ऐसा क्यों हुआ है कि पश्चिम बंगाल में भीषण हिंसक, दंगानुमा, आगजनी, रेलवे टै्रक को बाधित करने और खून-खराबे वाला माहौल क्यों है? देश के अन्य राज्यों में ऐसी हिंसा क्यों नहीं है? क्या बंगाल में दंगाइयों और उपद्रवियों को सत्ता का संरक्षण रहा है? क्या वोट बैंक की खातिर इन दंगाइयों को खुली छूट मिली हुई है? हिंदू पिता-पुत्र की चाकू से गोद कर हत्या कैसे कर दी गई? उपद्रवियों और एक खास जमात के दंगाइयों ने घरों, दुकानों, मंदिरों पर हमले करने का दुस्साहस कहां से हासिल किया? रेलगाडिय़ां रोक दी गईं, क्योंकि पटरियों पर हजारों की भीड़ बैठी थी। ऐसे हालात के मद्देनजर कलकत्ता उच्च न्यायालय को कहना पड़ा कि अदालत आंखें मूंद कर नहीं बैठ सकती।
उच्च न्यायालय को मुर्शिदाबाद के हिंसाग्रस्त इलाकों में केंद्रीय बल की तैनाती का आदेश देना पड़ा। बीएसएफ के 300 जवानों के अलावा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की 5 कंपनियां भी तैनात की गई हैं। यह नौबत ही क्यों आई? राज्यपाल सीवी आनंद बोस को कठोर बयान देने पड़े कि सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करने और किसी की जिंदगी को खतरे में डालने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। दरअसल ऐसे उग्र, नफरती, हिंसक हालात और माहौल का बुनियादी सबब क्या है? वक्फ संशोधन कानून एक मुखौटा कारण हो सकता है, लेकिन जो मुस्लिम नेता, सांसद, मौलाना आदि सरेआम औसत मुसलमानों को भडक़ा-सुलगा रहे हैं, क्या उनके ‘कुत्ते’, ‘हरामखोर’, ‘गद्दार’ वाले बयान किसी कानून के दायरे में नहीं आते? क्या ये गालियां भी ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ हैं? कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है, लिहाजा अमन-चैन बरकरार रखना मुख्यमंत्री और राज्य पुलिस का संवैधानिक दायित्व है।
संविधान में केंद्र और राज्य की भूमिकाओं की स्पष्ट व्याख्या है। समवर्ती सूची का कानून केंद्र और राज्य दोनों ही बना सकते हैं। यदि ऐसे किसी कानून पर केंद्र बनाम राज्य की टकरावपूर्ण स्थिति पैदा होती है, तो संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत केंद्र का बनाया कानून ही मान्य होगा। राज्य सरकार उसे खारिज नहीं कर सकती। मुख्यमंत्री ने बंगाल में केंद्र की ‘आयुष्मान भारत’ योजना भी लागू नहीं होने दी है। संविधान का अनुच्छेद 245 बताता है कि संसद पूरे भारत अथवा उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकती है। राज्य विधानमंडल राज्य अथवा उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकता है। अनुच्छेद 246 अधिकार-क्षेत्र संबंधी विवादों को दूर करने के लिए विधायी विषयों को सौंपता है। वक्फ बिल इन्हीं अनुच्छेदों की परिधि में पारित कराया गया है। वह समवर्ती सूची का भी कानून है, लिहाजा संसद द्वारा पारित किए गए बिल को बंगाल कैसे नकार सकता है? यदि इस संबंध में भारत सरकार कोई कार्रवाई करती है, तो संघीय ढांचे के उल्लंघन का रोना रोया जाएगा। यह विवाद फिलहाल सर्वोच्च अदालत के विचाराधीन है। इसी 16 अप्रैल को 20 याचिकाओं की सुनवाई होगी।
वक्फ कानून की आड़ में उपद्रव मचाने वालों को याद रखना चाहिए कि आखिर फैसला शीर्ष अदालत को ही करना है। तोड़-फोड़ करने या गली-गली आंदोलन सुलगा कर कुछ भी हासिल नहीं होगा। मौलाना किसान आंदोलन की तुलना करना छोड़ दें। सवाल यह भी है कि वक्फ का मामला प्रशासनिक है, इसे मजहबी किसने और क्यों बनाया है? आखिर प्रदर्शनकारियों को कानून के किस प्रावधान पर आपत्ति है? यह पक्ष भी अदालत में रखा जाना चाहिए। ममता सरकार के मंत्री सिद्दिकुल्ला चौधरी ने यहां तक बयान दिया है कि राज्य की 50 जगहों पर दस-दस हजार लोगों की भीड़ जमा की जाए। क्या यह बयान संवैधानिक है? बंगाल में 2026 में चुनाव हैं, लिहाजा मुख्यमंत्री ‘तुष्टिकरण’ के खेल में जुटी हैं, तो भाजपा हिंदू-मुस्लिम को हवा दे रही है। आम आदमी बीच में पिस रहा है। उसे तो ‘वक्फ’ के मायने भी नहीं पता हैं।
(लेखक स्तंभकार हैं व समसामयिक विषयों पर लिखते हैं)

