Homeसोशल मीडिया सेउन्होंने अंग्रेज बनकर अंग्रेजों को ही छका दिया

उन्होंने अंग्रेज बनकर अंग्रेजों को ही छका दिया

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के इंग्लिश डिपार्टमेंट में एक प्रोफ़ेसर थे भगवत दयाल। 1930-40 का दौर था। भगवत दयाल अमीर घर की औलाद थे। पढ़ाई-लिखाई करने इंग्लैण्ड भेजे गए। फिरंगी मुल्क की आबोहवा और अंग्रेजों की संगत का उन पर यह असर हुआ कि ख़ुद भी आधे अंग्रेज़ बन गए।

वापस घर लौटे, नौकरी हासिल की मगर इंग्लैण्ड न छूटा। क़िस्सा तो यह तक चलता है कि उन्हें अपना असल नाम भगवत दयाल पसंद नहीं आता था, सो वे लोगों को अपना नाम बताते – प्रोफ़ेसर बी. डायल। हरिवंशराय बच्चन ने भी अपनी आत्मकथा में उनका ज़िक्र किया है।

दयाल साहब अंग्रेज़ों की तरह रहते, खाते, बोलते। इंग्लैण्ड से लाया हुआ पाइप हमेशा हाथ में थामे रहते। तम्बाकू भरने, पाइप सुलगाने, कश खींचने, पाइप बुझाने, उसकी सफ़ाई करने, उसे फिर से भरने और सुलगाने का क्रम दिन भर चलता रहता। यूनिवर्सिटी के लड़के और बाकी मास्टर दिन भर उनकी कारगुजारियों को दिलचस्पी से देखा करते।

जेब में एक बेहद साफ़-सुथरा सफ़ेद रूमाल हमेशा रहता। गलियारों में चलते पसीना आता तो उसी से मुंह को पोंछते रहते। लड़कों के बीच लतीफ़ा चला करता – “दयाल सर तो खांसते भी अंग्रेज़ी में हैं।”

जिन दिनों भारत छोड़ो आन्दोलन अपनी पूरी उठान पर था, प्रोफ़ेसर साहब यूनिवर्सिटी हॉस्टल के वार्डन बना दिए गए। अंग्रेज़ों का जैसा जीवन बिताने के बावजूद दयाल सर भीतर से पक्के देशभक्त थे। पुलिस से बच कर भागते स्वतंत्रता सेनानी उनके हॉस्टल में पनाह पाया करते, जहां उन्हें ख़ास मेहमानों की तरह सारी सुविधाएं मिला करतीं।

एक दफ़ा मुखबिरों ने पुलिस तक यह खबर पहुँचा दी। अंग्रेज़ कप्तान सिपाही लेकर हॉस्टल आ धमका। पुलिस के आने का पता चला तो भगवत दयाल ने आनन-फानन अपना सबसे महँगा सूट पहना, परफ्यूम लगाई और पाइप सुलगा कर कप्तान से रू-ब-रू हुए।

कुछ देर बाद कप्तान भगवत दयाल के ड्राइंग रूम में उम्दा दार्जिलिंग चाय सुड़क रहा था। खांटी क्वीन्स इंग्लिश बोलते हुए दयाल साहब ने उसे अपनी फ़रेबी बातों में लिपझा लिया। अंग्रेज़ कप्तान ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया कि यूनिवर्सिटी हॉस्टल में हर चीज़ सामान्य थी और यह भी कि “मिस्टर बी. डायल अपने ही आदमी हैं।”

पूरी यूनिवर्सिटी में उनकी सिर्फ फ़िराक़ गोरखपुरी से बनती थी। फ़िराक़ भी उन्हीं के डिपार्टमेंट में प्रोफ़ेसर थे। एक दिन फ़िराक़ बोले, “भगवत दयाल, तुम्हारी अंग्रेज़ी अब लोगों की समझ में कुछ-कुछ आने लगी है। ऐसा करो एक चक्कर फिर से विलायत का लगा आओ।”

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