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योग से योगा क्लासेज़ शुरू होने तक का वह दौर…और अब यह दौर

बचपन से हर कोई किसी न किसी रूप में योग से जुड़ा होता है। योग के प्रकार कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग, हठ योग और राज योग माने जाते हैं। विद्यालयीन जीवन की शुरुआत होने के साथ ही कर्म योग जुड़ जाता है। विद्यालय की पढ़ाई के कर्म के साथ ज्ञान योग तो आता ही है। गुरु के प्रति भक्ति का भाव भी बचपन में अधिक होने से भक्ति योग भी बाल्यकाल में अधिक मासूम होता है। हठ योग और बचपना तो एक-दूसरे के पर्याय ही हैं। और रही बात राज योग की, तो राजा हो या रंक, हर बच्चा अपने घर का राजकुमार/राजकुमारी ही होता है। इस प्राचीन भारतीय परंपरा को वर्ष 2014 में वैश्विक मान्यता मिली, जब 21 जून को विश्व योग दिवस मनाना प्रारंभ हुआ। भारतीय जनमानस में तो यह पहले से ही था।
तीन-चार दशक पहले जिम वे ही जाते थे जिन्हें दंड पेलने होते या पहलवान बनना होता। आम घरों में व्यायाम का अर्थ पैदल चलना, सैर पर जाना या फिर योग करना ही होता था। सूर्य नमस्कार करते बुजुर्ग कई घरों में देखे जा सकते थे और उनकी देखा-देखी बच्चे भी सूर्य नमस्कार करते। सूर्य के 12 अलग-अलग नामों के मंत्र के उच्चारण के साथ कम से कम 12 सूर्य नमस्कार लगाना ही, यह परिपाटी होती थी। मैं जिस स्कूल में पढ़ती थी, वहाँ भी पहला कालखंड शारीरिक गतिविधि का ही होता था, जिसे बाद में पीटी पीरियड के नाम से जाना जाने लगा। उसे टालने के लिए जो देर से पहुँचता, उसे स्कूल के मैदान के दस चक्कर दौड़कर लगाने पड़ते। मतलब एक तरफ कुआँ, दूसरी तरफ खाई…तो बच्चे कुएँ में गिरना ही पसंद करते और पहले कालखंड में समय पर उपस्थित रहते। जो अच्छा योगाभ्यास करते, उन्हें मंच पर बुलाया जाता। एक तरह से वे दूसरों का नेतृत्व करते। योगाभ्यास की कमान संभालते। वे हमारी नज़रों में हीरो होते थे।
घर पर बाकी दिन तो पिता के योगाभ्यास के समय हम स्कूल में होते। रविवार को हम पिताजी को योगाभ्यास करते देखते। उन्होंने कभी अट्टहास नहीं किया कि हमें रविवार को उनके साथ योग करना ही है पर सहज कौतूहल में हम सुबह उठकर छत पर चले जाते, जहाँ पिताजी योगाभ्यास कर रहे होते। माँ तो हर दिन अलसुबह प्राणायाम, भ्रामरी आदि करती थी पर इतनी सुबह हम कभी न उठ पाएँ। हालाँकि उन दिनों रविवार को भी देर तक सोने का अर्थ अधिकतम सुबह आठ बजे तक सोना ही होता था। रविवार को भी सुबह सात बजे से हमें उठाने की कवायद शुरू हो जाती कि चलो उठो सात बज गए, चलो साढ़े सात बज गए….उठो-उठो आठ बज गए। मतलब सुबह आठ बजे तक जो सोता उसके लिए मान लिया जाता कि यह आज देर तक सोया है या देर से उठा है।
खैर, तो हम छत पर जाते, वहाँ पिताजी योग कर रहे होते। हमें देखते तो हमें भी योग करने के लिए प्रेरित करते। हर आसन का नाम बताते। यह धनुरासन, यह चक्रासन, यह उष्ट्रासन, यह ताड़ासन…। स्कूल से निकलकर कॉलेज जाने लगे तब तक योग फैशन बनने लगा था। योग को योगा कहा जाने लगा था और योगा क्लासेज़ होती थीं। कुछ फैशन में, कुछ करके देखते हैं के कौतूहल में उस क्लास को कई लोग जॉइन करते। वहाँ प्रणालीगत तरीके से योग सिखाया जाता। हर आसन को करने की विधि, अब धीरे-धीरे साँस लेंगे, अब धीरे-धीरे छोड़ेंगे की कॉमेंट्री के साथ क्लास होती। क्लास के अंत में शवासन होता। शवासन में योग ट्रेनर कहते -कल्पना कीजिए कि आप पहाड़ की ऊँची चोटी पर हैं…
मतलब इस तरह से जो योग हमारे घरों में ऐसे ही सहज साधना की तरह हो जाता था, वह व्यावसायिक या कहें तो प्रोफेशनल लुक लेने लगा था। यह नब्बे का दौर था। आर्थिक उदारीकरण के साथ वैश्विक बाजार के दरवाजे खुल रहे थे। योगा क्लासेज़ की फीस देकर योगा सीखने-सिखाने का दौर चल पड़ा था। प्राचीन परंपरा में हमारे घरों से हमें पता चला था कि योग के आदि गुरु तो भगवान् शिव हैं, जिन्हें आदि योगी कहा जाता है या महर्षि पतंजलि को योग का जनक माना जाता है। अष्टांग योग का नाम बचपन में न भी पता हो तब भी हमें पाठ पढ़ाया जा रहा था कि हमें यम-नियम का पालन करना है। यम मतलब सामाजिक नैतिक सिद्धांत जैसे अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह तो नियम मतलब शौच, संतोष, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान। योग के आसन मतलब शारीरिक मुद्राएँ तो सीख ही रहे थे जिससे शरीर स्वस्थ और लचीला रहे पर प्राणायाम जैसी श्वास नियंत्रण तकनीक भी जान रहे थे। प्रत्याहार मतलब इंद्रियों को वश में करने का पाठ हम बड़े-बूढ़ों की देखा-देखी मतलब उनके आचरण से सीख रहे थे। धारणा या एकाग्रता, ध्यान, समाधि की ओर भी हम अनजाने ही बढ़ रहे थे।
योग आज भी यह प्रासंगिक है लेकिन केवल किसी एक दिन के लिए हमें इसे रोज़ अपनाते हुए अपनी जीवन शैली का अंग बनाना होगा जैसे हमसे बड़ों ने बनाया था और हम तक पहुँचाया था। अब हमें इसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाना है।
(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं और साहित्य, कला व संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन करती हैं) 
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