एक विज्ञापन है जिसमें एक दादी मैगी बनाने किचेन में जाती है फिर पहले पोते को फिर पोती को फिर बहू को किचन में बुलवा कर खुद साइड में जो जाती है और बहु से ही मैगी बनवाती है। यह सीख है सभी सासों को कि किस तरह बहुओं से काम करवाया जाए और सास बुरी भी न बने।
एक अन्य विज्ञापन में एक स्मार्ट पढ़ी लिखी महिला अपने मृत पति की तस्वीर के सामने उसे कोसती हुई नजर आती है कि उसके पति ने इंश्योरेंस नहीं लिया तो अब वह अपने और बच्चों को कैसे पालेगी। इस विज्ञापन से स्पष्ट सीख मिलती है कि तुम्हारे जाने के बाद तुम्हें कोई याद नहीं करेगा बस तुम्हारे कर्म याद किए जाएंगे। अरे भाई पढ़ी लिखी महिला है पति को कोसने की बजाय कुछ काम ही कर ले जीवन में स्वावलंबन भी कोई चीज होती है।
एक विज्ञापन ने तो हद ही कर दी जब एक छोटा बच्चा पावडर साबुन के दाम में लिक्विड साबुन मिलने पर खुश हो कर गाना गाते हुए घर आ रहा है। यह विज्ञापन हमें बच्चों को पैसे की कीमत सिखाने का काम करता है यह बात अलग है कि यह विज्ञापन बहुत ही बेहूदा लगता है।
आजकल विज्ञापन भी समय के साथ बोल्ड हो गए हैं। पहले सेनेटरी नैपकिन के विज्ञापन में नीला रंग इस्तेमाल होता था अब तो सीधे लाल रंग ही इस्तेमाल होता है। यह हमारी किस सोच का प्रतीक है भगवान ही जाने। अब तो कुछ विज्ञापन ऐसे हैं जो परिवार के साथ बैठ कर देखे नहीं जा सकते। अब क्या करें यही है हमारा नया विकसित समाज।
कोचिंग क्लास के विज्ञापन तो बड़े मजेदार होते हैं एक ही बच्चा जो अच्छी रैंक ला कर पास हुआ है वह अमूमन हर कोचिंग में पढ़ता था। वाकई गजब का बच्चा होगा जो कई सारी कोचिंग में एक साथ पढ़ता होगा।
और तो और अब तो दवाई और अस्पतालों तक के विज्ञापन मीडिया में छाए हुए हैं। फलां अस्पताल आएं और इलाज पर फलां फलां छूट पाएं, चार टेस्ट करवाने पर एक टेस्ट फ्री, दो हड्डी टूटने पर एक का प्लास्टर फ्री इत्यादि। अरे भाई तुम्हारे अस्पताल में हार्ट का इलाज सस्ते में जो रहा है तो क्या कोई सपना आएगा कि छह महीने बाद आने वाले हार्ट अटैक का इलाज अभी करवा ले कि चलो पैसे बचेंगे। एक ही हड्डी टूटे तो जानबूझ कर दूसरी भी तोड़े कि इसका तो फ्री इलाज हो जाएगा। हे भगवान घोर कलयुग है।
पान मसाला, गुटका इत्यादि के विज्ञापन जिनमें बड़े बड़े सितारे इन चीजों की मुखालफत करते हैं क्या असल जिंदगी में कभी इन चीजों को छूते भी होंगे? सोचने की बात है। पिछले दिनों एक कार्टून देखा था जिसमें गुटके का विज्ञापन करने वाले सितारे की फोटो के साथ एक मारियल से व्यक्ति की फोटो लगाई थी और बताया था कि विज्ञापन करने वाला और असल जिंदगी में उसे खाने वाला कैसा होता है। लेकिन क्या करें कोई इन बातों को समझे तो। न तो जनता न ही सरकार इसे समझती है या समझ करभी नासमझ बनना पड़ता है। जनता त्रस्त है और क्षणिक सुख के पीछे भागती है और सरकार को अपना राजकोष भरने से मतलब है।
खैर, ये तो सब बड़े बड़े विद्वानों की बहस का विषय है हमें क्या हम तो और विज्ञापन देखें और मौज करें। बस यही तो जीवन का सार है हमें इससे क्या भारत पाकिस्तान की लड़ाई हो तो हमें क्या हम तो बॉर्डर के पास नहीं रहते, ईरान इजरायल की लड़ाई से हमें क्या वो उनकी जानें, यहां तक कि रास्ते में कोई दुर्घटना का शिकार नजर आए तो भी हम वहां से निकल लेते हैं हमें क्या?
अरे हम तो विषय से भटक गए। चलो वापस मुद्दे पर आते हैं। हां तो कुछ विज्ञापन वाकई में दिल पर छाप छोड़ जाते हैं जैसे एक पुराना विज्ञापन जिसमें एक बच्चा घर छोड़ने के लिए निकल पड़ता है और उसे दादाजी रास्ते में मिलते हैं और बोलते हैं कि घर पर गरम गरम जलेबियाँ बनी है तो मासूम बच्चा अपना गुस्सा भूल कर दादाजी के साथ घर को चल देता है। यह हमें सिखाता है कि कभी भी गुस्से को ज्यादा देर तक मन में मत रखो। बालसुलभ मन रखो और जो मन को अच्छा न लगे उसे भूलने का प्रयास करो।
एक विज्ञापन में एक व्यक्ति होटल के एक कमरे के एक रात के दस हजार के बिल को पहले तो सही बताता है लेकिन जब उसे पता चलता है कि वही कमरा दूसरे को आधे से भी कम दाम में मिला है तो उसका चेहरा देखने लायक हो जाता है। यह मनुष्य की जलन की प्रवृत्ति को दर्शाता है। ऐसा ही एक विज्ञापन था जिसमें “तेरी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद कैसे” की टैग लाइन थी और यह लाइन आम जीवन में आज भी बहुत बार बोली जाती है। यह सर्फ पाउडर के विज्ञापन की लाईन थी। ऐसे ही कुछ विज्ञापन होते हैं जिसमें दिखाई गई पूरी कहानी तो याद रहती है पर विज्ञापन किस चीज का है वह याद ही नहीं रहता जैसे वो स्टेडियम में एक लड़की का दौड़ के आना और झूम के डांस करना ये विज्ञापन तो याद है पर ये किस चीज का था ये याद नहीं। कुछ विज्ञापनों की केवल टैग लाइन ही याद रह जाती है जैसे “पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें”। ये तो वही बात हो गई मुर्गा जान से भी गया और खाने वाले को मज़ा भी नहीं आया।
समाचार पत्र और टी वी के विज्ञापनों में साफ लिखा रहता है कि इन विज्ञापनों में किए गए दावों से उनका कोई लेना देना नहीं उपभोक्ता अपने विवेक से निर्णय लें लेकिन फिर भी इनसे प्रेरित होकर हर व्यक्ति कभी न कभी तो चीजें खरीद ही लेता है।
जो भी हो विज्ञापनों से कलाकार और मीडिया की भरपूर कमाई होती है और इन्हीं विज्ञापनों की बदौलत हम अपने पसंदीदा कार्यक्रम इत्यादि देख, पढ़ और सुन पाते हैं। इसलिए कुछ पाने के लिए जैसे कुछ खोना पड़ता है वैसे ही अपने मनपसंद कंटेंट का मजा लेने के लिए विज्ञापनों को तो झेलना ही पड़ेगा।
(लेखिका इन्दौर में रहती हैं, स्वांतः सुखाय लिखती हैं)

