‘आनंद’, ‘मिली’, ‘रजनीगंधा’, ‘छोटी सी बात’ आदि फ़िल्मों में कालजयी गीत रचने वाले गीतकार योगेश गौड़ साठ के दशक में जब रोज़ी रोटी के लिए मुंबई आए तो उन्हें यह पता नहीं था कि गीत कैसे लिखा जाता है। तब तक उन्होंने एक भी गीत नहीं लिखा था। हाँ उन्हें दूसरों की कविताएं याद थीं और उन्हें वे बहुत अच्छी तरह पेश करते थे।
पारसी पंचायत रोड, अंधेरी पूर्व की एक चाल में ग्यारह रूपए प्रतिमाह पर उन्होंने जो कमरा किराए पर लिया उसमें बिजली और पानी का कनेक्शन नहीं था। अंधेरी स्टेशन से पैदल चलकर यहां पहुंचने में 45 मिनट लगते थे। चाल के इसी कमरे में उनके मन में गीत के अंकुर फूटे। कड़े संघर्ष के बाद जब संगीतकार सलिल चौधरी से मुलाक़ात हुई तो उनके सितारे बुलंदी पर पहुंचकर गए।
संगीतकार सलिल चौधरी और योगेश
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सलिल दा ने हारमोनियम पर युवा गीतकार योगेश को एक धुन सुनाई। वे बोले- योगेश तुम इस पर गीत लिखो। मैं एक घंटे के लिए बाहर जा रहा हूँ। थोड़ी देर में योगेश उनकी बताई हुई धुन भूल गए। उन्होंने सलिल दा के सहायक से अनुरोध किया कि मुझे वो धुन बता दीजिए। सहायक ने कहा- तुमसे यह काम नहीं होगा। यहां शैलेंद्र, गुलज़ार और आनंद बख़्शी जैसे बड़े बड़े लोग आते हैं। योगेश वहां से उठकर बस स्टॉप पर आ गए। बस का इंतज़ार करते करते अचानक उन्हें सलिल दा की धुन याद आ गई। उन्होंने गीत लिखा और वापस सलिल दा के पास आए। सलिल दा ने गीत सुना तो उछल पड़े। ज़ोर से बोले- सबिता, इस नौजवान ने बहुत अच्छा गीत लिखा है। सविता बनर्जी उनकी बीवी थीं। गायिका थीं। उन्होंने ही सलिल दा से योगेश को मिलाया था।

सलिल दा ने योगेश के तीन गीत रिकॉर्ड किए। दो गीत फ़िल्म ‘आनंद’ में शामिल किए गए- ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ और ‘ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय’। योगेश जी ने फ़िल्म ‘रजनीगंधा’ में गीत लिखा- रजनीगंधा फूल तुम्हा्रा महके यूं ही जीवन में/ यूं ही महके प्रीत पिया की मेरे अनुरागी मन में। योगेश जी ने बताया- यह जो अनुरागी मन है इसे सलिल दा ने ऐसे ही गीत में रखा क्योंकि वे स्वयं भी एक बहुत अच्छे कवि थे। उनकी जगह दूसरा संगीतकार होता तो शायद अनुरागी मन को निकाल देता।
संगीतकार रॉबिन बनर्जी और योगेश
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मुंबई में गीतकार बनने के लिए जब योगेश जी निर्माताओं के दरवाज़े पर भटक रहे थे तभी रॉबिन बनर्जी से मुलाकात हुई। बतौर संगीतकार उन्हें एक स्टंट फ़िल्म मिल गई। रॉबिन बनर्जी ने इस फ़िल्म में योगेश के छः गीत रिकॉर्ड किए। ₹25 प्रति गीत के हिसाब से उन्हें डेढ़ सो रुपए का पहला भुगतान प्राप्त हुआ। योगेश के गाने पसंद किए गए। इस फ़िल्म के बाद संगीतकार रॉबिन बनर्जी को सात फ़िल्में मिली। उन्होंने सभी में योगेश से गीत लिखवाया। रॉबिन बनर्जी ने ही योगेश को ट्यून पर गीत लिखना सिखाया।
गीतकार अनजान और गीतकार योगेश
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संघर्ष के दिनों में गीतकार अनजान से दोस्ती हो गई। एक दि्न योगेश ने संगीतकार रॉबिन बनर्जी से कहा- मैं गीतकार अनजान के साथ जोड़ी बनाकर काम करना चाहता हूँ। रॉबिन बनर्जी ने उन्हें समझाया- अब तुम्हें एक गीत के लिए ₹100 मिलते हैं। छः गीत के लिए 600 मिलेंगे। क्या तुम चाहते हो कि ₹300 अनजान के पास चले जाएं। योगेश ने कहा- जी हां, हम आधा आधा बांट लेंगे। इसके बाद दोंनो ने मिलकर बीस-बाईस स्टंट फिल्मों में गीत लिखे। कभी-कभी फ़िल्म के पर्दे पर एक ही नाम जाता था- गीतकार योगेश अनजान।
फ़िल्मों में दो लड़कियों वाले गीत
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फ़िल्म जगत में एक दौर ऐसा आया जब ‘हंसता हुआ नूरानी चेहरा’ (पारसमणि) और ‘तुमको पिया दिल दिया कितने नाज़ से’ (शिकारी) जैसे दो लड़कियों वाले नृत्य गीत बेहद लोकप्रिय हो गए। योगेश जी जहां भी जाते उनसे दो लड़कियों वाले ऐसे गीत की फ़रमाइश की जा्ती। वैसे भी वे ज़ुल्फ़ों और अदाओं पर लिखते लिखते परेशान हो चुके थे। अब वे जीवन में कुछ नया करना चाहते थे। संगीतकार सलिल चौधरी से मिलना चाहते थे। गायि सविता बनर्जी सलिल दा के पास जाती थीं। एक दिन वे योगेश को पेडर रोड ले गईं और सलिल दा से मिला दिया। पहली मुलाक़ात में योगेश को बड़ी निराशा हुई। उन्होंने योगेश से कोई बात नहीं की। कोई किताबें पलटते रहे। कुछ देर बाद योगेश उठ कर चले आए। एक दिन अचानक गीतकार शैलेंद्र का निधन हो गया। सलिल दा शैलेंद्र से गीत लि्खाना चाहते थे। उन्हें नौजवान योगेश की याद आई। सविता बनर्जी के ज़रिए उन्होंने योगेश को दोबारा बुलवाया।
मजरूह सुलतानपुरी और गीतकार योगेश
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संगीतकार उषा खन्ना ने फ़िल्म ‘एक रात’ (1968) में योगेश का एक गीत रिकॉर्ड किया-
सौ बार बनाकर मालिक ने सौ बार मिटाया होगा
यह हुस्न मुजस्सिम तब तेरा इस रंग पे आया होगा
कई लाल तराशे होंगे, तब होंठ बनाए होंगे
दाँतों की जगह पे मोती, चुन-चुन के लगाए होंगे
ज़ुल्फ़ें काली करने को, बदली को जलाया होगा
ये हुस्न मुजस्सिम तब तेरा, इस रंग पे आया होगा

योगेश के एक दोस्त ने बताया कि यह गीत सुनकर मजरूह सुल्तानपुरी ने कहा- यह मुहब्बत का बेमिसाल गीत है। इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता। योगेश को मित्र की बात पर यक़ीन नहीं हुआ। एक दिन वे संगीतकार आरडी बर्मन से मिलने गए। वहां मजरूह साहब से मुलाक़ात हो गई। योगेश ने अपने गीत का ज़िक्र किया। मजरूह साहब बोले- हां मैंने कहा था- यह मुहब्बत का सबसे अच्छा गीत है।
अभिनेत्री सिम्मी और गीतकार योगेश
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मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ में योगेश के इस गीत ने धूम मचा दी- ‘सौ बार बनाकर मालिक ने सौ बार मिटाया होगा।’ इसे अभिनेता शेख़ मुख़्तार और अभिनेत्री सिम्मी ग्रेवाल पर फ़िल्माया जाना था। यह गीत सुनकर सिम्मी ग्रेवाल इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने निर्माता से कहा- इस गीतकार को सेट पर बुलवाइए। मैं मिलना चाहती हूँ। शूटिंग के लोकेशन पर साधारण शर्ट-पैंट पहनकर योगेश जी सुबह दस बजे पहुंच गए। सिम्मी को उन्होंने देखा मगर अपना नाम बताने की हिम्मत नहीं हुई। वे पूरे दिन वहीं बैठे रहे। शाम को पैकअप के समय सिम्मी ने निर्माता से पूछा- आपने गीतकार को बुलाया नहीं? निर्माता ने योगेश की तरफ़ इशारा करके कहा- यही तो हैं गीतकार योगेश। सिम्मी ने हैरत से कहा- ये सज्जन तो सुबह दस बजे से यहां बैठे हैं। अभिनेत्री सिम्मी ने अपनी एक ग्रुप पिकनिक में खंडाला जाने के लिए योगेश को आमंत्रित किया। अपने संकोची स्वभाव के कारण योगेश जी वहां नहीं गए।
राज कपूर और गीतकार योगेश
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फ़िल्म ‘आनंद’ में योगेश के गीत सुनने के बाद एक दिन ऋषिकेश मुखर्जी के पास राज कपूर का फ़ोन आया। उन्होंने ऋषिदा से कहा- अपने गीतकार को मेरे पास भेजिए। गीतकार योगेश तीन बार बस में बैठकर तीन दिन चेंबूर गए। तीनों बार स्टूडियो के सिक्योरिटी गार्ड ने उनको अंदर नहीं जाने दिया। इस तरह राज कपूर से उनकी मुलाक़ात होते होते रह गई।
कहीं से निकल आएं जन्मों के नाते
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“कहीं दूर जब दिन ढल जाए” फ़िल्म ‘आनंद’ (1970) के इस गीत के अंतरे में दो लाइनें हैं-
कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते
कहीं से निकल आएं जनमों के नाते

ये लाइनें गीतकार योगेश ने अपने प्रिय मित्र सत्य प्रकाश तिवारी ‘सत्तू’ के लिए लिखी हैं। योगेश के पिताजी पीडब्ल्यूडी लखनऊ में इंजीनियर थे। अचानक पिता जी गुज़र गए। योगेश ने कॉलेज छोड़ दिया। नौकरी के लिए मुंबई आने का फैसला किया। यहां उनके फुफेरे भाई बृजेंद्र गौड़ फ़िल्म जगत में सक्रिय थे। उन्होंने ‘कटी पतंग’ जैसी कई कामयाब फ़िल्मों के संवाद लिखे थे।

योगेश ने कॉलेज छोड़ा तो उनके साथ उनके मित्र सत्यप्रकाश सत्तू ने भी कॉलेज छोड़ दिया और योगेश के साथ मुंबई आ गए। दोनों मित्र बृजेंद्र गौड़ से मिलने गए। बृजेंद्र गौड़ ने उनमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। आहत मन से बाहर निकले तो सत्तू ने कहा- योगेश, अब किसी भी हाल में वापस नहीं जाना है। तुमको फ़िल्म लाइन में ही कुछ करके दिखाना है। तुम्हारे लिए मैं नौकरी करूंगा और घर ख़र्च चलाऊँगा। पांच सौ रूपए लेकर लखनऊ से मुंबई आए योगेश ने सत्य प्रकाश सत्तू के साथ अंधेरी की एक चाल में ठिकाना बनाया। कुछ दिनों बाद सत्यप्रकाश सत्तू को सीताराम मिल में नौकरी मिल गई। उन्होंने योगेश को कभी नौकरी करने नहीं दी। योगेश जी मानते हैं कि अगर मेरा दोस्त सत्तू साथ नहीं होता तो मैं मुम्बई में टिक नहीं बन पाता।

बनी बनाई धुन पर गीत लिखना
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बनी बनाई धुन पर गीत लिखना योगेश को ज़्यादा अच्छा लगता है। धुन पर लिखे गीत में नयापन लाने की गुंजाइश ज़्यादा होती है। छंद में अपनी भावनाओं को व्यक्त करते समय गीतकार एक सीमित दायरे में बंध जाता हैं। बिना किसी धुन के योगेश ने ये गीत लिखा था-
तुम जो आओ तो प्यार आ जाए
ज़िंदगी में बहार आ जाए

जब गीतकार किसी बनी बनाई धुन को आत्मसात करके उस पर गीत लिखने की कोशिश करता है तो उसी हिसाब से नई भावनाएं और कल्पनाएं उतरने लगती हैं। धुन पर लिखे हुए योगेश के कुछ गीत देखिए-
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मैंने कहा/ फूलों से/ हंसो तो वे/ खिलखिलाकर/ हँस पड़े।
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न जाने क्यूँ/ होता है/ ये ज़िंदगी के साथ/ अचानक ये मन/
किसी के जाने के बाद/ करे फिर उसकी याद/ छोटी छोटी सी बात।
★
ये दिन क्या आए/ लगे फूल हंसने/ देखो बासंती बासंती होने/ लगे मेरे सपने…।

योगेश जी ने बनी बनाई धुनों पर जो गीत लिखे वे पारम्परिक गीतों से बिल्कुल अलग एक नई शब्दावली और नए भावबोध के साथ सामने आए। उनके गीत अपनी ख़ूबसूरत ज़बान, इमैज़िनेशन और बेहतर सोच के साथ बिल्कुल अलग नज़र आते हैं। उनके गीतों में एक ऐसा जीवन दर्शन है जो दुखी मन पर मरहम लगाता है। लोगों को जीने की प्रेरणा देता है। अंधेरों में रोशनी की लकीर खींच देता है।
गीतकार योगेश के लोकप्रिय गीत
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कहीं दूर जब दिन ढल जाए।
ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय।
बड़ी सूनी सूनी है ज़िंदगी ये ज़िंदगी।
कई बार यूं ही देखा है।
मैंने कहा फूलों से हंसो तो वे …।
जानेमन जानेमन तेरे दो नयन।
ये दिन क्या आए लगे फूल हंसने।
न जाने क्यूँ होता है ये ज़िंदगी के साथ।
रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन।
रजनीगंधा फूल तुम्हारा महके यूं ही जीवन में।
जब भी कोई कंगना बोले।
नैन हमारे सांझ सकारे।
कोई रोको ना दीवाने को।
कहाँ तक ये मन को अंधेरे छलेंगे।

फ़िल्म निर्देशक ऋषिकेश मुख़र्जी और बासु चैटर्जी का गीतकार योगेश की कामयाबी में उल्लेखनीय योगदान रहा। योगेश ने ऋषि दा की आनन्द, मिली, रंग-बिरंगी फ़िल्मों के लिए और बासु दा की रजनीगन्धा, छोटी सी बात, बातों बातों में, प्रियतमा, दिल्लगी, शौक़ीन, मंज़िल आदि फिल्मों के लिए अविस्मर्णीय गीत लिखे। योगेश जी को वर्ष 2019 में महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित “वी शान्ताराम पुरस्कार ” प्राप्त हुआ था। उन्हें गीतकार शैलेंद्र सम्मान से भी विभूषित किया जा चुका है।

पिछले तीस साल में योगेश जी से कई मुलाकातें हुईं। गीतकार योगेश मुझे ‘देव’ कहकर बुलाते थे। वे मेरी ग़ज़लों के प्रशंसक थे। 12 मई 2020 को उनसे आख़िरी बात हुई। बेटा ऑस्ट्रेलिया में था और बहू मायके में। योगेश जी लॉक डाउनलोड का सामना अकेले कर रहे थे। बोले- गायक-संगीतकार सत्येंद्र त्रिपाठी बहुत प्यारे इंसान हैं। मेरा बहुत ख़याल करते हैं। मेरी दवा वग़ैरह का इंतज़ाम कर देते हैं। उन्होंने आप सबको शुभकामनाएं देते हुए कहा था-
कहाँ तक ये मन को अंधेरे छलेंगे,
उदासी भरे दिन कहीं तो ढलेंगे।

19 मार्च 1942 को लखनऊ में जन्मे गीतकार योगेश का 29 मई 2020 को 78 साल की उम्र में मुंबई में निधन हो गया। वे एसवी रोड गोरेगांव के मधुबन अपार्टमेंट में निवास करते थे। योगेश जी हमारी यादों में हमेशा अपने गीतों की तरह हंसते मुस्कुराते रहेंगे और लोगों के अंतर्मन को प्रकाशित करते रहेंगे।
फ़िल्म ‘आनंद’ में योगेश का गीत
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कहीं दूर जब दिन ढल जाए
साँझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आए
मेरे ख़यालों के आँगन में
कोई सपनों के दीप जलाए, दीप जलाए
कभी यूँ ही, जब हुईं, बोझल साँसें
भर आई बैठे बैठे, जब यूँ ही आँखें
कभी यूँ ही, जब हुईं, बोझल साँसें
भर आई बैठे बैठे, जब यूँ ही आँखें
तभी मचल के, प्यार से चल के
छुए कोई मुझे पर नज़र न आए, नज़र न आए
कहीं दूर जब दिन ढल जाए
कहीं तो ये, दिल कभी, मिल नहीं पाते
कहीं से निकल आए, जनमों के नाते
कहीं तो ये, दिल कभी, मिल नहीं पाते
कहीं से निकल आए, जनमों के नाते
घनी थी उलझन, बैरी अपना मन
अपना ही होके सहे दर्द पराए, दर्द पराए
कहीं दूर जब दिन ढल जाए
साँझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आए

Devmani Pandey : B-103, Divya Stuti,

