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भारत के परमाणु कार्यक्रम में एक इतिहास लिख गए डॉ. एम आर श्रीनिवासन

डॉ. एम. आर. श्रीनिवासन (मालूर रामासामी श्रीनिवासन) भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के एक प्रमुख वास्तुकार और यांत्रिक अभियंता थे। उनका जन्म 5 जनवरी 1930 को बैंगलोर (अब कर्नाटक) में हुआ था और 20 मई 2025 को ऊटी, तमिलनाडु में 95 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ ।T
श्रीनिवासन ने मैसूर में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और फिर सर एम. विश्वेश्वरैया द्वारा स्थापित यूनिवर्सिटी विश्वेश्वरैया कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग (UVCE) से 1950 में यांत्रिक इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। 1952 में उन्होंने मास्टर डिग्री पूरी की और 1954 में कनाडा के मैकगिल विश्वविद्यालय से गैस टरबाइन तकनीक में पीएच.डी. प्राप्त की ।

डॉ. एम. आर. श्रीनिवासन (मलूर रामासामी श्रीनिवासन) भारत के प्रख्यात परमाणु वैज्ञानिक और इंजीनियर थे, जिन्होंने भारत के स्वदेशी परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।   उन्होंने पावर प्रोजेक्ट्स इंजीनियरिंग डिवीजन (1974) के निदेशक और न्यूक्लियर पावर बोर्ड (1984) के अध्यक्ष के रूप में देश भर में परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं की योजना, निर्माण और संचालन की निगरानी की।  उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी वैज्ञानिक प्रगति और युवा वैज्ञानिकों को मार्गदर्शन देने की विरासत हमेशा याद रखी जाएगी।

डॉ. श्रीनिवासन का निधन (20 मई 2025) भारत के वैज्ञानिक इतिहास में एक युग का अंत माना गया। उनकी बेटी शारदा श्रीनिवासन ने कहा, “उनकी दूरदर्शी सोच और राष्ट्र के प्रति समर्पण भावी पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।”

डॉ. श्रीनिवासन ने 1955 में परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) में अपने करियर की शुरुआत की और पांच दशकों तक भारत के परमाणु कार्यक्रम को मजबूत किया।  उन्होंने डॉ. होमी जहांगीर भाभा के साथ मिलकर भारत के पहले परमाणु अनुसंधान रिएक्टर ‘अप्सरा’ (1956 में शुरू) के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो भारत के परमाणु कार्यक्रम का मील का पत्थर था।  1959 में उन्हें भारत के पहले परमाणु ऊर्जा स्टेशन के लिए प्रधान परियोजना इंजीनियर नियुक्त किया गया, जिसने भारत की परमाणु आत्मनिर्भरता की नींव रखी।

मद्रास परमाणु ऊर्जा स्टेशन (MAPS):
1967 में उन्होंने मद्रास परमाणु ऊर्जा स्टेशन के मुख्य परियोजना इंजीनियर के रूप में कार्य किया, जिसने भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

परमाणु ऊर्जा आयोग और NPCIL:
1987 में डॉ. श्रीनिवासन को परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष और परमाणु ऊर्जा विभाग का सचिव नियुक्त किया गया।
उसी वर्ष वे न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) के संस्थापक अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में 18 परमाणु ऊर्जा इकाइयों का विकास हुआ, जिनमें 7 चालू, 7 निर्माणाधीन और 4 योजना चरण में थीं।

दाबित भारी जल रिएक्टर (Pressurized Heavy-Water Reactor) के विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी, जिसने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को स्वदेशी तकनीक पर आधारित बनाया।

1990 से 1992 तक वे अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA), विएना, ऑस्ट्रिया में वरिष्ठ सलाहकार रहे, जहां उन्होंने वैश्विक परमाणु ऊर्जा नीतियों में योगदान दिया।

पुरस्कार और सम्मान:

पद्म श्री (1984): भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान।
पद्म भूषण (1990): तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान।
पद्म विभूषण (2015): दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान।
कन्नड राज्योत्सव पुरस्कार (2017) और आशियाई शास्त्रज्ञ 100 (2016) में शामिल।
इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया) का सर्वोत्कृष्ट डिज़ाइनर पुरस्कार।
केंद्रीय सिंचन और वीज मंडल का हीरक महोत्सवी पुरस्कार।

डॉ. एम. आर. श्रीनिवासन ने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई, स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा दिया और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में ऐतिहासिक योगदान दिया। उनकी उपलब्धियाँ भारत के वैज्ञानिक और तकनीकी विकास का आधार बनीं।
1955 में, उन्होंने भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) में शामिल होकर डॉ. होमी भाभा के साथ मिलकर भारत के पहले अनुसंधान रिएक्टर ‘अप्सरा’ के निर्माण में योगदान दिया, जो अगस्त 1956 में सक्रिय हुआ । 1959 में, उन्हें भारत के पहले परमाणु ऊर्जा स्टेशन के प्रमुख परियोजना अभियंता के रूप में नियुक्त किया गया।  1967 में, वे मद्रास परमाणु ऊर्जा स्टेशन के मुख्य परियोजना अभियंता बने।  1987 में, उन्हें परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष और परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव के रूप में नियुक्त किया गया। उसी वर्ष, वे न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) के संस्थापक अध्यक्ष बने ।
उनके नेतृत्व में, भारत में 18 परमाणु ऊर्जा इकाइयों का विकास हुआ, जिनमें से सात चालू, सात निर्माणाधीन और चार योजना चरण में थीं ।The News Minute+1www.ndtv.com+1

1990 से 1992 तक, वे वियना में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) में वरिष्ठ सलाहकार रहे।

1996 से 1998 तक, वे भारत सरकार की योजना आयोग के सदस्य रहे, जहाँ उन्होंने ऊर्जा और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों की देखरेख की।

2002 से 2004 और फिर 2006 से 2008 तक, वे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रहे ।

सम्मान और पुरस्कार
पद्म श्री (1984)
पद्म भूषण (1990)
पद्म विभूषण (2015)
उन्हें होमी भाभा गोल्ड मेडल, संजय गांधी पुरस्कार, कन्नड़ राज्योत्सव पुरस्कार सहित कई अन्य प्रतिष्ठित सम्मान  मिले।

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