भारत की अवनति के कई कारण रहे हैं, उनमें सबसे प्रमुख कारण रहा है हमारी आपसी फूट।
यदि भारतीय राजाओं में, वीर क्षत्रियों में आपसी फूट न होती, तो आज भारत का मानचित्र कुछ और ही होता।
इतिहास उठा कर देख लीजिए। किसी भी प्रसिद्ध लड़ाई का वर्णन पढ़ लीजिए। हम भारतीयों की हार के जितने भी कारण होंगे, उनमें सबसे मुख्य कारण हमारी आपसी फूट ही मिलेगा।
पृथ्वीराज चौहान के ऊपर जब मोहम्मद गोरी ने आक्रमण किया, तब पृथ्वीराज के पड़ोसी कन्नौज के राजा जयचंद ने मोहम्मद गोरी का साथ दिया। इसका फायदा क्या हुआ? पृथ्वीराज तो युद्ध हार गए और मार दिए गए, लेकिन जयचंद का क्या हुआ? मोहम्मद गोरी ने जयचंद पर आक्रमण करके उसके राज्य का भी विनाश कर दिया। आज “जयचंद” देशद्रोह और गद्दारी का पर्यायवाची बन चुका है।
प्लासी का युद्ध, जिसे भारत में अंग्रेजों के खिलाफ पहली लड़ाई माना जाता है, का इतिहास देख लीजिए। बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की 50,000 सैनिकों की सेना को ईस्ट इंडिया कम्पनी की केवल 3,000 सैनिकों की सेना ने हरा दिया। और इन 3,000 में भी केवल 950 ही अंग्रेज सैनिक थे, बाकी सब भारतीय सैनिक ही थे।
इस युद्ध में हुआ क्या था? सिराजुद्दौला का सेनापति मीर जाफर पहले ही अंग्रेजों से जाकर मिल गया और अपने 45,000 सैनिकों को लेकर अलग हो गया। बाकी बचे केवल 5,000 सैनिकों ने ही बिना जोश के लड़ाई में हिस्सा लिया और हार गए। बाद में मीर जाफर का क्या हुआ? वह केवल 1757 से 1760 तक ही बंगाल का नवाब रहा, फिर अंग्रेजों ने उसे हटा दिया।
अकबर ने महाराणा प्रताप से युद्ध करने के लिए मानसिंह को भेजा।
मानसिंह कौन था? वह भी राणा प्रताप की तरह ही एक राजपूत राजा था। लेकिन वह अकबर से जा मिला और बहुत बड़ी सेना लेकर राणा प्रताप से युद्ध करने चला। राणा प्रताप का छोटा भाई शक्ति सिंह भी अकबर के साथ मिल गया। अब ज़रा सोचिए — मान सिंह, शक्ति सिंह और राणा प्रताप तीनों मिलकर अकबर के खिलाफ लड़ते, तो आज भारत का इतिहास कुछ और होता।
काश! यदि हमने धर्मराज युधिष्ठिर के आदर्श को अपनाया होता, तो आज हमारी यह दुर्गति न होती।
क्या था धर्मराज युधिष्ठिर का आदर्श?
जब पाँचों पांडव द्रौपदी के साथ वनवास कर रहे थे, तब दुर्योधन ने उन्हें नीचा दिखाने के लिए शाही ठाठ-बाट के साथ उनके पास जाने का निश्चय किया। परंतु मार्ग में चित्रसेन गंधर्व ने दुर्योधन को बंदी बना लिया।
जब युधिष्ठिर को पता चला, तो उन्होंने अर्जुन और भीम को आदेश दिया कि जाओ और दुर्योधन को मुक्त करा कर लाओ। अर्जुन ने आश्चर्य के साथ पूछा – “हमें क्या आवश्यकता है कि दुर्योधन को छुड़ाने जाएं? वह तो अपनी करनी का फल भुगत रहा है।”
तब युधिष्ठिर ने उत्तर दिया:
“परस्परं विवादे तु वयं पञ्च शतं च ते।
अन्यैः सह विवादे तु वयं पंचशतोत्तरम् ।।”
अर्थात्: यदि हम लोगों की आपस की लड़ाई हो तो हम पाँच हैं और वो सौ हैं, परंतु यदि किसी दूसरे के साथ युद्ध हो तो हम एक सौ पाँच हैं।
यदि इस आदर्श को सम्मुख रखकर हमारे पूर्वज लड़े होते, तो आज हमारी यह दुर्दशा नहीं होती। भारतीय राजाओं की आपसी फूट की तो यह दशा थी कि जब भी कोई विदेशी राजा किसी भारतीय राजा पर आक्रमण करता था, तो पड़ोसी राजा चुपचाप बैठकर तमाशा देखा करते थे। लेकिन वे यह भूल जाते थे कि आज उस पर आक्रमण हो रहा है, कल मुझ पर भी होगा। परिणाम यह हुआ कि एक-एक करके सभी राजा गुलाम होते चले गए।
स्वामी दयानंद ने भी ‘सत्यार्थप्रकाश’ (दशमसमुल्लास) में यही बात कही है —
“जब आपस में भाई-भाई लड़ते हैं, तभी तीसरा विदेशी आकर पंच बन बैठता है।”
अथर्ववेद में भी लिखा है:
“मिथो विघ्नाना उप यन्तु मृत्युम्।”
— अथर्ववेद 6।32।3
अर्थ: परस्पर लड़ने वाले मृत्यु को प्राप्त होते हैं और नष्ट हो जाते हैं।
‘भारत की अवनति के सात कारण’ पुस्तक स्वामी जगदीश्वरानंद सरस्वती द्वारा लिखी गई है। प्रस्तुत लेखमाला इसी पुस्तक से लिए हुए कुछ अंशों पर आधारित है।

