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चौपाल को लगा अठाईसवाँ: ऐसा कोई रंग नहीं, जो चौपाल में बिखरा नहीं…

पंद्रह जून के दिन सुबह से ही काले कज़रारे बादलों ने सूरज को अपनी ओट में ले रखा था और घनघोर बरस रहे थे। ऐसे खूबसूरत दिन घर से निकलने का आनंद क्या होता है चौपाली बखूबी जानते हैं और इसीलिए ही खचाखच भरा था भवंस कॉलेज का सभागृह। चौपाल की वर्षगांठ मनाने तो पहुँचना ही था भले आंधी हो या तूफान, उस दिन आगुंतकों में युवा श्रोताओं से ज्यादा उम्र दराज़ लोग थे, कदाचित वे चौपाल को आशीर्वाद देने आए थे।

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भवंस कालेज के भव्य केंपस में नहाए-धोए, हरे रंग के वस्त्र धारे सारे पेड़-पौधे जोर-जोर से गर्दन हिलाकर आगुंतकों का स्वागत कर रहे थे।

कार्यक्रम का संचालन करने के लिए अतुल तिवारी कमर कसे तैयार थे। सुभाष काबरा की ताज़ा तरीन व्यंग्य रचना से शुरुआत हुई। अभिजीत घोषाल भी आज के लिए नई तैयारी करके आए थे। शबरी और राम-कथा में संगीत के मोती पिरोकर बेहद सुंदर प्रस्तुति दी। मनजीत सिंह कोहली ने एक शानदार कविता पेश की और राजेंद्र गुप्ता ने नरेश सक्सेना की विख्यात कविता ‘चंबल एक नदी का नाम’ को इतने भावपूर्ण तरीके से पढ़ा कि कविता अपने पूरे अर्थ के साथ श्रोताओं के कलेजे में ठक् से जाकर बजी। अक्षरों का क्षरण कभी होता नहीं, पर उन्हें जीवंत कर देने का हुनर जानते हैं गुप्ता जी। वे स्वयं कविता के मर्म में उतने गहरे उतर जाते हैं जितना कि उसका रचयिता लिखने के वक्त उतरता होगा।

उस दिन ‘फादर्स डे’ था, इसलिए यूनुस खान ने अपनी जानकारियों का पिटारा खोला तथा अनेक लोकप्रिय फिल्मी बाप-बेटों की जोड़ियों का इतिहास खंगाल डाला जो सबके लिए नया और दिलचस्प था।

पुष्पा भारती जी को शाॅल व पुष्प गुच्छ देकर कविता गुप्ता तथा बिंदल जी ने सम्मान किया तथा उनको जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। वे इस स्नेह से गदगद हो गईं और उन्होंने अपने जन्मदिन पर उपहार स्वरूप मिलने वाली भारती जी की कविताएँ सुनाईं।

लोकप्रिय संगीतकार कुलदीप जी और उनकी होनहार शिष्य मंडली अब मंच पर थी। वे हारमोनियम पर और शंकर नंदी तबले पर, फिर तो बाहर मेघ बरस रहे थे और सभागृह में झड़ी लग गई दुष्यंत कुमार, नज़ीर अकबराबादी, कबीर और मीरा के कालजयी गीतों की। उनकी तैयार की हुई कंपोजिशन पर पूरा सभागृह झूमते हुए संगत कर रहा था।

यह संयोग ही था कि चौपाल के सताईस वर्षों पर लिखे रिपोर्ताज की पुस्तक ‘चौपाल एक रंग अनेक’ (संकलनकर्ता: निर्मला डोसी) पिछले सप्ताह ही आई है। यकीनन पुस्तक के भाग्य में ऐसे गुणी लोगों के हाथों का पारस स्पर्श पाना बदा था।

मंच पर पुष्पा भारती, जावेद सिद्दीकी, आबिद सुरती, राजेंद्र गुप्ता, अशोक बिंदल, अतुल तिवारी, कविता गुप्ता, ललित भाई शाह, कुलदीप सिंह, लट्टू भाई जी, निर्मला डोसी और शिप्रा भाटी की गरिमामय उपस्थिति से मंच समृद्ध हुआ। पुस्तक का खूबसूरत आवरण बनाने वाली उदयपुर की शिप्रा भाटी स्वयं उदयपुर से आईं।

निर्मला डोसी ने पुस्तक लिखने की वजह पर प्रकाश डाला तथा चौपाल का सताईस वर्षों का लेखा-जोखा विस्तार से पेश किया।

उन्हें चौपाल की बैठकों के रिपोर्ताज को पुस्तक के स्वरूप में लाने का विचार अखबार की एक खबर पढ़ कर आया। एक जनवरी 2023 में एक खबर छपती है कि ‘रूदाद-ए-अंजुमन’ नाम की एक पुस्तक ‘लोकमित्र प्रकाशन’ से आई है।

दरअसल ‘रूदाद-ए-अंजुमन’ मुंबई के लेखकीय समाज और उसके जलसों पर लिखी किताब है, जो प्रगतिशील लेखक संघ की मुंबई शाखा के क्रिया-कलापों का कमाल का मंजर प्रस्तुत करती है।

किसी गोष्ठी या साहित्यिक समारोह में जो कहा जाता है वह सिर्फ गिनती के श्रोताओं तक ही रह जाता है, जबकि वे तमाम बातें लिपिबद्ध हो जाएं तो लाखों पाठकों तक पहुंचती हैं और वे दस्तावेज़ ऐतिहासिक बन जाते हैं। यही बात इस पुस्तक को लिखवाने का केंद्र बिंदु बनी। उन्होंने चौपाल के सताईस वर्षों की रिपोर्ताज के रूप में उपलब्ध सामग्री को संकलित करके पुस्तक का स्वरूप दिया और कहा कि इसका मोल समय की तुला पर चढ़ कर ही तय होगा, फिलहाल तो इसे लिख कर संरक्षित कर लिया है क्योंकि लिखा हुआ रह जाता है, बाकी सब चला जाता है।

जावेद सिद्दीकी साहब ने भी ‘रूदाद-ए-अंजुमन’ पर कहा कि किस तरह प्रलेस की मुंबई इकाई सर्वाधिक सक्रिय थी और यहाँ देश के शीर्ष संस्कृति कर्मी जुड़ते थे और उन्हीं की कड़ी कसौटी पर रचनाएं चढ़ती थीं और धार पाया करती थीं। उन्होंने कामना की कि वैसा ही माहौल फिर से बनाए जाने की जरूरत है।

विश्वनाथ सचदेव जी की दो कविताओं ने बड़े पशोपेश में डाल दिया कि उनका अनुशासनप्रिय पत्रकार का रूप ज्यादा प्रखर है या फिर संवेदनशील कवि का कद ज्यादा बड़ा है। यकीनन उन्होंने वक्त भले ज्यादा पत्रकारिता को दिया होगा, मगर लोकप्रियता तो एक कविता पढ़कर ही जुटा लेते हैं। फिर उस दिन तो दो गजब की कविताएं अपनी धीर गंभीर मुद्रा में पढ़कर रग-रेशे को झनझना दिया।

पहली कविता – ‘नहीं गया मैं लौटकर कभी टोबा टेकसिंह’
मंटो की कहानी ‘टोबा टेकसिंह’ की याद दिलाने के लिए काफी थी।

दूसरी – सामयिक कविता ‘साझा सच’ को तो बार-बार पढ़ा जाना और पढ़ाया जाना जरूरी है आज के विकट समय में। बड़ी सहजता से कवि पूछते हैं:

तब मैं ना था
तब तुम ना थे
बस हम थे
जो मेरा था वह तेरा था

इतनी सी सरल बात को समझाना और समझना कितना मुश्किल हो गया है। चार घंटे से ज्यादा धूनी रमा कर बैठे श्रोता भूल गए थे कदाचित कि इन बरसते मेघों में ही उन्हें घर भी जाना है और इस सभागृह को खाली भी करना है।

संगीत से चौपाल के समापन की परंपरा का निर्वहन करते हुए अनिका अग्रवाल और शर्मिष्ठा बसु ने ‘चश्मेबद्दूर’ का ‘कहां से आए बदरा’ तथा ‘गुड्डी’ फिल्म का ‘बोले रे पपिहरा’ सुना कर कार्यक्रम को संपन्न किया। इस तरह चौपाल के अट्ठाईसवें में प्रवेश का दिन यादगार गया।

चौपाल में पहली बार आई वाराणसी की कवयित्री अंकिता खत्री ने लिखा:

“मुंबई में कला, संगीत और साहित्य के वटवृक्ष के तले लगती है #चौपाल।
मुझे सारनाथ में भगवान बुद्ध के दिए प्रथम उपदेश का चित्र स्मरण हो आया जहां बुद्ध पीपल के वटवृक्ष के नीचे बैठे हैं और उनके सामने हैं पाँच शिष्य…
ज्ञानप्रदान और ज्ञानार्जन का इससे उत्तम चिन्ह और कोई हो ही नहीं सकता…”

ऐसा ही एक वटवृक्ष है चौपाल, जिसके चबूतरे पर विराजमान होते हैं परम गुणी विद्वतजन, जिनके नामों में प्रमुख हैं —
गुलज़ार जी, जावेद अख्तर जी, शबाना आज़मी जी, कुलदीप सिंह जी, राजेंद्र गुप्ता जी, शेखर सेन जी, अतुल तिवारी जी, जावेद सिद्दीकी साहब, प्रख्यात शायर हस्तीमल ‘हस्ती’ जी और कई अन्य महान हस्तियाँ।

सुभाष काबरा जी की व्यंग्य रचना से आरंभ होकर अभिजीत घोषाल जी की राम-शबरी पर आधारित गीत की प्रस्तुति के साथ ही चौपाल के प्रथम दिन से लेकर अब तक की यात्रा, संस्मरण और प्रस्तुतियों का संकलन “चौपाल एक रंग अनेक” पुस्तक का विमोचन किया गया।

लेखिका निर्मला डोसी जी ने अपने वक्तव्य में चौपाल की विशेषताओं को इंगित करते हुए बताया कि चौपाल लगभग तीन दशकों से लगातार आयोजित होने वाला एक अनुष्ठ

ान है जिसमें एक साधक के रूप में बैठकर कितने ही कलाकारों ने अपने कलाकर्म में सिद्धि प्राप्त की है।

वरिष्ठतम साहित्य साधिका पुष्पा भारती जी का ९० वां जन्मदिन मनाया गया और उन्होंने धर्मवीर भारती जी की उनके लिए लिखी अंतिम कविता का पाठ कर सबको भावुक कर दिया।

वरिष्ठ संगीत निर्देशक कुलदीप सिंह जी ने अपने शिष्यों के समूह के साथ एक से बढ़कर एक ग़ज़लें, नज़्में, कबीर, बंजारा सुनाकर मुंबई की भींगी सी शाम को यादगार बना दिया।

चौपाल के सक्रिय चौपाली अशोक बिंदल जी से रूबरू मिलना सुखद लगा।
अतुल तिवारी जी का संचालन हमेशा की तरह अतुलनीय रहा।


लता ‘हया’ की कविता — “कैसी अपनी चौपाल है”


कैसी अपनी चौपाल है
क्या चाल है, क्या ढाल है
चौतरफ़ा बैठे गुणी यहाँ
पाबंद अदब की यहाँ ज़बाँ
लटकन, अभिनय, सुर-ताल है
ऐसी अपनी…


छोटी थी तब भी प्यारी थी
सबकी ही बनी दुलारी थी
हो गई हसीं, जब हुई जवां
अब आफ़त की परकाल है
ऐसी अपनी…


हो देस के फिर परदेस ‘हया’
हर कोई इस पर फ़िदा हुआ
जो भी इससे जुड़ना चाहे
फिर उसका इस्तक़बाल है
ऐसी अपनी…


इसके सब पालक और जनक
दीर्घायु हों सब प्रलय तलक
ना चमक-धमक कम हो इसकी
इसकी हर कथा कमाल है
ऐसी अपनी…


हर चौपाली की दुआ यही
ना लगे किसी की नज़र बुरी
सब देख आज महसूस हुआ
ये इसका स्वर्णिम काल है
ऐसी अपनी…

लता ‘हया’

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