आपने समाचार पत्रों में पढ़ा होगा की जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला श्रीनगर के नौहट्टा में कब्रिस्तान का गेट फांदकर अंदर घुसे और कुछ कब्रों को श्रद्धांजलि दी।
दैनिक जागरण समाचार पत्र के अनुसार छोटा गेट खुला था। फिर भी मुख्यमंत्री बंद मुख्य गेट के ऊपर से कूदकर अंदर घुसे।
संभवत कश्मीर में रहने वाले हिन्दुओं को छोड़कर देश के किसी हिन्दू को नहीं पता होगा के यह कब्रें किसकी हैं?
13 जुलाई 1931 को पुलिस की गोलीबारी में 21 दंगाई मारे गए थे। यह कब्रें उनकी हैं।
1948 के बाद से इन दंगाइयों को शहीद का दर्जा दे दिया गया और 13 जुलाई को कश्मीर शहीदी दिवस के नाम से मनाया जाने लगा और इस दिन छुट्टी होती थी।
दिसम्बर 2019 से धारा 370 हटने के बाद से इस दिन की छुट्टी रद्द कर दी गई।
इन दंगों के पीछे अंग्रेजों का हाथ था। अब्दुल क़ादिर के नाम से एक अहमदी मुसलमान को पेशावर से अंग्रेजों ने एक बावर्ची के रूप में कश्मीर भेजा था।
21 जून 1931 को श्रीनगर की प्रसिद्ध खानखा-ए-मौला (जिसे सुल्तान सिकंदर ने सैय्यद अली हमदानी की याद में काली मंदिर को भ्रष्ट करके बनाया था) के प्रांगण में अब्दुल कादिर के भड़काऊ भाषण हुए।
इन भाषणों में इस्लाम की दुहाई देकर मुसलमानों को उकसाया गया। महाराज हरी सिंह को काफिर कहकर उनके शासन को उखाड़ने की बात कहीं।
अब्दुल कादीर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और स्थानीय जेल में उसकी पेशी होने लगी।
पेशी के दौरान भारी भीड़ ने जेल का घेराव कर दिया।
5000 के लगभग भीड़ का उद्देश्य गेट तोड़कर अब्दुल कादिर को छुड़वाना था।
पुलिस ने भीड़ को हटने का आदेश दिया। उसने अवमानना की।
पुलिस को बचाव में गोलीबारी करनी पड़ी और उसमें 21 दंगाई मारे गए।
कुछ दंगाई हरी पर्वत किले पर चढ़ाई करने लगे।
भीड़ बेकाबू होकर महराजगंज, भूरिकादल , अलीकादल, विचित्रनाग आदि इलाकों में हिन्दुओं की सम्पत्तियाँ लूटने, मकानों को आग लगाने, औरतों के साथ बलात्कार करने, हत्या करने जैसे अकल्पनीय अत्याचार किए।
शहर के बाद यह दंगे गांवों आदि में भी फैल गए और हिन्दुओं पर भारी अत्याचार हुए।
प्रोफेसर रामनाथ कौल अपनी पुस्तक “शेख अब्दुल्ला: ए पोलिटिकल फ़ीनिक्स” में लिखते हैं कि जेल से छुड़ाएं गए अपराधी शेख अब्दुल्ला से जाकर मिलें।
शेख ने उन्हें बधाई दी। एक घायल दंगाई शेख की बाँहों में यह कहकर मरा कि शेख साहिब जैसा आपने कहा था वैसा हमने किया।
शेख ने उस दंगाई को शहीद घोषित कर दिया और इस दिन को कश्मीर शहीदी दिवस बनाने लगे।
जबकि कश्मीरी हिन्दू इसे काला दिन के नाम से मनाते हैं।
महाराज हरी सिंह को हटाने का षड़यंत्र इससे कई वर्षों से चल रहे थे।
इससे एक वर्ष पूर्व एक षड़यंत्र रचा गया था।
श्रीयुत धर्मवीर जी एम. ए. का कश्मीर के हिन्दुओं पर अत्याचार सम्बंधित भाषण “शुद्धि समाचार” में प्रकाशित हुआ था।
जिसका संक्षिप्त इस प्रकार है:
“सब जानते हैं कि डॉक्टर मुहम्मद इकबाल ने इलाहाबाद में मुस्लिम कांफ्रेंस में भाषण देते हुए कहा था कि हम चाहते हैं कि उत्तरी भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना की जाए।
आप यह भी जानते हैं कि लाहौर के मुस्लिम अखबार Muslim Outlook और Inquilab बहुत देर से महाराजा कश्मीर के खिलाफ propaganda कर रहे हैं।
आप यह भी जानते हैं कि Princes Protection Act के अनुसार किसी भी पुरुष को यह अधिकार नहीं है कि वह रियासतों के बरखिलाफ कोई propaganda कर सके
और आपको यह भी बतलाने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दुस्तानियों को दफा 153-A IPC से कोई भी ऐसा कार्य करने की इजाजत नहीं
जिससे एक धर्म के अनुयायियों को दूसरे धर्म के अनुयायियों के प्रति वैमनस्य होने की सम्भावना हो।
परन्तु आप देख रहे हैं कि जुलूस निकाले जा रहे हैं, नौजवानों को भड़काने के लिये जोशीले भाषण दिये जा रहे हैं, जत्थे भेजने के लिये स्वयंसेवक भरती किये जा रहे हैं, रुपया इकट्ठा किया जा रहा है, महाराजा के खिलाफ लेख लिखवाये जा रहे हैं और पुस्तकें बनवाई जा रही है
तो भी सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।
यह तो हुआ जो कुछ सरकारी भारत में हो रहा है। अब जरा देखिए कश्मीर से आये हुए लोग क्या बतलाते हैं।
वे कहते हैं कि जाँच कमेटी को षड्यन्त्र के कागज पत्रों का एक बड़ा भारी पुलिन्दा मिला है।
इसके अतिरिक्त और बातों से भी मालूम हुआ है कि महाराज कश्मीर सर हरि सिंह के जब से लड़का पैदा हुआ है, वहां के मुसलमान बहुत बेचैन रहते हैं।
पुत्र उत्पन्न होने के पहले मुसलमानों ने यह सोचा कि महाराज को वेश्याओं की संगति में रखकर ऐसा किया जाय कि इनके कोई लड़का न हो।
इनका विचार था कि सर हरि सिंह गुलाब सिंह की आखिरी सन्तान हैं और इनके बाद कोई गद्दी का वारिस न रहेगा और रियासत मुसलमानों के हाथ आ जाएगी।
लेकिन महाराज के लड़का पैदा हो जाने से मुसलमानों के वह सुख स्वप्न गायब हो गये।
निराश होकर इन लोगों ने षड्यन्त्र रचा।
कहा जाता है षड्यन्त्र में मुख्य कार्यकर्ता:
पीर हसमुद्दीन,
खान बहादुर अब्दुल मजीद खां (लाहौर के “इन्किलाब” पत्र वाले),
डॉ. सर मुहम्मद इकबाल,
सर फ़ज़ल हुस्सेन,
मिस्टर वेकफ़ील्ड और
महाराज के अपने प्राइवेट सेक्रेटरी नवाब खुसरो जङ्ग हैं।
महाराजा प्रताप सिंह ने जो जामा मस्जिद बनवाई थी, उसी में सभायें होने लगीं।
आखिर में यह फैसला हुआ कि अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हर जगह आक्रमण करके घेर लिया जाए और पाँच हजार मुसलमान महाराज के भवन पर आक्रमण कर दें।
दूसरा विचार यह था कि एक दरबारी वेश्या को सवा लाख रिश्वत में दिया जाए और वह शराब में मिलाकर महाराज को ज़हर खिला दे।
यह भी कहा जाता है कि षड़यंत्र का पता लगाने के लिये एक हिन्दू खुफ़िया मुसलमान हो गया था।
उसने अब वह चाँदी का मुकुट जामा मस्जिद के एक किनारे से खोद निकाला है जो महाराज कश्मीर गद्दी से हट जाने पर मुसलमान राजकुमार को पहनाया जाता।
इन विचारों को कार्य रूप में लाने के लिये षड्यन्त्रकारियों ने यह निश्चय किया:
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जम्मू, रावलपिण्डी और ऐबटाबाद के पुल तोड़ दिये जाएं
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टेलीफोन और अन्य तारें काट दी जाएं
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हिंदुओं की दुकानें लूटी जाएं, हत्याएं की जाएं, स्त्रियों को अपमानित किया जाए
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और शीघ्र ही महाराजा के खिलाफ विद्रोह खड़ा कर दिया जाए।
इस निश्चय के बाद जो कुछ हुआ वह आप सब जानते ही हैं।
13 जुलाई के कारनामों का बयान करते हुए सरकारी ऐलान में लिखा है कि—
“विचारनाग में मुसलमानों की एक भीड़ ने वहां के हिंदुओं पर घोर अत्याचार किये। उनके घर लूट लिये। उन पर जंगली आक्रमण किए। औरतों की बेइज्जती की।
उन्होंने जो कुछ नज़र आया लूट लिया, बाकी का सामान जला दिया।
इसी बीच में लोहड़ीकदल के समीप भी मुसलमानों ने लूटमार आरम्भ कर दी।
लोहड़ीकदल और सफ़ाकदल की हिंदू दुकानें, जिनमें महाराज गज की मण्डी भी सम्मिलित है लूट ली गई और दुकानदारों को ज़ख्मी कर दिया गया।
कहा जाता है कि इस दंगे में लाखों की जायदाद का नुकसान हुआ।
बहुत हिंदू इन हमलों के कारण मर गये।
बलवाइयों ने हिन्दुओं पर हमला करने में लाठियों, चाकुओं और पत्थरों का खुल्लमखुला इस्तेमाल किया।
हिन्दुओं को मुसलमान बनाया गया और उन पर घोर अत्याचार किये।”
(सन्दर्भ ग्रंथ: शुद्धि समाचार, सितम्बर 1931 अंक, प्रकाशक – भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा, दिल्ली, पृष्ठ 352-354)
कश्मीर में 1930 के इस षड्यंत्र को शायद ही आज के हिन्दू जानते होंगे
पर यह भविष्य में 1947 के पाकिस्तान समर्थित दंगों और 1990 के कश्मीरी हिन्दुओं के पलायन की पूर्व झांकी थीं।
इसमें कोई शंका नहीं है।
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