Homeपुस्तक चर्चारस्किन बॉन्ड की आत्मकथा ‘अपनी धुन में’

रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा ‘अपनी धुन में’

हुमायूँ के मक़बरे के क़रीब उस वीराने में ईंटों से बनी दो कमरों की वह छोटी-सी झोंपड़ी थी। वहाँ ऐसी झोंपड़ियों की पूरी एक क़तार थी, जो एक दूसरे से थोड़ी दूरी पर बनाई गई थीं और तराशी हुई बाड़ उन्हें अलग करती थी; ये अस्थायी और कामचलाऊ रिहाइशें अफ़सरों और उनके परिवारों के लिए बनाई गई थीं। अब यह दिल्ली का भीड़भाड़ वाला लोकप्रिय इलाक़ा है, मगर 1942 में यहाँ झाड़-झंखाड़ से भरा जंगल था, जहाँ काले हिरण और नीलगाय खुले घूमते थे।

डैडी नौ बजे दफ़्तर चले जाते और शाम को छह बजे के क़रीब लौटते। इतवार और कभी-कभी शनिवार को भी उनकी छुट्टी रहती। उनका दफ़्तर साउथ ब्लॉक में वायु सेना मुख्यालय में था, जो वायसराय के महलनुमा आवास (बाद में राष्ट्रपति भवन) के एक विंग से जुड़ा हुआ था। ‘कोड्स एंड सिफ़र्स’ में उनका काम बहुत ही गोपनीय और रहस्यमय था, और अगर उन्होंने दुश्मन के किसी महत्त्वपूर्ण कोड की गुत्थी सुलझाई भी हो तो मुझे कभी नहीं बताया।

जाड़ों में वह रॉयल एयरफ़ोर्स की अपनी नेवी ब्ल्यू वर्दी पहनते थे; और गर्मियों में ख़ाकी वर्दी। वह हमेशा ही जोश से भरे और फ़ुर्तीले दिखाई देते—बढ़िया नैन-नक़्श, छोटा क़द और ऊर्जा से भरपूर वह ऐसे इनसान थे, जिनमें लड़कों जैसा आकर्षण था। उस वर्दी से मुझे रश्क होता था, मैं अक्सर उनकी टोपी और लटदार हैट पहनकर इठलाता, और उनमें फ़ोटो खिंचाने की ज़िद करता। और सलामी के बग़ैर वर्दी का मतलब ही क्या हुआ? मैं देखता था कि डैडी के मातहत उन्हें सैल्यूट करते हैं और वे अपने अफ़सरों को सैल्यूट करते हैं। जल्दी ही मैंने भी अपनी एड़ियाँ मिलाकर सैल्यूट करना सीख लिया, और जो भी सामने पड़ जाता सबको सैल्यूट करता!

डैडी हमेशा जल्दी उठते थे, वह हमारा नाश्ता तैयार करते, और मेरा पसन्दीदा सफ़ेद मक्खन बनाने के लिए क्रीम फेंटते। नाश्ते के बाद वह चले जाते थे, और मैं पूरे दिन मनमानी करने के लिए घर में अकेला रह जाता। शुरू में कुछ दिन तो मैं डैडी को जाननेवाले एक अंग्रेज़ परिवार के यहाँ दोपहर का खाना खाने चला जाता था। वह परिवार पड़ोस के डेरे में रहता था, मगर उनके ऊधमी और दादा क़िस्म के लड़के मुझे पसन्द नहीं करते थे, पसन्द तो ख़ैर मैं भी उन्हें नहीं करता था, इसलिए डैडी ने एक ख़ानसामा रख लिया, जो दोपहर को घंटे-भर के लिए आता और मेरे लिए खाना बना जाता।

वहाँ पढ़ने के लिए कुछ कॉमिक्स और देखने के लिए पोस्टकार्ड्स का एक बड़ा संग्रह था। वह पुराना ग्रामोफ़ोन और पुराने रिकॉर्ड तो थे ही—मुझे नहीं लगता कि डैडी को नये रिकॉर्ड ख़रीदने का वक़्त मिल पाया होगा। लेकिन इससे मुझे कोई दिक़्क़त नहीं थी; ग्रामोफ़ोन मेरे ख़ालीपन का ज़बरदस्त साथी था, जिसे चलाते ही कमरा ऑपेरा के गानों से गूँज उठता। डैडी ने मुझे समझा रखा था कि रिकॉर्ड्स को एहतियात से इस्तेमाल करूँ और उन्हें सीधा ही रखूँ वरना गर्मी की वजह से वे टेढ़े-मेढ़े हो जाएँगे और उन्हें बजाना मुमकिन नहीं होगा।

दिल्ली की वह पहली गर्मी मेरी स्मृति में अब भी एकदम साफ़ है। इतनी गर्म जगह पर मैं कभी नहीं रहा था। जेठ की वो झुलसा देनेवाली लू भी मुझे याद है—बलूचिस्तान और राजस्थान के रेगिस्तान से आनेवाली धूल भरी वे हवाएँ किसी आफ़त से कम नहीं थीं। दिल्ली में अब शायद ही वैसी लू चलती हो। पर कुछ ही दिनों में मुझे उस गर्मी की आदत हो गई।

दस या ग्यारह बजे के आसपास भिश्ती आता, बकरे की खाल से बनी उसकी मशक में ताज़ा पानी होता था। डेरे में कोई नल नहीं था, इसलिए वह टब और एक बड़े ड्रम में पानी भर देता और सामने के दरवाज़े पर लटकी ख़स की चिक पर पानी छिड़क जाता। इसकी ठंडक का अद्भुत असर होता था। हालाँकि यह असर आधे घंटे से ज़्यादा नहीं रहता था, लेकिन ख़स की भीनी और ताज़गी भरी गन्ध मुझे भाती थी और पानी के छिड़काव से गीली हुई बाहर की मिट्टी से उठती गन्ध भी मुझे पसन्द थी। यह दिल्ली में एयर-कंडीशनिंग के चलन से बरसों पहले की बात है। हमारे घर में एक छोटा-सा टेबल-फ़ैन था, मगर बिजली अभी वहाँ तक नहीं पहुँच पाई थी।

कमरों की ठंडक की वजह से तमाम क़िस्म के जीव-जन्तु खिंचे चले आते थे। मुझे बिच्छुओं और कनखजूरों का ध्यान रखना पड़ता था, जो कभी-कभी जूतों या ख़ाली मग या कपड़ों की टोकरी में आराम करने चले आते थे। एक सुबह मैंने ग्रामोफ़ोन का ढक्कन हटाया तो देखा कि अन्दर एक बड़ा बिच्छू सोया हुआ है। मदद के लिए मैं ज़ोर से चिल्लाया, मगर आसपास कोई नहीं था। सो ग्रामोफ़ोन का ढक्कन मैंने धड़ाम से बन्द कर दिया, और शाम को डैडी के घर लौटने तक उसे नहीं खोला। बिच्छू तब तक रहस्यमय ढंग से ग़ायब हो चुका था।

घर की छिपकलियाँ थीं, जो दीवारों पर दौड़ते-दौड़ते कभी-कभी मेज़ या फ़र्श पर हल्की थप्प की आवाज़ के साथ गिर पड़ती थीं। रात को, तमाम सियार मिलकर हुआँ-हुआँ करते और उनके क्रन्दन का सिलसिला देर तक चलता रहता, मगर वे घरों में नहीं आते थे; इसके उलट जंगली बिल्लियाँ, दिन हो या रात, किसी भी समय खाने की तलाश में अन्दर चली आती थीं। कभी-कभी वे मुझ पर फुफकारतीं और गुर्रातीं भी, मगर बिल्लियों से मुझे डर नहीं लगता था तो जवाब में मैं भी फुफकारता और उन पर गुर्राता।

डेरे के अन्दर और आसपास इतने सारे जंगली जीव होने के बावजूद मैं, महल में ऐशोआराम से रहनेवाले किसी शहंशाह की तरह, अपने-आप में काफ़ी ख़ुश था। मैं आश्वस्त रहता कि छह बजे डैडी घर आ जाएँगे, वह मुझसे बातें करेंगे या बाहर कहीं घुमाने ले जाएँगे या फिर डाक टिकटों का अपना संग्रह निकाल लेंगे। टिकटों के बॉक्स और एलबम डाइनिंग-टेबल पर फैलाकर, मिट्टी के तेल वाले लैम्प की रोशनी में, हम नये टिकटों के बारे में बात करते, या पुराने टिकटों की दुर्लभता पर, अक्सर हम स्टेनली गिबन्स के बेशक़ीमती कैटलॉग के पन्ने पलटते, और देखते कि टिकटों का कोई सेट पूरा हुआ है या नहीं।

उन्होंने सिर्फ़ एक बार मुझसे माँ के बारे में पूछा था—क्या वह कभी-कभी मुझे बाहर घुमाने ले जाती थीं? और उनके दोस्त कौन थे? ‘एनिड की एक चिट्ठी आई थी,’ उन्होंने कहा।

ज़ाहिर है कि डाह की मारी आंटी एनिड ने उन्हें पिकनिक, डांस पार्टियों, उनमें हमेशा ही मौजूद मिस्टर एच, मौज-मस्ती की तलाश में घूमते फ़ौजियों और मेरी माँ समेत दूसरे लोगों के मज़े करने के बारे में सारा ब्योरा उन्हें लिख भेजा होगा। जबकि घर के लिए कमानेवाले ख़ुद वह, नई दिल्ली की धूल और तपिश के बीच कोड्स और सिफ़र्स से जूझ रहे थे। और बड़े हो रहे एक बेटे की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी उन पर थी, सो अलग।

इसमें से ज़्यादातर बातें, ज़ाहिर है कि सही थीं, और सचमुच उन बातों को मैं डैडी से छिपा नहीं सकता था; छिपाना भी नहीं चाहता था। सही हो या ग़लत, मैं उन्हीं की तरफ़ था।

इतवार को हम दिल्ली और उसके आसपास घूमने जाते थे। हुमायूँ का मक़बरा पास ही था; भले ही वहाँ तमाम राजा, रानी और राजकुमार दफ़्न हैं मगर वह एक शानदार इमारत है, जो आसपास फैले हुए बबूल और कीकर के जंगलों से बड़ी ख़ूबसूरती से ऊपर उठती हुई, इनसानी उद्यम के वसीयतनामे सरीखी लगती है। पुराना क़िला भी बहुत दूर नहीं था। यहाँ डैडी ने मुझे कुतुबख़ाना और वेधशाला की ओर जानेवाली सीढ़ियाँ दिखाईं। यह बादशाह हुमायूँ का पसन्दीदा ठिकाना था।

उन्होंने मुझे बताया, ‘जिस शाम हुमायूँ की मौत हुई, वह शुक्र तारे के दिखने का इन्तज़ार कर रहा था।’

‘वह मर कैसे गया?’ मैंने पूछा।‘कहते हैं कि वह तेज़ी से सीढ़ियाँ उतर रहा था, तभी उसे ठोकर लगी और वह लड़खड़ाकर गिर पड़ा और उसकी मौत हो गई। सिर में लगी चोट से उसकी खोपड़ी चटक गई थी।’

अँधेरे में डूबी और डरावनी वे सीढ़ियाँ भयानक और चक्करदार थीं। अपनी कल्पना में मैं किसी को उन सीढ़ियों से लुढ़कता हुआ देख पा रहा था।

कभी-कभार हम और ज़्यादा दूर चले जाते थे, लाल क़िले और उसकी गुम्बद वाली इमारतों तक, जहाँ से सुस्त, मगर अभी तक साफ़, नदी दिखाई देती थी।

गर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्तहमीं अस्त-ओ हमीं अस्त-ओ हमीं अस्त।

मुग़ल शहंशाहों के मंडपों में से एक की दीवार पर लगे शिलालेख पर यही इबारत दर्ज थी—धरती पर अगर कहीं जन्नत है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है। इतने विशाल क़िले की प्राचीर का पैदल चक्कर लगाने के बाद मैं इस बुरी तरह थका हुआ और भूखा होता कि मुझे इसके जन्नत होने का भरोसा हरगिज़ नहीं हो पाता था, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के जलपान कक्ष में पहुँचकर मुझे ज़्यादा ख़ुशी होती। वहाँ स्टेशन अधीक्षक अंकल फ्रेड के साथ हम काफ़ी सहज महसूस करते थे। अंकल फ्रेड मेरे पिता के थोड़े-से दोस्तों में से एक थे।

स्टेशन की ऊपरी मंज़िल पर होने की वजह से यह जलपान कक्ष, रेलवे प्लेटफ़ॉर्म के शोर-शराबे, इंजनों की शंटिंग, गार्ड की सीटी, कुलियों की चीख़ और बड़े भारतीय स्टेशनों की पहचान बन चुके कर्कश ध्वनियों के कोलाहल (यह पहचान तो ख़ैर अब भी है), से दूर एक शान्त जगह थी। वहाँ के खाने का मेन्यू बहुत सीमित था, फिर भी किसी ‘बड़े होते लड़के’ के लिए ठीक ही था—चिकन या मटन कटलेट (उन्हें रेलवे कटलेट कहा जाता था), शोरबे वाला मटन या सब्ज़ी, पुलाव या चावल, और डेज़र्ट के तौर पर एकदम बेज़ाइक़ा ब्लांमांज़ या कस्टर्ड पुडिंग। मैंने कटलेट और करी खाई, लेकिन पुडिंग छोड़ दिया। वे रेफ़्रीजरेशन के शुरुआती दिन थे, और आइसक्रीम एक दुर्लभ चीज़ थी।

घर में अपने पीने का पानी हम सुराही में ठंडा करते थे—मिट्टी की सुराही में पानी भरकर उसे छाया वाली जगह पर रख देते थे। घर में एक डोली भी थी, यह एक छोटी-सी अलमारी थी, जिसमें सामने की तरफ़ जाली लगी होती थी, और जिसमें फल, सब्ज़ियाँ और रसोई का दूसरा सामान रखा जाता था। डोली के चारों पायों के नीचे पानी से भरे हुए कटोरे रखे जाते ताकि चींटियाँ अन्दर रखी खाने की चीज़ों तक न पहुँच पाएँ। इतने जतन के बाद भी, कुछ चींटियाँ दावत उड़ाने के लिए अपनी पसन्दीदा चीज़ों तक पहुँच ही जाती थीं—शुगर क्यूब्स, केले, क्रीम रोल—कुछ भी जो मीठा हो, चिपचिपा हो। आप साँपों, चूहों, छिपकलियों और चमगादड़ों से बचाव कर सकते हैं, मगर चींटियों का ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते। वे दृढ़तापूर्वक अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती ही रहती हैं—जर्मन पैंज़र रेजिमेंट की तरह, अनुशासित और अटल।

सुदूर यूरोप में उन पैंज़र रेजिमेंटों का पलड़ा काफ़ी भारी था। युद्ध में ब्रिटेन और उसके सहयोगियों की हालत पतली थी। सारा यूरोप जर्मनों के हाथ में आ गया था, सिंगापुर और मलाया पर जापानियों का क़ब्ज़ा हो गया था। बर्मा होते हुए भारत आनेवाली सड़क शरणार्थियों से भरी पड़ी थी—भारतीय, यूरोपियन, यूरेशियन शरणार्थी। ब्रिटेन के जहाज़ों को डुबाया जा रहा था, ब्रिटिश विमानों की तादाद ज़्यादा थी। भारत में, आज़ादी की माँग दिन-ब-दिन मज़बूत हो रही थी। नई दिल्ली में संकट के बादल गहराने लगे थे।

युद्ध से मेरा कोई सरोकार नहीं था। मेरे डैडी ही मेरी दुनिया थे, और जब वह इतने बीमार हुए कि उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा तो पहली बार मैं फ़िक्रमन्द हुआ। यह मियादी मलेरिया के उनके शुरुआती झटकों में से एक था। वह तीन-चार दिनों तक अस्पताल में रहे। दिन में पड़ोसी मेरा ख़याल रखते और रात को भिश्ती का बेटा सोने के लिए मेरे पास आ जाता। वह मेरा हमउम्र था, या शायद एक या दो साल बड़ा। शान्त तबीयत वाले उस लड़के की त्वचा धूप में गहरे भूरे रंग की हो गई थी। वह मोटी सूती बनियान और ख़ाकी निकर पहने रहता, जो उसके लिए ख़ासी बड़ी थी। मेरा वह ख़ामोश साथी रसोईघर में सोता था। दो छोटे लड़के, एक बहिष्कृत और एक अर्ध-अनाथ, एक दूसरे को सोहबत और सहारा दे रहे थे…उसकी शख़्सियत और सोहबत ने मुझ पर छाप ज़रूर छोड़ी होगी, क्योंकि यही अनुभव मेरी पहली कहानी का आधार बना, क़रीब दस साल बाद वह कहानी—‘द अनटचेबल्स’—बम्बई से निकलनेवाली पत्रिका ‘द इलस्ट्रेटेड वीकली’ में छपी।

डैडी अस्पताल से लौट आए। अभी वह पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे; कमज़ोर लग रहे थे, खाना भी बहुत कम खाते थे। मेरा अन्दाज़ा है कि उन्होंने अस्पताल से जल्दी छुट्टी ले ली थी क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं था कि घर पर अकेला मैं ढंग से रह पाऊँगा। अपनी ताक़त और फ़ुर्ती वापस पाने के लिए कुछ दिनों तक वह घर पर रहकर आराम करते रहे, और चूँकि वह कुछ और करने के लायक़ नहीं थे, उन्हें ख़ुश रखने के लिए मैं ग्रामोफ़ोन पर उनके पसन्दीदा रिकॉर्ड बजाता रहता। अब भी उन्हें हल्का बुख़ार था, और गर्म दोपहर में पसीने से लथपथ बिस्तर पर उनके पास लेटकर करूसो को ‘चे गेलिदा मन्निना’ गाते हुए सुनना अजीब अनुभव था—
चे गेलिता मन्निनाशे ला ला सी रिसकलदार

(नन्हे हाथ तुम्हारे कितने ठंडे हैं/आओ इन्हें मैं जीवन की ऊष्मा देता हूँ मृत्यु का बोध मुझे नहीं था, लेकिन जाने क्यों मुझे डर लगने लगा कि मैं  अपने पिता को खो दूँगा। कुछ दिनों में वह पूरी तरह अच्छे हो गए तो मुझे राहत मिली, और मेरा सारा डर काफ़ूर हो गया। ऐसा लगता कि वह कभी बीमार ही नहीं पड़े।

कुछ महीनों के बाद हमने वह झोंपड़ी छोड़ दी। वह परिवार के साथ रहनेवाले अफ़सरों के लिए थी, और वहाँ परिवार के नाम पर अकेला मैं ही था। डैडी के अफ़सर हमेशा पूछा करते थे कि मेरी देखभाल के लिए माँ यहाँ क्यों नहीं रहतीं। इसलिए उन्होंने कर्ज़न रोड (अब कस्तूरबा गांधी मार्ग) से थोड़ी दूरी पर अतुल ग्रोव रोड की एक बन्द गली में कमरे किराए पर ले लिये। यह जगह कनॉट प्लेस के बहुत क़रीब थी, जो उन दिनों नई दिल्ली की कारोबारी और पेशेवर गतिविधियों का केन्द्र था।

spot_img
RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

लोकप्रिय

उपभोक्ता मंच

- Advertisment -

वार त्यौहार