बशीर बद्र पर डॉ रजिया हामिद जी के द्वारा संकलित लेखों की पुस्तक ‘फिक्रो आगही’ के विमोचन पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए :
बशीर बद्र जी से व्यक्तिगत परिचय से पहले मेरा उनके साहित्य से परिचय था और यह IAS बनने से पहले था. मैं उस 1987 बैच का हूँ जिसमें टॉपर आमिर सुभानी थे जो आगे चलकर बिहार के मुख्य सचिव बने. उन्हें जौन एलिया पसन्द थे मुझे बशीर बद्र. वे मुझे उनके शेर सुनाते मैं उन्हें इनके. सरकारी नौकरी अपनी तरह से हमें officialized करती है, formalized भी. और कभी कभी dehumanised भी. तब मुझे बार बार बशीर बद्र याद आते थे कि
कोई हाथ भी न मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है जरा फासले से मिला करो
तब हमें respectable distance के मानी बताए जाते थे. हम एक ऐसी दुनिया में थे जहां बशीर बद्र के शब्दों में ही कहूँ तो लिबास की कीमत थी, आदमी की नहीं. मैं उस दुनिया का नया नया बाशिंदा था, इसी भोपाल से उठा था और फिर UPSC इम्तहान क्लीयर करके जब भारत की सबसे प्रीमियर सर्विस में पहुँच गया तो यह sense of inadequacy, यह अपर्याप्तता बोध मुझे बना ही हुआ था. वही बशीर की बात :
मैंने दो चार किताबें तो पढ़ी हैं लेकिन
शहर के तौर तरीके मुझे कम आते हैं
कई मामलों में, कई moments पर मैं अपने आपको उस दुनिया का अनागरिक-सा महसूस करता था कि यह कहाँ आ गया हूँ. कुछ estrangement सा था. अजनबियत-सी. आश्वस्त-सा नहीं लगता था स्वयं को मैं. कड़वाहट नहीं थी, गुस्सा भी नहीं था मैं. बस कहीं कोई दरार-सी थी. तब कितनी बार मुझे बशीर याद आते थे :
सौ खुलूस बातों में सौ करम खयालों में
बस जरा वफा कम है तेरे शहर वालों में.
तो हो सकता है कि बशीर हमारी शहरी संस्कृति पर टिप्पणी कर रहे हों और शहर को लगभग वैसे ही देख रहे हों जैसे टी. एस. इलियट ने वेस्टलैंड में देखा था:
Unreal City / under the brown fog of a winter dawn..
या जैसे हनुमान जी ने त्रिकूट पर्वत पर चढ़कर लंका की कुटिल नगरी को देखा था. या जैसे निसिम एज्कील अपनी एक अंग्रेजी कविता में कहते हैं कि
शहर की साँस धुंआ है, शहर का दिल पत्थर:
The city’s breath is smoke, it’s heart is stone.
बशीर की गज़लों में इस शहरी ज़िन्दगी के प्रति वह एलियनेशन बार बार दीख पड़ता है:
इक शहर था खराब जहाँ कोई भी न था
हम लौट आये हम-सा वहाँ कोई भी न था
पर मैं इन शे’रों को एक दूसरे निजी अर्थ में लेता था, अपनी सर्विस में जब मेरा enculturation या acclimatization नहीं हुआ था. और तब बशीर बद्र जी की ये ग़ज़लें मेरी सहचर, मेरी हमसफर, मेरी हमनवा हुआ करती थीं:
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला
घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया, कोई आदमी न मिला.
इसलिए मुझे बशीर बद्र जी का वो कहना सही ही लगा था कि ग़ज़ल के शे’र की ज़बान सरकारी और किताबी नहीं है. यह बात एक मुख्तलिफ तरह से सरकार में शामिल होकर ही समझी जा सकती थी. और फिर मैंने देखा कि मेरे एक सीनियर अफसर रहे, एक ब्यूरोक्रेट रहे IAS बी. पी. सिंह सर को जो आगे चलकर स्वयं मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव बने जिन्होंने ‘यकसाँ कल्चर‘ के शीर्षक से बशीर बद्र की गजलों का संकलन प्रकाशित किया. तो ऐसा भी होता है. फिर बशीर बद्र भोपाल आ गये. यहाँ उर्दू अकादमी का संचालन किया. वे इस भोपाल को गजलों का शहर कहते थे. बाद में अपने सामने ही सामने मैंने देखा कुछ मुशायरों में , कि कैसे वे डिमेंशिया का शिकार होते चले गये. उनकी बीमारी के वक्त मैं उनसे मिलने भी गया.
बशीर काफी लोकप्रिय और most quoted शायरों में रहे हैं. विविध भारती का जो एक बड़ा पॉपुलर शो है : उजाले अपनी यादों के. उस शो के नाम में बशीर बद्र की यादों के उजाले हैं.
और यह भोपाल के लिए एक गर्व का विषय है कि उन्होंने यहां बसने का एक कांशस डिसीज़न लिया था.
जिस बशीर को हम जानते हैं, उनकी रचनाओं के जरिए, वह उनका पूरा परिचय नहीं है क्योंकि उनका बहुत-सी साहित्य अप्रकाशित ही रह गया. इसलिए नहीं कि वे किसी अर्थाभाव में उन्हें प्रकाशित न कर सके बल्कि इसलिए कि मेरठ के दंगों में उनका बहुत कुछ ऐसा साहित्य भी जल गया. तो त्रासदी यह नहीं थी कि जो बशीर बद्र ने लिखा :
हज़ार सफ़्हों का दीवान कौन पढ़ता है
बशीर बद्र का कोई इंतिखाब दे जाओ
बल्कि यह थी कि ऐसा दीवान दुनिया के सामने आने से पहले नफरत की निरक्षरता में भस्म हो गया. 1987 में जब मैं मसूरी की IAS की प्रशिक्षण अकादमी में जा रहा था, वही वर्ष बशीर बद्र के लिए भी एक बड़ा मोड़ था. मेरठ के उस incident ने अदब का कितना नुकसान किया, उसकी कल्पना ही की जा सकती है.
लेकिन बशीर बद्र के भीतर जो स्वयंप्रभा थी, जो आत्मज्योति थी, वह कौन बुझा सकता था? वो बशीर नाम का बंदा स्वयं में एक प्रकाश था और यह बात उनसे बेहतर किसी ने लिखी भी नहीं :
वो चाँदनी की बशारत है हर्फ़-ए-आखिर तक
बशीर बद्र को लाओ बड़ा अँधेरा है
यह एक self-definition उन्होंने लिखी थी.
लेकिन वे सिर्फ़ व्यक्तिगत दुर्घटना की चिन्ता में ही सीमित नहीं थे, वे तो आने वाले समय की यांत्रिकता को भी वे देख रहे थे, ज्यादा से ज्यादा मशीनी होता जा रहा समाज, प्लास्टिक मुस्कानें, निओन हँसी. उन्हें लग रहा था कि वह दौर आता जा रहा है जब उन्हीं के शब्दों में :
कंप्यूटरों से गजलें लिखेंगे बशीर बद्र
ग़ालिब को भूल जाएगी इक्कीसवीं सदी
उसके भूलने की फिक्र में वे स्वयं स्मृति-च्युति के शिकार होते गये. एक ऐसा समय आ पहुँचा था जब कविता हाशिए पर भेजी जा रही थी, लोग अपने अपने स्वार्थों की व्यस्तताओं में गुम थे और कवि को कई बार लगता था लगता है कि उसके पाँवों के नीचे की जमीन तंग होती जा रही है. पर इसके लिए वह किस को दोष देता? वे दुनियादार या किसी तरह के चलते पुर्जे आदमी हो ही नहीं सकते थे. जो वे थे वह होना उन्होंने स्वयं चुना था :
जानकर हम बशीर बद्र हुए
इसमें तकदीर का नविश्ता क्या
कैसी fatality है जीवन. वो शायर जो यह कहता था कि :
सर पे साया-सा दस्ते दुआ याद है
अपने आँगन में इक पेड़ था याद है
वह जो कहता था कि
वो दरूदों के सलामों के नगर याद आए
नातें पढ़ते हुए कस्बात के घर याद आए
वो जो कहता था उजाले अपनी यादों के साथ रहने देने को
वही जब जिंदगी की शाम हुई तो डिमेंशिया का शिकार हो गया. भूल गया सब कुछ.
सर आर्थर कानन डॉयल का एक उपन्यास है ‘द एडवेंचर आफ द डाइंग डिटेक्टिव’ उसमें उनका एक पात्र कहता है
of all ruins, that of the noble mind is the most hurting.
कि सारे खंडहरों में से, सारे ध्वंसों में से वह ध्वंस सबसे ज्यादा दुखद है जो एक नोबुल माइंड का, एक शानदार दिमाग का होता है. शायद उन्हें इसका पूर्वाभास उन्हें हो चुका था तभी न उन्होंने ये prophetic पंक्तियाँ लिखी :
मैं तुझे भूल जाऊँगा इक दिन
वक्त सब कुछ बदल चुका होगा
नाम हम ने लिखा था आँखों में
आँसुओं ने मिटा दिया होगा.
मैं यहां पर बात खत्म कर सकता था. मन में एक पैथोस-सा, एक अवसाद-सा हो गया है यह कहते कहते पर यह जोड़ना जरूरी है कि बशीर बद्र भले सब भूल गये, उनके प्रेमी और आज की पीढ़ी उन्हें नहीं भूले हैं-
वसीम नादिर अपनी गजल ‘सुकूते इश्क में डूबा हुआ वो एक लड़का’ में उन्हें यों याद करते है :-
मोहब्बतों के हसीं ख्वाब लेके आँखों में
बशीर बद्र को पढ़ता हुआ वो इक लड़का
आसिम कमर कहते हैं
बशीर बद्र पढ़ोगे तो मैं मिलूँगा तुम्हें
उदासी नाम से हज़रत की कुल्लियात में हूँ
मोहसिन आफताब केलापुरी याद करते हैं:-
बशीर बद्र की गजलें सुना रहा था मैं
कल आसमाँ को जमीं पर बुला रहा था मैं
मेरे एक कविता संग्रह का शीर्षक ही यही था. क्षितिज को आँगन बुलाते हुए बशीर बद्र अदब की दुनिया के वही क्षितिज हैं.

