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तन को ही नहीं, मन को भी भिगो देती है बारिश की बूंदें

सावन भादों बहुत चलत है, माघ पूस में थोरी, अमीर खुसरो यूँ कहें तू बूझ पहेली मोरी’ और उत्तर दे देते थे ‘मोरी’ (नाली)। ‘सावन के अंधे को हर जगह हरा ही हरा दिखता है’, यह कहावत ऐसे ही नहीं बनी होगी। सावन की जब झड़ी लगती है और तो रुकने का नाम नहीं लेती। वह आँखों से बरसात करवाती है तो कभी मन का मोर उसके साथ नाच उठता है, कभी कागज़ की नावों के साथ मन भी बहता चला जाता है, कभी सावन के झूलों के साथ यादों की हिलोर ऊँची पेंग भरने लगती है।

कई बार ऐसा क्यों होता है कि यह समझ ही नहीं आता कि बारिश बाहर हो रही है या भीतर। अहमद फराज़ कहते हैं – “शायद कोई ख्वाहिश रोती रहती है, मेरे अंदर बारिश होती रहती है।”

महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ लिखा, नाटककार मोहन राकेश ने उस पर ‘आषाढ़ का एक दिन’… बारिश ने, बादलों ने हमेशा लुभाया है, केवल कवि मन को नहीं, केवल प्रेमी-प्रेमिकाओं को नहीं बल्कि हर उस मन को, जो मन से कलाकार है

किसी ने इंद्रधनुषी तूलिका से आकाश रंग देने का मन बना लिया, किसी ने सितार की झंकार से बरसात से होड़ लगा ली, कहीं तबला-पखावज बादलों की गड़गड़ाहट से जुगलबंदी करने लगा तो कहीं किसी गायक ने मिया मल्हार छेड़ दिया।

बादलों के छा जाने से केवल मन ही नॉस्टेलजिक नहीं हुआ, वाद्य भी उतर गए जिन्हें छोटी हथौड़ी से चढ़ाना पड़ा, पूछ लीजिए किसी गायक-वादक से, वह बताएगा बादल भरे दिनों में सितार-तानपूरे-तबले को कैसे कसना पड़ जाता है।

कसावट बढ़ती है तो आँखों के बाँध आँसुओं को भी नहीं थाम पाते और चार्ली चैप्लिन की तरह कइयों का मन करता है कि भरी बरसात में बाहर निकल जाए ताकि किसी को बहते आँसुओं का पता न चले

मन उदास क्यों होता है यह तो मन को भी पता नहीं होता और तब जी करता है कॉफ़ी का मग लेकर खिड़की में चुपचाप बैठ लिया जाए, किसी ग़ज़ल को सुना जाए या मन-मर्जी की कोई किताब पढ़ने के लिए उठा ली जाए।

एकांत में बैठा मन जब तृप्त होता है तो वह दोस्तों के साथ बारिश में भीगने की योजना बनाने के लिए हुलस उठता है। बारिश की राह में यारों की टोलियाँ निकल पड़ती हैं, किन्हीं पहाड़ों पर, किन्हीं बाँधों पर और गर्म भुट्टे, पकौड़े की याद और हरी मिर्चियों का तीखापन दोस्ती को गाढ़ा करता है।

चाय पीने वालों के लिए यह चाय के साथ इश्क करने-सा मौसम होता है। इधर बारिश हुई, उधर चाय की केतली तैयार

बारिश का कोलाज़ कई रंगों को समेटे होता है। उन दिनों जब 1 जुलाई से स्कूल शुरू हुआ करते थे, तब स्कूल के पहले ही दिन बारिश होती ही थी। नया बस्ता, नई कॉपी-किताबें, नया यूनिफ़ॉर्म, नए जूते और नई कक्षा में साथ हो लेती नई-नई बारिश

कॉलेज के दिनों में बारिश और कैंटीन का अलग नाता बन जाता था। बारिश की बूँदों को चाय के साथ सुड़गते हुए पीना और कोई सिगरेट के कश ले तो उसे झिड़कना जैसे बारिश की लड़ी सा चला आता।

प्यार की पहली बारिश और साथ भीगने की कसक, जिन्होंने इसका अनुभव नहीं किया जैसे उन्होंने प्यार ही नहीं किया। और शादी के बाद मायके जाने को हुलसाती पहली बारिश

नौकरी में देर से पहुँचने का एक बहाना-सी बनती बारिश — कि बारिश में अटक गए थे, इसलिए देर हो गई। कभी बारिश ने अटकने का मौका दिया, कभी बारिश ने सच में कहीं फँसा दिया, तो कभी बारिश ने घंटों ट्रैफ़िक जाम भी लगवा दिया। बारिश जो न करे, कम है।

घनघोर बरसात में न रेनकोट काम आता है, न छाता और तेज़ हवा के साथ छाते के उल्टे हो जाने के किस्से हर किसी के पास होते हैं। तब किसी पेड़ के नीचे खड़े होने पर भीगने से बच नहीं पाते, केवल मन को समझाते हैं कि इस तरह नहीं भीगेंगे, लेकिन भीगते तब भी हैं

तब कोई ‘साइंसदा’ दिमाग वाला कहता है पेड़ के नीचे मत खड़े रहो, बिजली पेडों पर ही गिरती है और सिर को गीले होने से बचाने की नाकामयाब कोशिश में कभी सिर पर हथेली रख, कभी किताब रख, कभी दुपट्टे या आँचल का छोर रख दूसरे किसी ओट में जाने की ज़द्दोजहद भी बारिश के साथ याद आती है।

बारिश जिस घर में आती है, वहाँ अलग कहानी दे जाती है। कहीं प्रेयसी की याद से चितवन को जलाती है, कहीं अकाल के बाद की राहत लाती है, कहीं बाढ़ का मातम पीछे छोड़ जाती है

कोई चातक की तरह राह देखता है तो कोई ग्रीष्म से तड़पकर बारिश को पुकारता है। वैसे तो मेघों को किसी दूत की ज़रूरत नहीं होती, नवतपा तपता है तो हर कोई उसे सहन कर जाता है कि अबके बारिश अच्छी होगी।

मेंढक टर्राने लगते हैं, काली चींटियाँ ज़मीन पर आ जाती हैं, तब भी कहते हैं कि बारिश होने के आसार हैं।

बारिश जनवासे को सूना करती है लेकिन बारिश ही रक्षाबंधन, हरियाली तीज जैसे त्योहार लाकर हाथों पर मेहंदी रच देती है।

पैदल चलने वालों के लिए बारिश अलग हुनर दिखाती है, साइकिल या दुपहिया चलाने वालों को अलग नखरे दिखाती है तो कार में बैठे लोगों से भी कार एक किनारे लगवा देती है

बड़ी गाड़ी जब किसी पर कीचड़ उछालती जाती है तो पूरी ऊर्जा से फब्ती निकलती है लेकिन छपाक से गीले हो जाने का मज़ा ले लिया, यदि यह सोच लिया तो वही हँसी में बदल जाती है

बारिश तो उस अबोध बच्चे की तरह होती है जो आपकी ओर देख हँस पड़ता है, आप हँसना चाहें, न चाहें

बादल उन दादाजी की तरह हैं जो रौबदार आवाज़ में दहाड़ते से हैं ‘चार दीवारी में दुबक रहे हो कि मैं आ रहा हूँ’

वर्षा तो उस दादी की तरह है जो धूप से राहत दिलाती है और दादाजी की बात पर चिकुटी भर कहती है ‘जो गरजते हैं, वो बरसते नहीं’

बारिश कभी उस माँ की तरह होती है जिसे धरती की फटन, टूटन, दरार देखी नहीं जाती और स्नेह की नमी से उसे भर देती है

वह उस बहन की तरह है जो वृक्षों को छोटा भाई मान अपना सारा दुलार लुटाने आ जाती है।

यह उस भाई की तरह भी होती है जो किसान को उसके श्रम का प्रतिदान खुले हाथ से दे देता है और फसलें लहलहा उठती हैं।

भीगी आँखों की कोर से बारिश कहती हैआँसुओं में मत भीगो, भीगो आनंद की जलधार में….रसधार में और बुढ़ापे की ओर बढ़ते थके कदमों को भी कह जाती है ‘कभी तो फिसले थे बारिश में, तुम भी’ और बूढ़ा मन भी बारिश की यादों में कुलाँचे भरने लगता है, है न!

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