जिन्हें लगता है कि पंडित जी आए दो चार मंत्र बोले और दक्षिणा (पैसा) लेकर चले गए, ये पोस्ट उन्हीं पागलों के लिए ही है…
एक बार गौर से देखें कि एक आचार्य बनने हेतु 9 साल की आयु से ही कितनी तपस्या करनी होती है, प्रातः 4 बजे से नींद का त्याग करना, भीषण ठंड में ठंडे जल से 4 बजे स्नान करके व्याकरणादि शास्त्रों का स्वाध्याय करना, कठिन दिनचर्या, नियमित एवं नियंत्रित जीवन शैली, अच्छे अच्छे पकवान से दूर रहना, कोई पिकनिक नही, कोई सिनेमा-फ़िल्म आदि नही।
माता-पिता, भाई-बहन, सगे संबन्धियों के प्रेम-वात्सल्य से वंचित होकर रहना।
घर परिवार, सगे संबंधियों के विवाह आदि उत्सव से दूर, सामाजिक महोत्सवों से दूर… और क्या क्या बताएं।
जिन्हें ऐसा लगता है कि आचार्य फ्री का खाते हैं, वो एक बार अपने 9 साल के बच्चे को दो चार दिन के लिए किसी (संस्कृत पाठशाला) आश्रम में छोड़ कर देखें… जीवन का वास्तविक साक्षात्कार हो जायेगा।
आप किसी ब्राह्मण के एक मंत्र का मूल्य कभी नहीं दे सकते, यह वास्तविक सत्य है क्योंकि उसके पीछे कितना परिश्रम, त्याग, अभ्यास आदि करना पड़ा है वह सब आपकी कल्पनाओं से बहुत दूर का विषय है।
ब्राह्मण से हाथ मत मिलाना, उसके पैर छूना हमारी संस्कृति है।

