भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) पर प्रथम वार्षिक शैक्षिक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में उपराष्ट्रपति के संबोधन
मित्रो, भारतीय ज्ञान प्रणाली पर प्रथम वार्षिक शैक्षिक सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। इस पहल की अगुवाई करने के लिए जेएनयू और थिक्षा को मेरी हार्दिक बधाई। यह एक अत्यंत आवश्यक पहल है और वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक है।
इस सम्मेलन के मूल में एक गहन सत्य निहित है, जो अखंडित और निर्विवाद है। भारत केवल एक राजनीतिक संरचना नहीं है, बल्कि उससे कहीं आगे है। इसका निर्माण 20वीं सदी के मध्य में नहीं हुआ था। यह एक सभ्यतागत सातत्य है—चेतना, जिज्ञासा और ज्ञान की एक बहती नदी जो सहस्राब्दियों से चली आ रही है, जैसा कि श्री सोनोवाल जी ने प्रतिबिम्बित किया।
मैं एक छोटी सी बात कहना चाहता हूं, मेरा संबोधन कोई मुख्य भाषण नहीं था। सोनोवाल जी ने मुख्य भाषण दिया था।
मित्रो, देश सदियों में जीते हैं। भारत युगों में फलता-फूलता है, युगों में जीता है। भारत वेदों और उपनिषदों के उच्चारण से श्वास लेता है, पाणिनि के सूत्रों, आर्यभट्ट की गणना, और कौटिल्य की नीति से शासन करता है।
भारत इस ग्रह पर दुनिया में अद्वितीय है। भारत की गाथा मानवीय आकांक्षाओं की एक अखंड कथा है। ज्ञान, सद्भाव और उत्कृष्टता की आकांक्षा है।
प्राचीन विश्वविद्यालय जैसे तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला आदि वैश्विक शिक्षा के केंद्र थे। हज़ारों पांडुलिपियां उनमें समाहित थीं।
भारत ने सिर्फ़ शिक्षा ही नहीं दी, बल्कि स्वागत भी किया, बहस की, आदान-प्रदान किया और प्रेरणा भी दी।
मैक्स मूलर के उद्धरण के अनुसार:
“अगर मुझसे पूछा जाए कि किस आकाश के नीचे मानव मन ने अपनी कुछ बेहतरीन प्रतिभाओं का पूर्णरूप से विकास किया है… तो मैं भारत की ओर इशारा करूंगा।”
मित्रो, यह शाश्वत सत्य की अभिव्यक्ति मात्र थी, लेकिन फिर एक अंतराल आया—एक भयावह अंतराल।
बख्तियार खिलजी ने ज्ञान के भण्डार को मिटा दिया।
इस्लामी आक्रमण और फिर ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने दूसरा अंतराल उत्पन्न किया।
भारतीय शिक्षा प्रणाली को विकृत कर दिया गया। ऋषियों के स्थान पर क्लर्क बनाए गए। हमने सोचना-चिंतन छोड़ दिया, रटने और अंक लाने तक सीमित हो गए।
परिणामस्वरूप, हम एक ऐसी ज्ञान-व्यवस्था के उपभोक्ता बन गए, जिसकी आत्मा भारतीय नहीं थी।
औपनिवेशिक पूर्वाग्रह, मार्क्सवादी विकृति, और विकृत आख्यान हमें आज भी प्रभावित कर रहे हैं।
मित्रो, आज भी, उन औपनिवेशिक ग़लत व्याख्याओं की छायाएं हमारे पाठ्यक्रमों में हैं। लेकिन यह सम्मेलन केवल भावनात्मक आयोजन नहीं है — यह एक ऐतिहासिक भूल को सुधारने का प्रयास है।
हमें अपनी बौद्धिक संप्रभुता को पुनः प्राप्त करना है। इसके लिए हमें अनुवादकों, शोधकर्ताओं, पीएचडी धारकों, प्रोफेसरों, भाषाविदों आदि की पूरी सेना चाहिए।
परंपरा और आधुनिकता के बीच की खाई को पाटना आवश्यक है।
ऋग्वेद के खगोल मंत्र, चरक संहिता, और भारतीय दर्शन आज के विज्ञान और नीति-निर्माण के लिए मार्गदर्शक बन सकते हैं।
भारत को केवल वैश्विक आख्यानों का आयातक नहीं बनना चाहिए — बल्कि हमें उन्हें रूप देने में योगदान देना चाहिए।
इसके लिए, जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों को प्रयोगशालाएं बनना होगा जहां संस्कृतज्ञ, कोडर्स, नीतिशास्त्री, अभियंता मिलकर काम करें।
इसलिए, हमें शास्त्रीय ग्रंथों का डिजिटल संग्रह बनाना होगा — संस्कृत, तमिल, पाली, प्राकृत सभी शामिल हों। ये सार्वजनिक रूप से सुलभ होने चाहिए।
प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से युवा विद्वानों को भाषाविज्ञान, तुलनात्मक अन्वेषण, आदि में दक्ष बनाना होगा।
ज्ञान केवल पांडुलिपियों में नहीं रहता — यह समुदायों और प्रथाओं में भी रहता है।
भारतीय ज्ञान प्रणालियों का वैश्वीकरण बिना उसकी गहराई खोए किया जाना चाहिए।
अंकोरवाट, रामायण के प्रदर्शन, योग, आयुर्वेद — सभी भारत की दीर्घकालिक कूटनीति के अंग हैं।
सॉफ्ट डिप्लोमेसी, आईकेएस की शक्ति, और वैश्विक अस्थिरता के समाधान भारत दे सकता है।
नालंदा और तक्षशिला में जो दीप जलाए गए थे, उन्हें अब फिर से जलाने का समय आ गया है।
विद्वानों और विद्यार्थियों, यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि भारतीय चिंतन की अगली पीढ़ी को वैश्विक प्रासंगिकता दें।
मैं आयोजकों को बधाई देता हूं और कामना करता हूं कि यह सम्मेलन भारतीय ज्ञान प्रणालियों के पुनरुत्थान का आधार बने।
“असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय” — हे प्रभु, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

