कोटा में ‘जलन से जल तरंग’ नाटक का प्रभावी मंचन
कोटा / रंगीतिका संस्था द्वारा मदर टेरेसा स्कूल के सभागार में राम शर्मा कापरेन द्वारा लिखित ‘जलन से जल तरंग’ नाटक का मंचन किया गया। नाटक का निर्देशन साहित्यकार और शिक्षाविद स्नेहलता शर्मा ने किया।
‘जलन से जल तरंग’ को भरत मुनि की पंचम वेद संज्ञा की परंपरा में रचा गया है। कार्यक्रम का संचालन विजय जोशी ने किया, जिन्होंने नाटक के साहित्यिक और दार्शनिक आमंत्रण पत्र की व्याख्या करते हुए पंच महाभूतों की नाटकीय संदर्भ में प्रस्तुति दी।
यह नाटक एसिड अटैक पीड़िता की पीड़ा और आंतरिक संघर्ष को गहराई से अभिव्यक्त करता है। कुछ वर्ष पहले महिलाओं और युवतियों पर एसिड अटैक की घटनाएं काफी बढ़ गई थीं। नाटक की प्रेरणा मुंबई की एक ऐसी पीड़िता से ली गई है, जिसने दर्दनाक अनुभवों से गुजरने के बाद अन्य पीड़िताओं को मार्ग दिखाने का कार्य किया। यह नाटक एक प्रकार से उस वीरता को श्रद्धांजलि है।
मुख्य पात्र ‘निम्मो’, जिसकी भूमिका लावण्या जोशी ने निभाई है, ने अपनी भूमिका के साथ पूर्ण न्याय किया है। एसिड अटैक से उत्पन्न निम्मो के मानसिक द्वंद्व और उसके मनोबल के माध्यम से अन्य पीड़िताओं के उद्धार को जीवन का उद्देश्य बनाने का चित्रण प्रभावशाली रूप से किया गया है। इसमें निर्देशक स्नेहलता शर्मा की दृष्टि और कुशलता झलकती है।
निम्मो की माँ की भूमिका में हिमानी शर्मा और पिता की भूमिका में राम शर्मा का अभिनय अत्यंत प्रभावशाली रहा। दोनों के बीच पति-पत्नी के रूप में संवादों और भावनात्मक रसायन (केमेस्ट्री) का अच्छा तालमेल रहा।
नाटक के संवाद काफी प्रवाहशील हैं, जिनमें पात्रों की सामाजिक और भाषाई पृष्ठभूमि के अनुरूप अंग्रेज़ी और उर्दू शब्दों का संयोजन देखने को मिला। राम शर्मा ने मूल रचित नाटक में कई प्रभावशाली इंप्रोवाइजेशन किए, जैसे निम्मो द्वारा पढ़ी गई कविता और श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक का अंत में भावनात्मक प्रयोग।
निम्मो के एसिड अटैक के बाद की मानसिक स्थिति, माता-पिता के आर्थिक और भावनात्मक संघर्ष के प्रसंगों को भी अभिनय के माध्यम से बखूबी उभारा गया है। इन दृश्यों ने दर्शकों को गहराई से छुआ।
एक छोटे किंतु उल्लेखनीय किरदार ‘अब्दुल ऑटोवाले’ की भूमिका में अभिनेता ने भी अच्छी प्रस्तुति दी।
नाटक दर्शकों को पूरी तरह बांधे रखने में सफल रहा। मुख्य पात्रों का सशक्त अभिनय नाटक को सहजता से उसकी परिणति तक ले गया। नाटक का अंत सुखांत और आशावादी है, जो कि भारतीय नाट्यशास्त्र की मूल भावना के अनुरूप है।
किसी भी नाटक की सफलता में प्रकाश और ध्वनि संयोजन की अहम भूमिका होती है। इस दिशा में अंशु दाधीच और अश्वत्थामा का संगीत पक्ष नाटक के प्रभाव को और अधिक बढ़ा देता है।
दर्शकों की उत्साहजनक उपस्थिति ने कलाकारों का मनोबल और अधिक ऊँचा किया। राम शर्मा और उनकी टीम सीमित संसाधनों में भी शिवराम स्वर्णकार, शारद तैलंग और मास्टर राधाकृष्ण जी की लुप्त होती परंपरा को बचाने का सराहनीय प्रयास कर रही है।
कार्यक्रम के अतिथियों डा. अतुल चतुर्वेदी, डॉ. गिरी, और दीपक सक्सेना ने अपने सारगर्भित विचारों से नाटक के सशक्त पक्षों को रेखांकित किया।
सुझाव मात्र यह है कि मंच पर प्रॉप्स (props) का प्रयोग और अधिक सावधानी से किया जाए तो प्रस्तुति और अधिक प्रभावशाली हो सकती है।

