Homeपत्रिकाकला-संस्कृतिएक पुस्उतक के बहाने त्तर पूर्व के राज्यों की कला व...

एक पुस्उतक के बहाने त्तर पूर्व के राज्यों की कला व संस्कृति पर चर्चा

मुंबई। जितेन्द्र भाटिया आठवें दशक के प्रतिनिधि कथाकार, अनुवादक और विचारक हैं। रविवार 18 मई 2025 को यात्रा वृत्त की अपनी नई किताब “जिधर से सूरज उगता है” के साथ वे चित्रनगरी संवाद मंच में पधारे। मृणालताई ताई हाल, केशव गोरे ट्रस्ट, गोरेगांव, मुंबई में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने मयनमार की तानाशाही, बांग्लादेश में आए बदलाव, भूटान की ख़ुशहाली, उत्तर पूर्व भारत के विकास और सिक्किम के मौजूदा हालात पर सम्वाद किया और इस पुस्तक से एक अंश का पाठ किया। उनकी कुछ पंक्तियां देखिए –

“देशभक्ति या धरती से जुड़ाव वह अमूर्त, लेकिन जीती-जागती अनुभूति है जिसे गांधी बाबा ने लोगों के सुख-दुख में जीते हुए लम्बी मशक्कत के बाद अपने सारे परिधान को त्याग कर एक अदद लंगोटी में देखा था। गला फाड़कर “भारतमाता की जय” का नारा लगाने से आपका देशप्रेम सिद्ध नहीं हो जाता, और न ही नारा लगाने से इंकार करते ही आप देशद्रोही साबित हो जाते हैं।”
जितेंद्र भाटिया ने कहा कि यह किताब महज़ यात्रा वृत्त नहीं बल्कि इन प्रदेशों के इतिहास, संस्कृति और उससे जुड़े सवालों का दस्तावेज़ है। उन्होंने बताया कि मयनमार में दो तानाशाहों के बीच कुछ समय के लिए एक खिड़की खुली रह गई थी। इसी खिड़की से उन्होंने मयनमार को देखा। वहां हिंदू कम हैं। बौद्ध बहुत ज़्यादा हैं। वहां बौद्ध धर्म का उग्र स्वरूप दिखाई देता है।
शुरुआत में कार्यक्रम के संयोजक देवमणि पांडेय ने उनका परिचय दिया। जितेंद्र भाटिया के अनुसार- “राष्ट्रीयता की तंग गलियों और पर्यटक स्मारकों से आगे इन यात्राओं का रिश्ता सभ्यता की उन बस्तियों, परबतों और जंगलों से है, जहाँ प्रदेश और उसकी संस्कृति साँस लेती है और जिसे समझे बग़ैर इसकी कोई मुकम्मल पहचान बनाना मुमकिन नहीं” …
पुस्तक अंश पाठ के बाद कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। उत्तर पूर्व के सात प्रदेशों को कौन सी चीज़ जोड़ती है? कवि विनोद दास के इस सवाल पर जितेंद्र भाटिया ने कहा कि स्वतंत्रता के 40 साल बाद तक वहां विकास का काम बहुत कम हुआ। कई क्षेत्रों में आवागमन बहुत मुश्किल रहा। लेकिन अब विकास ने लोगों को जोड़ने का काम शुरू किया है। वहां की स्त्रियां बहुत ताक़तवर हैं। मेघालय में तो स्त्री सत्तात्मक समाज है। समाज को जोड़ने में इन स्त्रियों का भी योगदान है। ईसाई समाज ने शिक्षा के प्रसार के द्वारा लोगों को जोड़ा। इन प्रदेशों में धर्म की धारणाएं दूसरों से अलग हैं।
कवि रमन मिश्र के एक सवाल के जवाब में जितेंद्र भाटिया ने कहा कि भूटान में ख़ुशहाली का कारण वहां का सुशासन है। वहां राजा के बेटे साधारण स्कूलों में साधारण जनता के साथ पढ़ाई करते हैं। राजा चाहते हैं कि उनके बच्चे जन सामान्य के साथ रहकर वास्तविक राष्ट्रीयता सीखें।
कवयित्री पल्लवी मेहता के सवाल के जवाब में जितेंद्र भाटिया ने कहा कि इन प्रदेशों की सांस्कृतिक पहचान ही देश की अखंडता का मूल आधार है। शायर राकेश शर्मा के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कहा कि पिछले 20-25 सालों में नार्थ ईस्ट का विकास हुआ है लेकिन नॉर्थ ईस्ट को जितना मिलना चाहिए अभी भी उतना नहीं मिल रहा है।
कवि पत्रकार हरि मृदुल के सवाल के जवाब में जितेंद्र भाटिया ने कहा कि उत्तर पूर्व के प्रदेशों की सीमा पर जो सैनिक तैनात हैं उनका चेहरा बेहद मानवीय है। वे यात्रियों के साथ बहुत विनम्रता के साथ पेश आते हैं और भरपूर सहयोग करते हैं। डॉ अलका अग्रवाल और कवि प्रदीप गुप्ता ने सवाल पूछे। कुल मिलाकर डेढ़ घंटे की इस चर्चा में धर्म, इतिहास, संस्कृति और भाषा से जुड़े हुए कई सवाल सामने आए और उन सवालों का जितेन्द्र भाटिया ने बहुत सलीके से जवाब दिया।
मुम्बई के रचनाकार जगत से इस आयोजन में आबिद सुरती, अजय ब्रह्मात्मज, प्रो राम बक्ष, असलम परवेज़, अमर त्रिपाठी, जवाहर लाल निर्झर, सुकन्या सामंत, डॉ सुमनिका सेठी, विनीता दास, यशपाल यश, डॉ मधुबाला शुक्ल, अरुणा गुप्ता, सविता दत्त और तेजल शाह की महत्वपूर्ण सहभागिता रही।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में हरि मृदुल के संचालन में चुनिंदा कवियों ने कविता पाठ किया। इनमें शामिल थे- विनोद दास, अनूप सेठी, रमन मिश्र, राकेश शर्मा, संजय भिसे, अनिल गौड़, प्रदीप गुप्ता, देवमणि पांडेय और सुभाष काबरा।
प्रस्तुति #देवमणि_पांडेय
spot_img
RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

लोकप्रिय

उपभोक्ता मंच

- Advertisment -

वार त्यौहार