Homeअध्यात्म गंगागुरु है ‘पूर्णिमा’ का चंद्रमा !

गुरु है ‘पूर्णिमा’ का चंद्रमा !

प्रश्न : आषाढ़ पूर्णिमा को गुरू—पूर्णिमा के रूप में मनाने का क्या राज है?

एक तो राह है जीवन को देखने की – गणित की, और एक राह है जीवन को देखने की काव्य की। गणित की यात्रा विज्ञान पर पहुंचा देती है। और अगर काव्य की यात्रा पर कोई चलता ही चला जाए, तो परम काव्य परमात्मा पर पहुंच जाता है। लेकिन काव्य की भाषा को समझना थोड़ा दुरूह है, क्योंकि तुम्हारे जीवन की सारी भाषा गणित की भाषा है। तो गणित की भाषा से तो तुम परिचित हो, काव्य की भाषा से परिचित नहीं हो।

दो भूलों की संभावना है। पहली तो भूल यह है कि तुम काव्य की भाषा को केवल कविता समझ लो, एक कल्पना मात्र! तब तुमने पहली भूल की। और दूसरी भूल यह है कि तुम कविता की भाषा को गणित की तरह सच समझ लो, तथ्य समझ लो, तब भी भूल हो गई। दोनों से जो बच सके, वह समझ पाएगा कि आषाढ़ पूर्णिमा का गुरु—पूर्णिमा होने का क्या कारण है।

काव्य की भाषा तथ्यों के संबंध में नहीं है, रहस्यों के संबंध में है। जब कोई प्रेमी कहता है अपनी प्रेयसी से कि तेरा चेहरा चांद जैसा, तो कोई ऐसा अर्थ नहीं है कि चेहरा चांद जैसा है। फिर भी वक्तव्य व्यर्थ भी नहीं है। चांद जैसा तो चेहरा हो कैसे सकता है?

फिर ऐसे लोग हैं, जिन्होंने काव्य की भाषा को तथ्य की भाषा सिद्ध करने की चेष्टा की है। जैसे जीसस को कहा है ईसाइयों ने कि वे कुंआरी मां से पैदा हुए।

यह काव्य है। कुंआरी मां से कोई कभी पैदा नहीं होता। यह तथ्य नहीं है, यह इतिहास नहीं है, पर फिर भी बड़ा अर्थपूर्ण है, इतिहास से भी ज्यादा अर्थपूर्ण है। यह बात अगर इतिहास से भी घटती, तो दो कौड़ी की होती। इसमें जानने वालों ने कुछ कहने की कोशिश की है, जो साधारण भाषा में समाता नहीं।

काव्य एक सहानुभूति चाहता है। ये सब काव्य हैं। इनको काव्य की तरह समझो, तब इनका माधुर्य अनूठा है; तब इसमें तुम डुबकियां लगाओ और बड़े हीरे तुम ले आओगे, बड़े मोती चुन लोगे।

लेकिन किनारे पर दो तरह के लोग बैठे हैं, वे डुबकी लगाते ही नहीं। एक सिद्ध करता रहता है कि यह बात तथ्य नहीं है, झूठ है। वह भी नासमझ है। दूसरा सिद्ध करता रहता है कि यह तथ्य है, झूठ नहीं है। वह भी नासमझ है। क्योंकि वे दोनों ही एक ही मुद्दे पर खड़े हैं।

सारा धर्म एक महाकाव्य है। अगर यह तुम्हें खयाल में आए, तो आषाढ़ की पूर्णमा बड़ी अर्थपूर्ण हो जाएगी। अन्यथा, एक तो आषाढ़, पूर्णिमा दिखाई भी न पड़ेगी।

गुरु तो है पूर्णिमा जैसा और शिष्य है आषाढ़ जैसा। शरद पूर्णिमा का चांद तो सुंदर होता है, क्योंकि आकाश खाली है। वहां शिष्य है ही नहीं, गुरु अकेला है। आषाढ़ में सुंदर हो, तभी कुछ बात है, जहां गुरु बादलों जैसा घिरा हो शिष्यों से।

शिष्य सब तरह के जन्मों—जन्मों के अंधेरे का लेकर आ गए। वे अंधेरे बादल हैं, आषाढ़ का मौसम हैं। उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी रोशनी पैदा कर सके, तो ही गुरु है।

इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा! वह गुरु की तरफ भी इशारा है उसमें और शिष्य की तरफ भी इशारा है। और स्वभावत: दोनों का मिलन जहां हो, वहीं कोई सार्थकता है।

चांद जब पूरा हो जाता है, तब उसकी एक शीतलता है। चांद को ही हमने गुरु के लिए चुना है। सूरज को चुन सकते थे, ज्यादा मौजुद होता, तथ्यगत होता। क्योंकि चांद के पास अपनी रोशनी नहीं है।

चांद की सब रोशनी उधार है। सूरज के पास अपनी रोशनी है। चांद पर तो सूरज की रोशनी का प्रतिफलन होता है। जैसे कि तुम दीए को आईने के पास रख दो, तो आईने में से भी रोशनी आने लगती है।

हमने चांद को चुना है दो कारणों से।
एक, गुरु के पास भी रोशनी अपनी नहीं है, परमात्मा की है।
वह केवल प्रतिफलन है। वह जो दे रहा है, अपना नहीं है; वह केवल निमित्तमात्र है, वह केवल दर्पण है।

तुम परमात्मा की तरफ सीधा नहीं देख पाते। सूरज की तरफ सीधा देखना बहुत मुश्किल है। देखो, तो प्रकाश की जगह आंखें अंधकार से भर जाएंगी।

गुरु एक दर्पण है, पकड़ता है सूरज की रोशनी और तुम्हें दे देता है। लेकिन इस देने में रोशनी मधुर हो जाती है।

इसलिए तो कबीर ने कहा है:
गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।

गुरु माध्यम है। इसलिए हमने चांद को चुना।

गुरु के पास अपना कुछ भी नहीं है। कबीर कहते हैं, “मेरा मुझमें कुछ नहीं।” गुरु है ही वही जो शून्यवत हो गया है।

फिर सूरज सदा सूरज है, घटता—बढ़ता नहीं।
गुरु भी कल शिष्य था।
बुद्ध से बुद्ध पुरुष भी कभी उतने ही तमस, अंधकार से भरे थे, जितने तुम भरे हो।

गुरु तुम्हारे ही मार्ग पर है; तुमसे आगे, पर मार्ग वही है।
इसलिए तुम्हारी सहायता कर सकता है। परमात्मा तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता।

गुरु और तुम्हारे बीच सेतु बन सकते हैं।
अमावस की रात भी चांद की ही रात थी।
चांद तब भी था, चांद अब भी है।
रूपांतरण हुए हैं, क्रांतियां हुई हैं; लेकिन एक सिलसिला है।

तो गुरु तुम्हें समझ पाता है।
और मैं तुमसे कहता हूं तुम उसी को गुरु जानना, जो तुम्हारी हर भूल को माफ कर सके।

जो माफ न कर सके, समझना, उसने जीवन को ठीक से जीया ही नहीं।
जो दूज का चांद ही नहीं बना, वह पूर्णिमा का चांद कैसे बनेगा? धोखा होगा।

चांद तो सारी यात्रा से गुजरा है, सारे अनुभव हैं उसके।
जिसने नरक भी जाना है, जीवन का स्वर्ग भी जाना है; जिसने दुख भी पहचाने और सुख भी पहचाने,
जो सबसे प्रौढ़ हुआ है, और सबकी संचित निधि के बाद जो पूर्ण हुआ है, चांद हुआ है।

इसलिए हम सूरज नहीं कहते गुरु को, चांद कहते हैं।
चांद शीतल है।
चांद की रोशनी फूल की वर्षा की तरह है, छूती भी नहीं और बरस जाती है।

गुरु चांद है, पूर्णिमा का चांद है।
और तुम कितनी ही अंधेरी रात होओ और तुम कितने ही दूर होओ, कोई अंतर नहीं पड़ता,
तुम उसी यात्रा—पथ पर हो, जहां गुरु कभी रहा है।

इसलिए बिना गुरु के परमात्मा को खोजना असंभव है।
परमात्मा का सीधा साक्षात्कार तुम्हें जला देगा, राख कर देगा।
पहले चांद से नाता बना लो।
बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।

इसलिए आषाढ़ पूर्णिमा गुरु—पूर्णिमा है।
पर ये काव्य के प्रतीक हैं।
इन्हें तुम किसी पुराण में मत खोजना।
यह तो जैसा मैंने देखा है, वैसा तुम से कह रहा हूं।

साभार – [गीता-दर्शन-भाग (8) प्रवचन-201]

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