1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में कई यादगार किस्से और वीरतापूर्ण कहानियाँ हैं, जो भारतीय सैनिकों के साहस, बलिदान और रणनीतिक कौशल को दर्शाती हैं। 1965 और 1971 के युद्धों में भारतीय सैनिकों ने असाधारण साहस और रणनीतिक कौशल का परिचय दिया। ये किस्से न केवल सैन्य इतिहास का हिस्सा हैं, बल्कि देशभक्ति और बलिदान की भावना को भी प्रेरित करते हैं।
1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध ःहाजी पीर दर्रा की जीत: भारतीय सेना ने कश्मीर में हाजी पीर दर्रे पर कब्जा करने के लिए ऑपरेशन बकरम चलाया। मेजर रणजीत सिंह दयाल के नेतृत्व में 1 पैरा बटालियन ने दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा किया। मेजर दयाल ने अपनी जान जोखिम में डालकर दुश्मन की मशीनगन पोस्ट को नष्ट किया और इस ऑपरेशन को सफल बनाया। उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
असाल उत्तर की टैंक लड़ाई: पंजाब के असाल उत्तर में 8 सितंबर 1965 को भारत और पाकिस्तान के बीच सबसे बड़ी टैंक लड़ाइयों में से एक हुई। भारतीय सेना ने अपनी सेंटूरियन और शेरमेन टैंकों के साथ पाकिस्तान के पैटन टैंकों को भारी नुकसान पहुँचाया। इस युद्ध में अब्दुल हमीद जैसे सैनिकों ने अपनी जान गँवाकर भी दुश्मन के टैंकों को नष्ट किया। उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
युद्ध के दौरान भारत में खाद्य संकट था, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सैनिकों और किसानों का मनोबल बढ़ाने के लिए यह नारा दिया। उन्होंने स्वयं एक दिन का उपवास रखने की अपील की, जो देशवासियों के बीच एकता का प्रतीक बना।
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध- लॉन्गेवाला की वीरता: राजस्थान के लॉन्गेवाला में 4-5 दिसंबर 1971 को मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के नेतृत्व में केवल 120 भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान की 2000 सैनिकों और 45 टैंकों की टुकड़ी का सामना किया। भारतीय वायुसेना की मदद से उन्होंने दुश्मन को भारी नुकसान पहुँचाया। इस युद्ध को “बॉर्डर” फिल्म में भी दर्शाया गया। मेजर चांदपुरी को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
1971 का युद्ध बांग्लাদेश की आजादी का कारण बना। भारतीय सेना ने ऑपरेशन कैक्टस लिली के तहत पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में तेजी से कब्जा किया। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के 93,000 सैनिकों ने ढाका में आत्मसमर्पण किया। यह आधुनिक इतिहास में सबसे बड़े सैन्य समर्पणों में से एक था। जनरल सैम मानेकशॉ की रणनीति इस जीत की कुंजी थी।
मेघना नदी का हेलिकॉप्टर ऑपरेशन: भारतीय सेना ने मेघना नदी को पार करने के लिए हेलिकॉप्टरों का उपयोग किया, जो उस समय एक अभूतपूर्व रणनीति थी। इस ऑपरेशन ने भारतीय सेना को ढाका तक तेजी से पहुँचने में मदद की। इसे “मेघना हेली ब्रिज” के नाम से जाना जाता है।
लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल का बलिदानः शक्ति नगर में 16 दिसंबर 1971 को लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने अपनी टैंक यूनिट के साथ पाकिस्तानी टैंकों का डटकर मुकाबला किया। उन्होंने कई दुश्मन टैंकों को नष्ट किया, लेकिन अंत में उनकी टैंक में आग लग गई और वे शहीद हो गए। उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
1971 के युध्द में राजस्थान सीमा से भारत ने पाकिस्तान की सीमा में कब्जा कर लिया था और पाकिस्तान के थानों पर तिरंगा झंडा फहरा दिया था ये किस्सा क्या है
आप 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान लॉन्गेवाला की लड़ाई और इसके बाद राजस्थान सीमा पर भारतीय सेना की कार्रवाइयों से जुड़े एक महत्वपूर्ण किस्से की बात कर रहे हैं। हालाँकि, यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि लॉन्गेवाला की लड़ाई में भारतीय सेना ने मुख्य रूप से रक्षात्मक रणनीति अपनाई थी, लेकिन इसके बाद भारतीय सेना ने आक्रामक कार्रवाई करते हुए पाकिस्तानी क्षेत्र में कुछ हिस्सों पर कब्जा किया और वहाँ तिरंगा फहराया। इस घटना का विवरण नीचे दिया गया है:
लॉन्गेवाला की लड़ाई (4-5 दिसंबर 1971): राजस्थान के जैसलमेर जिले में लॉन्गेवाला एक छोटा सा सीमावर्ती चौकी थी, जहाँ 23 पंजाब रेजिमेंट की एक कंपनी तैनात थी। मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के नेतृत्व में केवल 120 सैनिकों ने पाकिस्तान की 51वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड (लगभग 2000 सैनिक) और 45 पैटन टैंकों के हमले का सामना किया।
पाकिस्तानी सेना ने रात में आक्रमण शुरू किया, यह सोचकर कि वे आसानी से चौकी पर कब्जा कर लेंगे और जैसलमेर की ओर बढ़ेंगे। लेकिन भारतीय सैनिकों ने असाधारण साहस दिखाया और सुबह तक चौकी की रक्षा की। भारतीय वायुसेना के हंटर विमानों ने सुबह हमला बोलकर पाकिस्तानी टैंकों और सेना को भारी नुकसान पहुँचाया। इस लड़ाई में पाकिस्तान के 22 टैंक नष्ट हुए और सैकड़ों सैनिक मारे गए।
लॉन्गेवाला की जीत ने पाकिस्तानी सेना का मनोबल तोड़ा और भारतीय सेना को आक्रामक रुख अपनाने का मौका दिया। मेजर चांदपुरी को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
पाकिस्तानी क्षेत्र में कब्जा और तिरंगा फहराना: लॉन्गेवाला की जीत के बाद, भारतीय सेना ने राजस्थान सीमा पर आक्रामक रणनीति अपनाई। भारतीय सेना की 12वीं इन्फैंट्री डिवीजन ने पाकिस्तान के सिंध प्रांत में कुछ क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। इनमें छाछरो, विरावाह, और नया चोर जैसे क्षेत्र शामिल थे। तिरंगा फहराना: भारतीय सेना ने पाकिस्तानी क्षेत्र में कई थानों (छोटी पुलिस चौकियों) और गाँवों पर कब्जा किया। इनमें से कुछ स्थानों पर भारतीय सैनिकों ने तिरंगा झंडा फहराया, जो भारतीय सेना की विजय और साहस का प्रतीक था। उदाहरण के लिए, छाछरो क्षेत्र में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी चौकियों को अपने कब्जे में लिया और वहाँ भारतीय झंडा फहराया गया।
रणनीतिक महत्व: इन कब्जों ने पाकिस्तानी सेना को पश्चिमी मोर्चे पर दबाव में रखा, जिससे उनका ध्यान पूर्वी मोर्चे (बांग्लादेश) से हटा। यह भारतीय सेना की रणनीति का हिस्सा था, जिसने अंततः ढाका में पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण (16 दिसंबर 1971) को सुनिश्चित किया।
यह घटना भारतीय सैनिकों के साहस और रणनीतिक कौशल का प्रतीक बन गई। लॉन्गेवाला की लड़ाई को बाद में बॉलीवुड फिल्म “बॉर्डर” (1997) में दर्शाया गया, जिसने इस युद्ध की कहानी को जन-जन तक पहुँचाया। पाकिस्तानी क्षेत्र में तिरंगा फहराने की घटना ने भारतीय सैनिकों और नागरिकों में जोश भरा। यह दिखाता था कि भारतीय सेना न केवल अपनी सीमाओं की रक्षा कर सकती है, बल्कि दुश्मन के क्षेत्र में भी विजय प्राप्त कर सकती है। युद्ध के अंत में, भारत ने कब्जाए गए कुछ क्षेत्रों को वापस कर दिया, क्योंकि 1971 का युद्ध मुख्य रूप से बांग्लादेश की मुक्ति के लिए लड़ा गया था, न कि स्थायी क्षेत्रीय कब्जे के लिए।

