Homeहिन्दी जगतजनभाषा में न्याय जनता का जन्मसिद्ध अधिकार है

जनभाषा में न्याय जनता का जन्मसिद्ध अधिकार है

संविधान निर्माण के समय जो भी स्थितियां या कारण रहे हों, मैं समझता हूं कि संविधान का अनुच्छेद 348 जनतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं है। किसी भी देश में वहां के नागरिकों को उस देश की भाषा में न्याय तो मिलना ही चाहिए। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा अपवाद होगा जहाँ के न्यायालयों में वहाँ के लोगों को उसे देश की भाषा में न्याय न मिलता हो। संविधान का अनुच्छेद 348 हमें आज भी अंग्रेजों की गुलामी का एहसास करवाता है। संविधान का यह अनुच्छेद देश की जनता को उसकी भाषा में न्याय से वंचित करता है।

अदालत में किसी व्यक्ति का मुकदमा चल रहा है और उसे पता न हो कि उसका वकील क्या कह रहा है, न्यायाधीश क्या कह रहा है और निर्णय क्या हो रहा है? जो न्यायपालिका उसे गूंगा और बहरा बना दे, उसे न्याय कैसे कहा जा सकता है? उसे सही कैसे ठहराया जा सकता है? ऐसी स्थिति तो राजा महाराजाओं के समय में भी नहीं थी। संविधान के अनुच्छेद 348 की व्यवस्था अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों के अनुकूल हो सकती है पर जनता के अनुकूल बिल्कुल नहीं है

यह अत्यंत आवश्यक है कि जिस व्यक्ति द्वारा याचिका दायर की गई है या इसके विरोध याचिका दायर की गई है उसे पता लगना चाहिए न्यायालय में क्या हो रहा है। उसे अपनी बात न्यायालय में रखने का अधिकार भी होना चाहिए, जो उसकी भाषा में ही संभव है

यहां एक बात ध्यान देने योग्य है, देश की जनता संविधान के लिए नहीं है, बल्कि भारत का संविधान जनता के हित के लिए है। यही संविधान संसद को जनहित के लिए आवश्यकतानुसार संविधान संशोधन की शक्ति भी प्रदान करता है। इसलिए मैं समझता हूं कि अनुच्छेद 348 को संशोधित करते हुए इसमें ‌संविधान के अनुच्छेद 350 के उपबंधों के अनुसार किया जाना चाहिए, जिसमें यह कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति व्यथा निवारण के लिए देश के किसी भी हिस्से में संघ में और उस राज्य में प्रयुक्त होने वाली भाषा में अपना आवेदन या अभ्यावेदन दे सकता है। ठीक यही बात देश के उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालयों में भी होनी चाहिए

अंग्रेजी, जो कि औपनिवेशिक भाषा है, यानी अंग्रेजों की गुलामी की भाषा है,  जो भारत के नागरिकों की ही भाषा नहीं है, जो संविधान की अष्टम अनुसूची में भी नहीं है, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में उस भाषा में न्याय की अनिवार्यता की बात को किसी भी तरह जनतंत्र के अनुकूल नहीं माना जा सकता। यदि अंग्रेजी को रखना भी है तो वैकल्पिक भाषा के रूप में रखा जा सकता है।


अब आते हैं दूसरी बात पर। संविधान के अनुच्छेद 348(2) में उपबंध है कि किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में, जिसका मुख्य स्थान उस राज्य में है, हिन्दी भाषा या राज्य की राजभाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा

लेकिन आगे चलकर अनुच्छेद 348 में एक पेंच फंसा दिया गया

1965 की मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक 21 मई 1965 को आयोजित की गई थी। उसमें अनुच्छेद 348 के प्रतिकूल निर्णय लिया गया।

“The Cabinet Committee’s decision dated 21.05.1965 has stipulated that consent of the Hon’ble Chief Justice of India be obtained on any proposal relating to use of a language other than English in the High Court.”

यह निर्णय संविधान में नहीं था, फिर भी लागू कर दिया गया।

शुरुआत में राजस्थान (1950), उत्तर प्रदेश (1969), मध्य प्रदेश (1971) और बिहार (1972) के उच्च न्यायालयों में भाषा परिवर्तन के प्रस्ताव इसी प्रक्रिया के तहत मंज़ूर हुए। लेकिन फिर यह प्रक्रिया अटक गई

तमिलनाडु, गुजरात, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल राज्यों के प्रस्ताव लंबे समय से लटके हुए हैं क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने सहमति नहीं दी

RTI के तहत हर्पाल सिंह राणा को जानकारी मिली कि:

“उच्चतम न्यायालय के पूर्ण पीठ द्वारा व्यापक विचार विमर्श के बाद दिनांक 16.12.2015 को इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। पहले भी इस प्रस्ताव को संकल्प दिनांक 7.5.1997, 15.12.1999 एवं 11.10.2012 के द्वारा अनुमति नहीं दी गई है।”

इससे स्पष्ट है कि 1965 के निर्णय ने जनता के भाषा अधिकार का मार्ग अवरुद्ध कर दिया


मैं समझता हूं कि यह निर्णय संविधान में प्रदत्त जनभाषा में न्याय के अधिकार की हत्या के समान था। अब जब माननीय गृह मंत्री ने यह कहा है कि “भारत में अंग्रेज़ी बोलने वालों को शर्म आएगी”, तो जनभाषा में न्याय का यह बंद दरवाजा खोलने का इससे उत्तम समय नहीं हो सकता

1960 में राष्ट्रपति के आदेश में भी यह कहा गया था:

“उच्चतम न्यायालय अन्ततः अपना सब काम हिन्दी में करे, यह सिद्धान्त रूप में स्वीकार्य है…”

अब जब प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, विधि मंत्री और न्यायपालिका के अनेक पूर्व व वर्तमान न्यायाधीशों ने भी जनभाषा में न्याय की आवश्यकता को स्वीकार किया है, तो कोई कारण नहीं कि यह मार्ग न खुले।


(लेखक वैश्विक हिंदी सम्मेलन के निदेशक हैं)

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