अनेक स्थानों पर मुझे भारतीय ज्ञान परंपरा पर बोलने हेतु आमंत्रित किया जाता हैं। उन सभी स्थानों पर, मैं प्रोफेसर अंगस मेडिसन का उल्लेख अवश्य करता हूं। इस ब्रिटिश अर्थशास्त्री ने, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अनेक पुस्तकें लिखी। इन पुस्तकों में अनेक संदर्भ देकर, आंकड़े प्रस्तुत कर, उन्होंने यह सिद्ध करके दिखाया, कि किसी जमाने में भारत यह विश्व का सबसे वैभवशाली, सबसे संपन्न राष्ट्र था। विश्व के व्यापार का एक तिहाई व्यापार मात्र भारत करता था, और विश्व की 30% से भी ज्यादा संपत्ति भारत के पास थी।
विदेशी आक्रांता भारत में आने से पहले हम कितने संपन्न और समृद्ध थे, इसका यह सशक्त प्रमाण हैं।
यह सब पढ़ते समय, एक प्रश्न मन में उठता हैं। हम विश्व में सबसे ज्यादा व्यापार करते थे। हमारे जहाज लैटिन (दक्षिण) अमेरिका तक जाते थे। हमारी वस्तुओं की गुणवत्ता भी अत्यंत उच्च दर्जे की थी, इसलिए हमारी वस्तुओं की विश्व में अच्छी खासी मांग थी। हमारे यहां जो वस्त्र तैयार होते थे, उन्हें खरीदने के लिए अलग-अलग देशों के राजा – महाराजाओं में होड़ लगती थी। मानवी कुशलता, मानवी कौशल हैरान होगा, ऐसे भव्य मंदिर, महल, राजप्रासाद हमने बनाएं। विश्व का सबसे बड़ा प्रार्थना स्थल, अंगकोर वाट जैसा सुंदर मंदिर समूह, हमने खड़ा किया। अनेक धातु खोज निकाले। जल व्यवस्थापन में महारत हासिल की। तकनीकी में हम समय से बहुत आगे बढ़ गए।
यह इतना सब, हम ‘मैनेज’ कैसे करते होंगे..?
अपने पूर्वजों ने प्रबंधन (व्यवस्थापन – मैनेजमेंट) की कोई अधिकृत शिक्षा ली थी क्या? या पहले तक्षशिला, और बाद में नालंदा, उड्डयंतपुर, विक्रमशिला, वल्लभी, सुलोटगी जैसे विश्वविद्यालयों में, प्रबंधन (व्यवस्थापन) यह विषय पढ़ाया जाता था? ऐसे अनेक प्रश्न। अत्यंत उत्कृष्ट, उच्च गुणवत्ता का सटीक काम हमारी अनेक पीढ़ियों ने, उस कालखंड में किया, यह तो निश्चित हैं। फिर, ये कैसे संभव हुआ? आज के जमाने में, बिजनेस स्कूल या मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में पढकर, एम बी ए जैसी डिग्रियां लेकर आए युवक – युवतियां ही प्रबंधन का सब काम देख सकते हैं, ऐसा उद्योग जगत का विश्वास हैं। वैसा ही, उस समय भी होता था क्या?
अर्थात एक निश्चित है, प्राचीन शिक्षा पद्धति के बारे में जो जानकारी मिली हैं, उसके अनुसार, उस समय के पाठ्यक्रम में प्रबंधन / व्यवस्थापन जैसे विषय नहीं थे। व्यवस्थापन का अलग से विभाग नहीं था, और ना ही व्यवस्थापन पढ़ने वाली संस्थाएं थी। इसके बावजूद भी, हमारे पूर्वज, पूरे विश्व में भव्य – दिव्य साकार कर रहे थे। उस समय के सबसे बड़े जहाज बनाकर दुनिया के देशों को बेच रहे थे। नए-नए शोध लगा रहे थे, और साफ सुथरा व्यापार भी कर रहे थे।
हमारे इन पूर्वजों ने यह सब कैसा किया होगा, यह समझना हैं, तो आज के ‘मैनेजमेंट’ का चश्मा उतार कर, पूरी प्रक्रिया को समझना होगा।
हमारे उस स्वर्णिम कालखंड में, प्रबंधन यह विषय सीधे पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं था। इसलिए प्रबंधन पढ़ाया नहीं जाता था। प्रबंधन के सारे तत्व, अप्रत्यक्ष रूप से, किंतु अत्यंत प्रभावी तरीके से, विद्यार्थियों तक पहुंचते थे।
इस प्रक्रिया में ‘उपनिषद‘ यह महत्व का माध्यम था। लगभग 4000 से 6000 वर्ष पूर्व, अपने पूर्वज ऋषि-मुनियों ने, 108 उपनिषद लिखे। इनमें से 10 प्रमुखता से पढ़े जाते थे / पढ़ाए जाते थे। आज के समय में हम गीता, उपनिषद, भागवत जैसे ग्रंथ, यानी सेवानिवृत्ति के बाद अभ्यास करने के लिए बने धार्मिक ग्रंथ हैं, ऐसा मानते, समझते हैं। पर पहले ऐसा नहीं था। तब धर्म का अर्थ भी अलग था। कर्मकांड कम थे। एक अच्छी, उच्च आदर्शो से प्रेरित उदात्त जीवन शैली यानी धर्म, ऐसा माना जाता था। लड़के – लड़कियां पढ़ने के लिए गुरुकुल में जाते थे। वहीं पर उनका उपनिषदों से परिचय होता था। उपनिषद यानी कठिन और जटिल संकल्पनाओं के उबाऊ (बोअरिंग) ग्रंथ नहीं थे। वह तो छोटी-छोटी किस्से – कहानियों से भरी पुस्तकें थी। किंतु इन पुस्तकों में संदेश छुपे रहते थे। यह संदेश ही विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा थी। जीवन जीने की कला थी।
आधुनिक मैनेजमेंट की हवा मुख्यतः अमेरिका से बहना प्रारंभ हुई। अमेरिका यह पूर्णतः व्यापारिक देश। उस देश की जो मूल सभ्यता थी, वह वहां के रेड इंडियन्स (नेटिव्स) की थी। उसे तो यूरोप से आए हुए लोगों ने लगभग समाप्त कर दिया। इसलिए यूरोप से आकर यहां पर बसे लोगों का मूल मंत्र ‘पैसा’ होगा, यह स्वाभाविक ही था। इसलिए, अमेरिका में मैनेजमेंट में, जिस किसी को थोड़ी बहुत सफलता मिलती हैं, अमेरिकन्स उसके पीछे भेड़ – बकरियों जैसे दौड़ते हैं।
साठ – सत्तर के दशक में अमेरिका में डेल कार्नेगी के प्रबंधन शैली का बोलबाला था। उसकी ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इनफ्लुएंस पीपल’ जैसी पुस्तक, लाखों की संख्या में बिक रही थी। फिर TA ट्रांजैक्शन एनालिसिस आया। ‘आई एम ओके यू आर ओके’ की संकल्पना आई। अभी कुछ वर्ष पहले, भारतीय मूल के शिव खेड़ा की हवा बह रही थी। ये सारे लोग और उनकी प्रबंधन शैली, उन-उन दिनों जबरदस्त लोकप्रिय रही। इन सब लोगों ने मानवी स्वभाव की बारीकियों पर और उसके द्वारा उत्पादनक्षमता बढ़ाने पर जोर दिया।
मजेदार बात यह, कि ये सारी बातें, अलग पद्धति से, हमारे यहां कुछ हजार वर्ष पहले, अपने ऋषि मुनियों ने, उपनिषद, गीता आदि ग्रंथों मे विस्तार से लिख रखी हैं।
इन सब उपनिषदों का या भगवद् गीता की सीख का आधार, नैतिकता, सदाचार और प्रमाणिकता था। यह सारे मात्र आदर्श तत्व नहीं थे, कि ‘जो आदर्श तो हैं, किंतु व्यवहार में उतारना संभव नहीं हैं‘। नैतिकता, सदाचार, प्रमाणिकता यह सारे जीवनमूल्य थे। व्यापार समवेत जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू थे। इसलिए व्यापार में और व्यवहार में छल – कपट को स्थान नहीं था।
मंडुक्य उपनिषद में शांति मंत्र है:
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिः यजत्राः।।
अर्थ: ‘जो मंगलकारी हैं, कल्याणकारी हैं, वही हम सुन सके। हमारे कान, हमारा मन, सदैव निर्मल रहे’। इस श्लोक में ‘यजत्रा’ शब्द का प्रयोग किया गया हैं। यजत्रा का अर्थ, यज्ञ करने वाले लोग। किंतु उपनिषदकार बताते हैं, यज्ञकुंड में अग्नि प्रज्वलित करके जो करते हैं, वही मात्र यज्ञ नहीं हैं। यज्ञ बुद्धि का, यज्ञ ज्ञान का, यज्ञ कर्मशिलता का होना चाहिए। हमें समझ आने के बाद, हम समाज कल्याण के लिए जो करते हैं वह है यज्ञ..!
मुंडकोपनिषद में एक श्लोक हैं:
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
क्रमंत्यृषयो ह्याप्तकामो यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्।।
अर्थ: सदैव सत्य की ही विजय होती है। मिथ्या या असत्य कभी भी जीत नहीं सकते। हमने 26 जनवरी 1950 को इस श्लोक के ‘सत्यमेव जयते‘ को अपने देश का घोषवाक्य या आदर्श वाक्य के रूप में अपनाया हैं।
नारायण उपनिषद के चौदहवें मयूरव में एक श्लोक है:
धर्म इति धर्मेण सर्वमिदं परिगृहीतम्।
धर्मांन्नातिदुशाश्चरं तस्माध्दर्मे रमन्ते।।
इसमें बताया हैं, स्वधर्म का आचरण यह उत्तम साधन हैं। सदाचार, सन्निती, प्रमाणिकता, विश्वसनीयता यह सब हमारे धर्म के अंग हैं। शास्त्र पर श्रद्धा, यह धर्म का प्राण हैं।
ये सब बातें, गुरुकुल के माध्यम से, विद्यालयों और विद्यापीठों से, घर के संस्कारों से, नीचे तक रिसते जाती थी। इसके कारण बाल्य काल से ही प्रमाणिकता, सदाचार आदि हमारे जीवनमूल्य हैं, यह बातें विद्यार्थियों के अंदर तक पहुंचती थी। इन सब का प्रभाव व्यापार में भी दिखता था, और इसीलिए विश्व के अनेक देशों के व्यापारी, राजा – महाराजा, अमीर – उमराव, भारतीयों पर और भारतीय माल पर आंख बंद करके विश्वास करते थे। भारत का व्यापार, भारतीय वस्तुओं की गुणवत्ता के कारण तो बढा और फला-फुला ही, किंतु उसमें एक और बात थी – प्रामाणिकता और विश्वसनीयता की..! आज के प्रबंधन की भाषा में, ‘एथिकल कोड आफ कंडक्ट‘।
ईशावास्योपनिषद में दूसरा श्लोक है:
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।
अर्थ: ‘किसी भी व्यक्ति को यदि इस धरातल पर 100 वर्ष जीना हैं, तो उसने कर्म करते रहना चाहिए‘। और कर्म भी कैसा? तो ‘कुर्वन्नेवेह‘। अर्थात, तय किया हुआ कार्य, और वह भी उत्कृष्टता से, करना।
इसी उपनिषद में अगला श्लोक है:
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाSऽवृता:।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना:।।
अर्थ: जो ठीक से काम नहीं करते, कुशलता से काम नहीं करते, वह असूर्य लोक में जाते हैं। अंधकार में जाते हैं। अर्थात, नरक में जाते हैं..!
काम का और कष्ट का महत्व बताने के लिए, श्वेताश्वतर उपनिषद (ब्राह्मोपनिषद) के पहले अध्याय में एक श्लोक हैं:
तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिरापः स्त्रोतः स्वरणीषु चाग्निः।
एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति।।
अर्थ: तिल में तेल होता हैं, पर वह तेल निकालने के लिए तिल को कोल्हू में पूरी तरह, पूरी ताकत से निचोड़ना पड़ता हैं। दही से घी निकालने के लिए दही को मथ कर, मक्खन निकालकर, फिर उसे गर्म करके घी निकालना पड़ता हैं। अरणी का मंथन करके ही अग्नि प्रज्वलित होता हैं। उसी प्रकार, पृथ्वी के पेट में भरपूर पानी निश्चित हैं, किंतु उसे निकालने के लिए गहरा खोदना पड़ता हैं। कभी जल्दी पानी मिल जाता हैं, तो कभी पत्थर आने पर उसे फोड़ कर पानी निकालना पड़ता हैं।
संक्षेप में, कष्ट करते रहना चाहिए। यश निश्चित मिलेगा।
यह सारे तत्व, प्राचीन समय में गुरुकुलों, विद्यालयों के द्वारा बच्चों के मन में उकेरे जाते थे। कार्यमग्न, कार्यशील रहना हैं। जो विहित कार्य (तय किया हुआ काम) हमारे हिस्से में आया हैं, उसे पूरी लगन से और कुशलता से करना हैं। यह मूलमंत्र था। इसलिए हम ‘परफेक्शनिस्ट’ थे। परिपूर्णतावादी थे। इसलिए हमारे पूर्वज, एलोरा में कैलाश मंदिर जैसा शिल्प, एक पूरे पत्थर में, ऊपर से नीचे उकेर सके। हजारों वर्ष न जंगने वाला लोहस्तंभ खड़ा कर सके। गणित के अनेक जटिल सूत्रों को हल कर सके… ऐसा बहुत कुछ।
(दुर्भाग्य से इस्लामी आक्रांता आने के बाद, हमारे कर्म सिद्धांत की परिपूर्णता जाती रही। ‘हम निम्न स्तर का सामान बनाते हैं, हम व्यवस्थित / अनुशासित, समय के पाबंद नहीं हैं‘, ऐसे सारे अवगुण विशेष, हमारे साथ चिपकते गएं…)
प्रबंधन शास्त्र (व्यवस्थापन शास्त्र) में मनुष्य के मन का बड़ी बारीकी से, सूक्ष्मता से विचार किया जाता हैं। कारण, प्रबंधन करना हैं, तो मनुष्य के द्वारा ही प्रमुखता से होता हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद, विश्व के भिन्न-भिन्न प्रबंधन तंत्र पर प्रभाव दिखता है, वह पीटर ड्रकर (Peter Drucker) का। इनका मुख्य सिद्धांत है, ‘मैनेजमेंट इस अबाउट ह्यूमन बीइंग’। अपने उपनिषदकारों ने, इस बात का विचार अक्षरश: कुछ हजार वर्ष पहले करके रखा हैं।
केनोपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद का शांति मंत्र है:
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।।
साधारणतः अनेक घरों में यह भोजन मंत्र के रूप में, भोजन ग्रहण करने से पहले बोला जाता हैं। इसका भावार्थ है: ‘हम दोनों की रक्षा करो। हम दोनों का पोषण करो‘।
ये ‘दोनों‘ कौन हैं?
ये हैं, अपने दो मन। गुरु और शिष्य। कभी अपना एक मन गुरु होता हैं, तो दूसरा शिष्य बन जाता हैं। कभी इसके उलट होता हैं। अनेकों बार, अपने मन में अंतर्द्वंद्व चलता रहता हैं – ‘यह करूं या ना करूं..?‘ शेक्सपियर की भाषा में To be or Not to be।
उपनिषदकारों के मत से, इन दोनों ही मनों का व्यवस्थित पोषण होना आवश्यक हैं। और उसी में से ‘I am OK, You are OK‘ यह भावना निर्माण होगी। यदि I am Not OK, You are OK यह भावना हावी हुई, तो हम में हीन भावना (Inferiority Complex) निर्माण होगी। यदि, I am OK, You are Not OK यह भावना हावी हुई, तो हम में अहंभाव, अहंकार (Superiority Complex) आएगा। यदि, I am Not OK, You are Not OK यह भावना बलवती हुई, तो हम पूर्णतः नकारात्मक सोचने लगेंगे। इससे कोई काम नहीं होगा। इसलिए, I am OK, You are OK यह भावना निर्माण होना आवश्यक है, जिसके कारण हम समान स्तर पर लोगों से संवाद कर सकेंगे।
प्रबंधन का यह महत्व का तत्व, डॉ. थॉमस ए हैरिस, एमडी ने वर्ष 1967 में प्रस्तुत किया। विश्व भर में यह खूब चला। उनकी I am OK, You are OK यह पुस्तक आज भी जबरदस्त बिकती हैं। किंतु हमारे उपनिषदों में यही तत्व, कुछ हजार वर्ष पहले से, व्यापक रूप में बताया गया हैं।
प्रबंधन के लिए जो मूलभूत तत्व आवश्यक होते हैं, वह उपनिषदों में विस्तार से बताए गए हैं। उदाहरण के लिए – ‘एकाग्रता‘। अगर एकाग्रता होगी, तो अनेक असाध्य, असंभव बातें भी संभव हो जाती हैं। छोटे से लेंस से आई हुई सूर्य किरणें, एकाग्र होकर कागज को भी जला देती हैं। उसी प्रकार, मानवी मन की एकाग्रता से, कठिन से कठिन काम भी संभव हो जाते हैं। इस प्रक्रिया का भिन्न-भिन्न उपनिषदों में विस्तार से वर्णन किया हैं। कुछ उपनिषदों ने, (जैसे श्वेताश्वतर उपनिषद और मैत्रोपनिषद) ‘योग‘ को एकाग्रता के पर्यायवाची शब्द के रूप में प्रयोग किया हैं।
ऐतरेय उपनिषद के तीसरे अध्याय में ‘मन की शक्ति‘ का वर्णन किया हैं। चेतना, ग्रहणशक्ति (grasping power), मेधा (बुद्धि), दृष्टि, अंतःदृष्टि आदि बातों की वृद्धि मनुष्य कर सकता हैं। उनकी क्षमता को बढ़ा सकता है, और यह होने पर कृति (कुछ करना) संभव होती हैं। अर्थात, अत्यंत कठिन परिस्थिति में भी, हिम्मत के साथ खड़े रहकर, हम परिस्थिति को अपने अनुकूल पलटा सकते हैं।
मुंडक उपनिषद और मैत्रोपनिषद में प्रबंधन का काम करते हुए पालन करने की साधन चतुष्टि दी है –
१. जो काम हम कर रहे हैं, उस काम की या उस व्यवसाय की, संपूर्ण जानकारी। ‘मैं यह काम क्यों कर रहा हूं? मुझे इस कार्य से क्या साध्य करना हैं?’ इसकी पूर्ण स्पष्टता, सम्यक ज्ञान आवश्यक।
२. कार्य करते समय सत्य के रास्ते से चलना। सत्य यानी परमेश्वर। सदाचार से, सत्यनिष्ठा से, प्रमाणिकता से अपना काम करना।
३. अपने काम पर दृढ़ श्रद्धा। जो काम हमें मिला है, या जो व्यवसाय हम चला रहे हैं, उसके प्रति मन में अनुराग होना चाहिए। उस कार्य की पसंद होना चाहिए।
४. दिया हुआ, या हाथ में लिया हुआ, विहित काम करते समय सभी यम-नियमों का कड़ाई से पालन।
यह साधन चतुष्टि यदि हम प्रमाणिकता से अपनाते हैं, तो हमारा प्रत्येक कार्य निश्चित रूप से यशस्वी होगा, ऐसा मुंडक उपनिषद में लिखा हैं। ‘सत्यमेव जयते‘ का उद्घोष इसी उपनिषद में हुआ हैं।
कठोपनिषद के पहले अध्याय के तीसरी वल्ली का 14वां श्लोक प्रसिद्ध है – उत्कृष्ट:
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरासन्नधारा निशिता दुरत्यद्दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति।।
स्वामी विवेकानंद ने इस श्लोक का अनेकों बार उच्चार किया हैं। इस पूरे श्लोक का अर्थ है: ‘उठो, जाग जाओ और जानकार, विद्वान, श्रेष्ठ पुरुषों की संगति में ज्ञान प्राप्त करो‘। इस श्लोक के पहले भाग का स्वामी विवेकानंद ने अत्यंत कुशलता से उपयोग किया है – “उठो, जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ‘पागल’ बनो“। यहां ‘पागल‘ यह शब्द ‘पैशनेट‘ इस अर्थ से प्रयोग में लाया हैं। आज के भौतिक जगत में भी यही दिखता हैं। स्टीव जॉब्स, एलन मस्क, बिल गेट्स जैसे, जिन-जिन लोगों ने अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए जुनून के साथ काम किया, वे सभी दुनिया में सफल रहे।
इसीलिए, अच्छे कुशल प्रबंधन के लिए, अपने कार्य पर पूरी श्रद्धा रखकर, दिए गए लक्ष्य के लिए ‘पागल‘ होना अपेक्षित हैं, जो हमारे उपनिषदों ने हमें हजारों वर्ष पहले से बताया है..!
(प्रशांत पोळ – जाने माने लेखक हैं, कई पुस्तकें लिख चुके हैं और भारतीयता, इतिहास व पुरातात्विक विषयों पर शोधपूर्ण लेखन करते हैं)
(दिनांक 26 जुलाई को, माननीय उपराष्ट्रपति डॉ. जगदीप धनखड़ जी के करकमलों से विमोचित होने वाले खजाने की शोधयात्रा पुस्तक के अंश।)

