Homeदुनिया मेरे आगेकांग्रेस राज के वो काले दिन- जब पूरा देश कारागृह बन गया

कांग्रेस राज के वो काले दिन- जब पूरा देश कारागृह बन गया

26 जून की भारत की सुबह बिल्कुल अलग थी।
28 वर्ष पहले जिस स्वतंत्रता को मुश्किल से प्राप्त किया था, वही दूर हो गई थी। अपने ही लोगों ने भारत को फिर से परतंत्र बना दिया था।

हालांकि मध्यरात्रि में घोषित आपातकाल का समाचार अभी पूरे देश में फैला नहीं था। अनेक स्थानों के समाचार पत्र प्रकाशित हो गए थे, किंतु उनमें आपातकाल का समाचार नहीं था। कुछ अपवाद भी थे। दिल्ली, चंडीगढ़ और जलंधर के अधिकतम समाचार पत्र उस दिन छप नहीं सके। कारण था, उन सब की बिजली काट दी गई थी।

चंडीगढ़ के ‘ट्रिब्यून’ के कार्यालय में पुलिस घुस गई और चलती हुई प्रिंटिंग प्रेस बंद की। ‘मदरलैंड’ के कार्यालय को पुलिस ने सील किया और संपादक के आर मलकानी को गिरफ्तार किया। दोपहर / शाम को कुछ समाचार पत्रों ने सप्लीमेंट निकाले। पर अनेक स्थानों पर वह जप्त किए गए।

प्रेस सेंसरशिप लग गई थी। अब समाचार पत्र या साप्ताहिक / मासिक पत्रिकाओं में एक भी शब्द सरकारी अधिकारियों की अनुमति के बिना छप नहीं सकता था।
जिस अभिव्यक्ति स्वतंत्रता को संविधान सभा की बैठकों में बाबासाहब अंबेडकर जी ने जोर-शोर से उठाया था, उसका कांग्रेस की सरकार ने गला घोट दिया..!

इंदिरा जी का गुस्सा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर था। उन्हें लगता था कि यह संघ के स्वयंसेवक ही गुजरात और बिहार जैसे आंदोलन खड़े कर रहे हैं। इसलिए पूरे देश में आदेश थे, संघ के पदाधिकारियों को, प्रचारकों को पकड़ने के। तब तक संघ पर प्रतिबंध नहीं लगा था। वह लगा 4 जुलाई को।

किंतु 26 जून को जब संघ के सरसंघचालक बालासाहब देवरस अपने पूर्व निर्धारित प्रवास पर जाने के लिए नागपुर स्टेशन पर पहुंचे, तो उन्हें गिरफ्तार कर येरवडा (पुणे) जेल में पहुंचाया गया। अटल बिहारी वाजपेई और लालकृष्ण आडवाणी को बेंगलुरु में गिरफ्तार करके वहीं के जेल में रखा गया।

किंतु फिर भी संघ के अनेक प्रचारक, कार्यकर्ता भूमिगत हो गए। नानाजी देशमुख को गिरफ्तार करने के लिए इंदिरा जी का विशेष आग्रह था। किंतु वह पुलिस के आने से पहले ही चकमा देकर निकल गए। सरकार्यवाह माधवराव मुळे भी भूमिगत हो गए। जॉर्ज फर्नांडीज, सुब्रमण्यम स्वामी, रविंद्र वर्मा आदि भी पुलिस के हाथों नहीं लगे। लगभग 45,000 से 50,000 संघ के स्वयंसेवक, कार्यकर्ता प्रारंभ के दिनों में गिरफ्तार हुए। बाद में ये आंकड़ा बढ़ता गया।

अनेक स्थानों पर पुलिस ने जुल्म ढाया। जबरदस्त अत्याचार किए। कोई कार्यकर्ता भूमिगत हुआ, तो उसके परिवार वालों को डराया, धमकाया, जेल में बंद किया। पुलिस को गिरफ्तार करने के लिए किसी आरोप की, कागजात की या वारंट की आवश्यकता ही नहीं थी।
‘मिसा’ (MISA – Maintenance of Internal Security Act) पर्याप्त था। इस कानून के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को बिना कोई आरोप या वारंट के न्यायालय में पेश न करते हुए 18 महीने जेल में बंद रखा जा सकता था।

एक वर्ष पहले जब यह कानून इंदिरा जी ने लोकसभा, राज्यसभा में पारित करवाया था, तो दोनों सदनों को आश्वस्त किया था कि इस कानून का उपयोग स्मगलर्स और कालाबाजारियों के विरोध में किया जाएगा।
किंतु प्रत्यक्ष में क्या हुआ..?
हजारों – हजारों सामाजिक कार्यकर्ताओं को, जननेताओं को, राष्ट्रभक्तों को मिसा के अंतर्गत बंद कर दिया गया।

उन दिनों स्थिति ऐसी थी –
नो अपील
नो वकील
नो दलील..!
सारा देश हुकुमशहा की चंगुल में आ गया था।

28 जून को ही विद्याचरण शुक्ल सूचना प्रसारण मंत्री बनाए गए। उन्होंने संजय गांधी को आश्वस्त किया कि ‘जो आई के गुजराल न कर सके, वह मैं करके दिखाऊंगा। मैं प्रेस वालों की अकड़ उतारकर उन्हें ठिकाने लगाऊंगा’। और उन्होंने किया भी वैसे ही।

पंजाब केसरी के संपादक जगत नारायण, इंडियन एक्सप्रेस के अरुण शौरी, कुलदीप नैयर जैसे वरिष्ठ पत्रकारों को गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया गया।
पांचजन्य उन दिनों लखनऊ से प्रकाशित होता था। उसका प्रकाशन भी बंद कर दिया गया। अनेक पत्रकारों को मिसा के अंतर्गत बंद किया। संघ के मुखपत्र कहे जाने वाले नागपुर के ‘तरुण भारत’ दैनिक में, संपादक, सह-संपादक, व्यवस्थापक, विज्ञापन प्रमुख.. सभी जेल के अंदर थे।

लेकिन अभी भी इंदिरा गांधी आश्वस्त नहीं थीं। उनके चुनाव का केस सुप्रीम कोर्ट में था। यदि वहां भी इलाहाबाद हाईकोर्ट जैसा निर्णय आया, तो बहुत बड़ी गड़बड़ होगी। इस स्थिति में क्या किया जाए..?
इंदिरा गांधी ने सोचा, ‘इस समस्या को जड़ से ही समाप्त कर देते हैं। संविधान को ही बदल देते हैं। यदि संविधान में लिख देंगे कि प्रधानमंत्री पर कभी भी, किसी भी परिस्थिति में मुकदमा नहीं हो सकता, तो सारी झंझट ही समाप्त हो जाएगी’।

बस, संजय गांधी, बंसीलाल, ओम मेहता और अन्य दरबारी मंत्री लग गए इस काम में। आनन – फानन में संसद का सत्र बुलाया गया।

4 अगस्त को संसद में ‘चुनाव सुधार अधिनियम बिल’ पेश किया गया, जो संविधान की प्रमुख धाराओं को ही बदल दे रहा था। यह 39 वा संविधान संशोधन था। इसमें उन सारे मुद्दों को लिया गया, जिनके कारण इंदिरा जी का चुनाव रद्द हो रहा था।

यह प्रस्ताव 5 अगस्त को लोकसभा में पारित हुआ। पर इसमें एक समस्या आई। इस पारित प्रस्ताव में कहा गया कि ‘भ्रष्टाचार के कारण यदि चुनाव रद्द हो रहा है, तो उम्मीदवार राष्ट्रपति को आवाहन कर सकता है। राष्ट्रपति, चुनाव आयुक्त की सलाह से निर्णय दे सकते हैं’। यह भी गड़बड़ ही था।
इंदिरा जी को तो पूरी क्लीन चिट चाहिए थी…

इसलिए तुरंत 40 वा संविधान संशोधन प्रस्तुत किया गया। इसमें प्रधानमंत्री के चुनाव संबंधी विवाद को न्यायालय के बाहर रखा गया। 7 अगस्त को यह 40 वां संशोधन लोकसभा में आया। ऐसे किसी प्रस्ताव के लिए जो कम-से-कम समय दिया जाता है, वह भी नहीं दिया। मात्र ढाई घंटे में यह महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित कराया गया। लोकसभा में विपक्ष बचा ही कहां था..?

दूसरे दिन 8 अगस्त को यही संशोधन राज्यसभा ने मात्र 1 घंटे में पारित किया। अब इसको कानूनी जामा पहनाने के लिए दो तिहाई राज्यों की विधानसभाओं ने इसे पारित करना आवश्यक था।
कोई बात नहीं…
दो को छोड़कर बाकी सारी विधानसभाओं में कांग्रेस बहुमत में थी। दूसरे दिन, 9 अगस्त को आवश्यक विधानसभाओं ने इस संशोधन को पारित किया। 10 अगस्त को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर हुए और इंदिरा गांधी के संरक्षण का यह कानून बन गया।

इस संविधान संशोधन के लिए इतनी जल्दी क्यों की गई..?
कारण, 11 अगस्त 1975 को इंदिरा गांधी के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी थी..!
संविधान पर, कांग्रेस ने इतने निर्ममता से किए हुए बलात्कार को देखकर, स्वर्ग में संविधान निर्माता डॉ बाबासाहेब अंबेडकर जी की आत्मा निश्चित रूप से कांप उठी होगी..!

 

1975 के अगस्त में, अपनी सुरक्षा के लिए संविधान संशोधन करने के पश्चात, इंदिरा गांधी और संजय गांधी लग गए अपने अगले लक्ष्य की ओर।
दो बातें प्रमुखता से साध्य करना थी —
एक: बचे – खुचे विपक्षियों को और संघ के स्वयंसेवकों को समाप्त करना। ऐसी दहशत निर्माण करना, कि देश के किसी भी नागरिक को सरकार के विरोध में बोलने की हिम्मत ही ना हो।
और दूसरा: जनसंख्या कम करके, इस देश को सुंदर बनाना।

अभी तक जॉर्ज फर्नांडिस, नानाजी देशमुख, सुब्रमण्यम स्वामी आदि भूमिगत थे। अनेक संघ के प्रचारक सरकार के हाथ नहीं लगे थे। इनको गिरफ्तार तो करना ही था, साथ ही दहशत भी निर्माण करनी थी।

संजय गांधी कैसी दहशत निर्माण करते थे उसके उदाहरण –
7 अप्रैल 1976 के दिन, ‘दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन’ के चुनाव हुए। अब बार एसोसिएशन क्यों न हो, दहशत के इस माहौल में क्या और कैसे चुनाव हो सकते हैं..? इसलिए इस चुनाव में संजय गांधी के चेले डी डी चावला बड़े ही सहजता से जीत जाएंगे, ऐसा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को लग रहा था।

पर हुआ उल्टा।
डी डी चावला को पटखनी देकर, दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद संघ के स्वयंसेवक, प्राणनाथ लेखी जीतकर आए। यही किस्सा ‘जिला बार एसोसिएशन’ में दोहराया गया। वहां पर भी कंवरलाल गुप्ता चुनकर आए।

फिर क्या था… संजय गांधी का खून खौला।
उसने दूसरे ही दिन कोर्ट परिसर में बुलडोजर भेज दिए। जिला और सेशंस कोर्ट के आसपास अनेक वकीलों के कार्यालय थे। संजय के आदेश पर, उस दिन 1000 से ज्यादा कार्यालयों पर बुलडोजर चलाया गया। यह छुट्टी का दिन था।

जैसे ही वकीलों को पता चला, वह भागते – दौड़ते आए, अपना सामान, कागजात बचाने। पर कुछ नहीं हो सका। पुलिस ने उन्हें बड़ी निर्ममता से लाठी मार-मार के भगाया।

वकीलों में आक्रोश निर्माण हुआ। दूसरे ही दिन, इस घटना का विरोध करने के लिए कुछ वकीलों ने, मुख्य न्यायाधीश टी वी आर ताताचारी को ज्ञापन देने का निश्चय किया। ज्ञापन देने यह 43 सीनियर एडवोकेट्स एक बस से जा रहे थे। पुलिस ने बस को रोका। सभी को गिरफ्तार किया। 24 को ‘मिसा’ में और 19 लोगों को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में बंद किया।

अगले ही सप्ताह और 700 कार्यालय ध्वस्त कर दिए गए। कुल 98 वकीलों को मिसा में बंद किया गया।
यह थी संजय गांधी की गुंडई..!
किसी की क्या हिम्मत रहेगी सरकार के विरोध में बोलने की..?

कुछ करने के लिए इंदिरा गांधी ने एक 20 सूत्रीय कार्यक्रम जारी किया, तो संजय गांधी का 5 सूत्रीय कार्यक्रम था। यह कार्यक्रम अच्छे थे। किंतु इन्हें करने के लिए आपातकाल की आवश्यकता नहीं थी, और इन्हें लागू किया गया जुल्म और दहशत के आधार पर।

संजय गांधी के दिमाग में आया, दिल्ली को सुंदर करना है। तुरंत आदेश जारी हुए। नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली के बीच, दरियागंज के पहले, दिल्ली गेट और तुर्कमान गेट आदि स्थानों पर घनी बसाहट है।

संजय गांधी के आदेश पर 13 अप्रैल 1976 को वहां बुलडोजरों की फौज खड़ी हुई। यह बैसाखी का दिन था। बस्ती में धूमधाम थी। 16 अप्रैल को स्थानिक हिंदू और मुस्लिम बुजुर्गों ने, मंत्री एच.के.एल. भगत से मिलकर निवेदन दिया कि हमारे घरों को ना गिराया जाए। मंत्री जी ने आश्वस्त भी किया।

किंतु 19 अप्रैल से बुलडोजर आगे बढ़ने लगे। उन्हें रोकने के लिए सारी बस्ती सड़क पर उतर आई। दोपहर को पुलिस ने जमा हुई भीड़ पर लाठी भांजना चालू किया। आंसू गैस के गोले भी फोड़े। किंतु क्या पुरुष, क्या महिला, क्या बच्चे… कोई भी हिलने तैयार नहीं।

इस घटना से कुछ दूरी पर पर्यटन विभाग का एक सरकारी होटल था – होटल रणजीत। चार सितारा होटल। इस होटल के सामने के हिस्से में, चौथी मंजिल पर एक कमरा था। उसमें संजय गांधी, रुखसाना सुल्ताना के साथ बैठे हुए दूरबीन से यह सारा दृश्य देख रहा था। उसके पास वॉकी-टॉकी भी थी।

जब भीड़ नहीं हट रही यह संजय गांधी ने देखा, तो कहते हैं उसने पुलिस आयुक्त को गोली चलाने के आदेश दिए।

और फिर जो रणक्रंदन तुर्कमान गेट पर हुआ, उसे देखकर जलियांवाला बाग के नरसंहार की याद आ गई।
14 बुलडोजर लोगों को रौंदते हुए अंदर घुसे। 1000 से ज्यादा घर जमींदोज किए गए।
150 से ज्यादा लोग मारे गए। कुचले गए। पुलिस ने वहां के रहवासियों को न सिर्फ बुरी तरीके से पिटा, वरन् उनका बचा-खुचा माल भी लूट कर ले गए।
अगले 45 दिन, तुर्कमान गेट परिसर कर्फ्यू में कराह रहा था..!

जो व्यक्ति, मंत्री, सांसद, विधायक तो छोड़िए, साधारण पार्षद भी नहीं था, ऐसे संजय गांधी की दबंगई ऐसे चलती थी..!
(इस दुर्दांतक, भयानक घटना के बारे में एक अक्षर भी समाचार पत्रों में नहीं छप सका। सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल की दबंगई भी ऐसी ही थी..!)


संजय गांधी के दिमाग का दूसरा कीड़ा था – नसबंदी।
इस नसबंदी की मुहिम ने इतना आतंक मचाया, की लाखों पुरुषों का जीवन बर्बाद हुआ। अनेकों ने इसके कारण आत्महत्या की।

इंदिरा गांधी के चुनाव क्षेत्र, रायबरेली के पास, सुल्तानपुर का किस्सा –
यहां के नारकादि गांव में जबरन नसबंदी करने के विरोध में जब गांव वाले इकट्ठा हुए, तो पुलिस ने उन पर गोली चलाई।
13 लोग मारे गए। सैकड़ों जख्मी हुए। पास के एक गांव में 25 लोग गोली से उड़ा दिए गए। अनेक हमेशा के लिए अपाहिज बन गए। पूरे उत्तर भारत में जबरन नसबंदी कार्यक्रम में सैकड़ों लोग, पुलिस की गोली के शिकार हुए।

राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने, संजय गांधी के सामने अपने आप को साबित करने के लिए नसबंदी यह माध्यम माना। लक्ष्य से भी ज्यादा नसबंदी ऑपरेशंस अनेक राज्यों ने किए।

देश में दहशत का वातावरण था। न्यायालय में जाने का कोई रास्ता नहीं था, क्योंकि कोई सुनवाई ही नहीं थी। आपातकाल में बंद सारे कैदी, राजनीतिक बंदी थे। उन्हें उसी प्रकार की सुविधाएं अपेक्षित थीं। किंतु कहीं भी उनका पालन नहीं हुआ।

ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया और जयपुर की महारानी गायत्री देवी को दिल्ली के तिहाड़ जेल में, एक गंदी कोठड़ी में रखा। उनके साथ वेश्याएं और गुनहगार स्त्रियों को रखा गया, ताकि इन दोनों राजपरिवार की स्त्रियों का मनस्वास्थ्य खराब हो।


ऐसे निराशाजनक वातावरण में, बेंगलुरु के कारागृह से अटल बिहारी वाजपेई जी ने एक कविता लिखी, जो चोरी छिपे भूमिगत पत्रों के माध्यम से सारे समाज में पहुंचने लगी।
इस कविता ने उन दिनों कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रखा था –


टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते..

सत्य का संघर्ष सत्ता से,
न्याय लड़ता निरंकुशता से,
अंधेरे ने दी चुनौती है,
किरण अंतिम अस्त होती है।

दीप निष्ठा का‍ लिए निष्कम्प,
वज्र टूटे या उठे भूकंप,
यह बराबर का नहीं है युद्ध,
हम निहत्थे, विरोधी है सन्नद्ध।

हर तरह के शस्त्र से है सज्ज,
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज।
किंतु फिर भी जूझने का प्रण,
पुन: अंगद ने बढ़ाया चरण।

प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार,
समर्पण की मांग अस्वीकार।
दांव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते।
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते..!

(लेखक भारत के ऐतिहासिक अतीत और गौरव पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं और राजनीतिक व समसामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं)
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