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राँची की इस मलाला ने बस्ता उठाया तो नक्सलियों ने भून दिया, मगर खबर भी नहीं बनी

रांची। आपने पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई का नाम तो सुना ही होगा, जिसने अपने मुल्क में स्त्री शिक्षा के पक्ष में आवाज उठाई तो तालिबानी आतंकियों की गोलियों का शिकार होना पड़ा। ऐसा ही एक मामला झारखंड में सामने आया है। 20 वर्षीय संगीता कुमारी ने बंदूक की जगह बस्ता उठाया तो नक्सलियों ने गोलियों से भून डाला। फर्क यही है कि आज मलाला जिंदा है और दुनिया में लड़कियों की शिक्षा की मिसाल बन गई है, लेकिन संगीता की मौत का भी असर कहीं होगा, उम्मीद नहीं है।

हिन्दुस्तान टाईम्स ने खबर दी है कि संगीता का बचपन नक्सली हिंसा के बीच गुजरा। नई शुरुआत के लिए उसने स्कूल जाने का फैसला किया, लेकिन पुलिस के इशारों पर खुफियागिरी करने का आरोप में उसे बीते हफ्ते मौते के घाट उतार दिया गया। उसकी खून से सनी लाश गुमला की पहाड़ियों के करीब मिली।

यह है संगीता की कहानी

संगीता उर्फ गुड्डी को 11 साल की उम्र में ही नक्सलियों का साथ कर दिया गया था। उसने आठ साल तक उनके साथ काम किया।
20 साल की उम्र होने पर उसने अपने सुनहरे भविष्य के सपने को साकार करने की कोशिश की और माओवादियों के कैम्प से भाग गई।
वह छुपकर गुमला में रहने लगी। किराए का कमरा लिया और स्कूल में दाखिला लिया। हालांकि उसे इस बीच धमकियां भी मिलती रहीं।
एचटी ने बीती 28 जुलाई को बात की थी, तब उसने अखबार को बताया था कि किस तरह उसकी जान को खतरा है।
उसने यकहा था कि चाहे जो हो जाए, मैं पढ़ाई जारी रखूंगी और किसी भी हाल में दोबारा नक्सलवाद की दुनिया में नहीं जाऊंगी।
संगीता ने कहा था, मैं सरेंडर नहीं कर सकती, क्योंकि जैसे ही मेरे नेताओं को पता चलेगा, वे मेरा माता-पिता और भाई-बहन की हत्या कर देंगे।
मैं तब तक पढ़ाई कर सकती हूं, जब तक कि मेरी असली पहचान उजागर नहीं हो जाती या जंगल में बैठे मेरे आका मुझे जबरन उठाकर नहीं ले जाते।
बीते मंगलवार को जब वह नक्सल प्रभावित सिबिल में अपने माता-पिता और भाई-बहन से मिलने पहुंची तो उसे अगुवा कर लिया गया।
नक्सिलयों ने हाथ से लिखी एक चिट्ठी छोड़ी, जिसमें लिखा था कि गुड्डी को मरना होगा, क्योंकि कई बार की चेतावनी के बाद भी उनसे अपना रास्ता नहीं बदला।
बाद में उसकी लाश मिली, जिसे स्थानीय लोग अस्पताल लेकर आए। इस इलाके में पुलिस भी डर कर रहती है।
गुमला पुसिस थाने के अधिकारी भीमसेन टुटी के मुताबिक, संगीता पुलिस की खुफिया नहीं थी। उसके खिलाफ किसी नक्सली केस की भी हमें जानकारी नहीं है।

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1 COMMENT

  1. संगीता का नक्सलियों की जिंदगी से वापस लौट कर पढाई करना अच्छा था | एक अच्छी शुरुआत करने के लिए उसने बहादुरी का परिचय दिया और उसने अपनी पढ़ाई को आरम्भ किया पर उसके माता -पिता अक्सलियों की गिरफ्त में थे उनसे वह मानसिक रूप से अलग न हो सकी ,यही उसके कष्ट का कारण बन गया अन्यथा वह माता-पिता को भी रांची ला सकती थी ,कोई काम उन्हें मिल ही जाता , वह निर्णय उसके माता पिता को ही करना था | यदि वो अपनी बेटी का साथ देते और नक्सलियों का इलाका छोड़ देते तो पूरा परिवार जीवित रह सकता था और संगीता की पढ़ाई भी जारी रह सकती थी और पुलिस प्रोटेक्शन भी रांची में मिल सकता था यदि वो प्रशासन से उसकी गुज़ारिश करती तो |आज संगीता नहीं रही पर ऐसी ही हिम्मत वाली संगीताएं आगे आनेवाले समय में देश का निर्माण करेंगी जिन्हें हर प्रकार की सहायता सरकार की और जनता की ओर से दी जानी चाहिए ताकि आदिवासी पिछड़े महिलाएं और पुरुष अपना जीवन सँवारने के लिए बहादुरी से आगे आएं और नए समाज का निर्माण करें |

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