Homeजियो तो ऐसे जियोकिराया देने के पैसे नहीं थे इसलिए पत्रकारिता छोड़ी, मगर अब....

किराया देने के पैसे नहीं थे इसलिए पत्रकारिता छोड़ी, मगर अब….

मीडिया के क्षेत्र में  ऐसे अजीबोगरीब दास्तानें सामने आ सकती हैं, जब किसी को पत्रकारिता जगत का नोबेल पुरस्कार तब मिले, जब वो पैसे की तंगी या कम तनख्वाह के चलते मीडिया की दुनिया को  ही अलविदा कह चुका हो। कैलीफोर्निया के टोरेंस के एक छोटे से अखबार दे डेली ब्रीज के संवाददाता रॉब कुज्नियां को खोजी पत्रकारिता के लिए   जब पुलित्जर पुरस्कार की घोषणा हुई तो उनके अखबार का ऑफिस ही नहीं पूरा शहर ही हैरत में पड़ गया।

हैरत में पड़ने वाली बात भी थी, जिस अखबार में रॉब काम करते थे द डेली ब्रीज, उसके बस 63,000 ही ग्राहक थे और कुल सात संवाददाताओं के सहारे वो पूरा अखबार काम चलाता था, ऐसे में काम तो ज्यादा था ही, और तनख्वाह उतनी भी नहीं मिलती थी, जिससे रोज का खर्चा भी चल सके। हालात तो तब मुश्किल हो गए, जब उनको घर का किराया देना भी मुश्किल हो गया।

ऐसे में रॉब ने अपना पेशा ही बदलना बेहतर समझा और जैसा कि कई मीडिया वाले करते आए हैं, वो पीआर यानी जनसंपर्क  की एक कंपनी में नौकरी करने लगे। लेकिन उनकी एक खोजी रिपोर्ट  को पुलित्जर पुरस्कारों के लिए भेजा गया था, छोटे से शहर के छोटे से अखबार के एक कम वेतन पाने वाले रिपोर्टर को वो अवॉर्ड मिलने की उम्मीद होती तो वो पेशा ही क्यों बदलता? 

दो लोगों ने उस अखबार में रहते हुए हाईस्कूल  के खिलाफ भ्रष्टाचार की रिपोर्ट की पूरी  सीरीज चलाई थी. जिसमें बाद में इसकी वजह से सरकार को कानून बदलना पड़ा था।  अब जाकर पुलित्जर अवॉर्ड्स में उनका नाम आया  तो  रॉब के ढूंढना शुरू किया तो पता चला कि वो मीडिया को अलविदा कह चुके हैं। लेकिन अब लगता है मीडिया उनको फिर से बुला रही है।

साभार- समाचार4मीडिया से 

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