। फ़िल्म की कामयाबी के लिए अच्छी स्क्रिप्ट ज़रूरी है।
अजित राय ने बर्थ आफ ए नेशन, सिटीजन केन, गॉडफादर, ब्रेथलेस, शिंडलर्स लिस्ट आदि चर्चित फ़िल्मों का ज़िक्र करते हुए कहा कि सिनेमा कल्पना और इतिहास के बीच की चीज़ है। गोदार, अकीरा कुरोसावा, बर्गमैन आदि फ़िल्मकारों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि विश्व सिनेमा मनुष्य की आज़ादी का घोषणा पत्र है। अजित राय के अनुसार विदेशों में भारतीय फ़िल्मकार के रूप में सिर्फ़ सत्यजीत रे का ही ज़िक्र किया जाता है।
शुरू में प्रस्तावना पेश करते हुए कवि देवमणि पांडेय ने दादा साहब फाल्के को याद किया। उन्होंने कहा कि जब हिंदी सिनेमा में बोलती फ़िल्मों का दौर आया तो क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। देविका रानी, वी शांताराम, महबूब ख़ान आदि फ़िल्मकारों ने सामाजिक समस्याओं पर आधारित फ़िल्में बनाकर फ़िल्म निर्माण को एक नई दिशा दी। चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कवि कथाकार हरि मृदुल ने कहा कि हिंदी में अच्छे फ़िल्म पत्रकारों की कमी है। आज की फ़िल्मों में संवेदना की पकड़ नहीं है। लापता लेडीज फ़िल्म की तारीफ़ करते हुए उन्होंने कहा कि फ़िल्म जगत को आज ऐसी फ़िल्मों की ज़रूरत है।
दिल्ली से पधारे व्यंग्य यात्रा के संपादक प्रेम जनमेजय ने व्यंग्य और सिनेमा के हवाले से कहा कि चार्ली चैपलिन जैसे हास्य अभिनेता ने ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ फ़िल्म के ज़रिए हमें विरोध करना सिखाया। ज़िंदगी दूर से देखने पर कॉमेडी और नज़दीक से देखने पर त्रासदी है। व्यंग्य इस त्रासदी को सामने लाता है। संवेदनशीलता सिनेमा के लिए बहुत ज़रूरी है। व्यंग्यकार सुभाष काबरा ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में “बातें हैं बातों का क्या” व्यंग्य लेख का पाठ किया जिसे श्रोताओं ने काफ़ी पसंद किया। पंछी प्रतापगढ़ी की व्यंग्य रचना भी सराही गई। जवाहरलाल निर्झर के काव्य पाठ से कार्यक्रम का समापन हुआ।
चित्रनगरी संवाद मंच के अगले आयोजन में रविवार 4 मई को शाम 5 बजे युवा कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया है। आप सभी मित्रों से अनुरोध है कि समयानुसार पधारकर कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाएं।
 
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