धीमी पीली रोशनी में मंच पर एक आर्त स्वर गूँजता है, ‘अँखियाँ हरि दरसन को प्यासी’….इस पीड़ा को दर्शक और भी अधिक अनुभव करते हैं क्योंकि उन्हें इतनी तो जानकारी है ही कि मंच पर जिस व्यक्तित्व के बारे में एकपात्री अभिनय से बताया जाने वाला है, वह है महाकवि सूरदास। सूरदास जो जन्मतः दृष्टिहीन थे, ऐसे में यह पीड़ा और गहरा जाती है कि हरि के दर्शन करना आँख वालों के लिए भी संभव नहीं तो बिन आँखों वाला कोई कैसे देखेगा। दो घंटे के नाट्य प्रयोग में मंच पर अकेले खड़े शेखर सेन ऐसा चमत्कार रच देते हैं कि उनके साथ हर कोई स्वरों में डूबता-उतराता चला जाता है। हिंदी में संगीत नाटक की परंपरा उतनी दीर्घ नहीं है, जितनी मराठी में है।

मराठीभाषी बहुल क्षेत्र पुणे के दर्शक इस विधा से परिचित हैं और कुछ हद तक सूरदास से भी। पुणे के दर्शकों के बारे में कहा जाता है कि या तो सिर आँखों पर बैठा लेते हैं या सिरे से खारिज कर देते हैं। दर्शक दीर्घा से बार-बार आने वाली तालियों की गड़गड़ाहट शेखर सेन के अभिनय और सुरों पर उनकी पकड़ पर मुहर लगा रही थी। देखने वालों में भी केवल आम दर्शक नहीं थे। कभी महाभारत में कृष्ण का पात्र अदा करने वाले नीतीश भारद्वाज अपने भक्त बने शेखर को देख रहे थे, तो पं. जितेंद्र अभिषेकी के सुपुत्र पं. शौनक अभिषेकी भी पहली कतार में बैठे थे। मतलब इधर सुर चूका, उधर पकड़ में आ गए। पर दो घंटों में 34 पदों-गीतों, जिनमें कुछ प्रचलित थे, कुछ अप्रचलित को बिना चूके प्रस्तुत कर गए शेखर सेन। प्रचलित गीतों की परंपरागत धुनों को उन्होंने बदल दिया था। इस तरह वे गीत भी नए लग रहे थे। सूरदास से उनके जीवनकाल में मिलने आए तानसेन, बैजू बावरा, तुलसीदास, रहमान, मीराबाई के मुख से उनके भजनों-गीतों और अमीर खुसरो के सूफी कलाम को भी गा उठे शेखर। बीच-बीच में वे किसी खास राग या ताल का परिचय भी देते जा रहे थे।

वैसे भी यह नाटक दो स्तर पर समानांतर चल रहा था। एक तो सूरदास का जीवन परिचय किस्सागोई की शैली में उनके जन्म से 105 वर्षों के उनके जीवनकाल को समेटे था, दूसरी ओर कृष्ण सखा नाम से संबोधन देने वाले अपने प्रिय कृष्ण की लीलाओं को भी सूरदास अपने शब्दों में बता उनके जीवन का आख्यान दे रहे थे। आजकल स्कूल-कॉलेजों में पीपीटी प्रस्तुतियों एवं नाना तरीकों से अभ्यास को सरल तथा रोचक बनाने पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में स्कूलों-कॉलेजों को अपने यहाँ इस तरह की प्रस्तुतियों को भी रखना चाहिए। पीपीटी का सेटअप लगाने में भी धन लगता है, तो वह धन नाट्य मंचन के लिए खर्च किया जा सकता है। दृश्य-श्रव्य, संगीत, साहित्य का समागम मल्टीमीडिया ही तो है। इससे दो फायदे होंगे एक तो विद्यार्थी सरलता से महान् विभूतियों के बारे में जान-समझ पाएँगे, याद रख पाएँगे दूसरा नाटक जैसी आर्थिक दृष्टि से कमजोर मानी जाने वाली कला का भी उद्धार होगा।

शेखर सेन खुद कहते हैं कि पिछले 27 सालों से नाटक के दम पर ही उनके घर का चौका-चूल्हा जल रहा है। कोई हिंदी रंगकर्मी इतना साहस दिखाता है तो उसे कर्मशियल कहकर दरकिनार कर देने से बेहतर है कि उसकी यात्रा में सहयोग दिया जाए। एक ओर इस बात का रोना रोना कि हिंदी में नाटक देखने आने वालों की परंपरा नहीं है, दूसरी ओर कोई इस परंपरा को बनाने की कोशिश करे तो उसके नाटक टिकट खरीदकर देखने न जाना, अजीब दोगलापन है। हिंदीभाषियों और हिंदी प्रेमियों को बंगलाभाषियों या मराठीभाषियों से सीखना चाहिए कि वे कैसे किताबें खरीदकर पढ़ते हैं, नाटक देखने टिकट खरीदकर जाते हैं और उसे हाउस फुल कर देते हैं।

यह प्रस्तुति भी हाउस फुल रही और इस नाटक की यह पहली प्रस्तुति नहीं थी। शनिवार की यह प्रस्तुति 92वीं प्रस्तुति थी। सूरदास को लिखा भी शेखर सेन ने है, निर्देशित भी उन्होंने ही किया है, संगीतबद्ध भी और मंच पर इस किरदार को निभाया भी उन्होंने ही है। हर बार अकेले दो घंटे दर्शकों को बाँधे रखना आसान नहीं है। कभी-कभी किसी भजन में वे दर्शकों को भी शामिल कर रहे थे, बड़ी शालीनता से, केवल साथ ताली देने, गा उठने के इशारे के साथ। ऐसा करते हुए वे सूरदास के चरित्र-चित्रण से भटकते नहीं हैं, बल्कि लगता है कि दर्शकों को वे सूरदास के भक्त वृंदों में बदल देते हैं, अब दर्शक भी पात्र बन गए थे। दर्शक भी साक्षी भाव से सूरदास की यात्रा, बचपन में हुई उनकी अवहेलना देख रहे थे। वे उस इतिहास के भी गवाह बन रहे थे जब इब्राहिम लोदी भारत के मंदिरों को तोड़ने निकल पड़ा था।
सूरदास के साथ गाँव-गाँव, नगर-नगर दर्शक भी मनोमन चल पड़ते हैं। उनकी खुशी में हँस देते हैं, उनकी पीड़ा में आँखों की कोर पोंछने लगते हैं, उनके साथ कृष्ण से एकाकार हो जाने की चाहना करने लगते हैं। दर्शकों के लिए यह यात्रा सुलभ हो इसलिए मंच की प्रकाश व्यवस्था सँभालते हैं पंकज मंग, ध्वनि का उचित ध्यान रखते हैं अजीत पवार। संगीत संचालन को सुलभ करते हैं विजय कुमार सरोज तो निर्माण प्रक्रिया में होते हैं नितेश शुक्ला।
इस प्रस्तुति के दौरान एक बात सहज मन में आई। माँ को किसी व्यक्ति की पहली पाठशाला कहा जाता है। वह कई बार सिद्ध भी होता है। याद है जब बालक नरेंद्र के मन में ड्राइवर बनने की इच्छा जागी तो उनकी माँ ने महाभारत युद्ध में गीता का उपदेश देते श्रीकृष्ण की छवि दिखलाई थी कि सारथी बनना तो ऐसा सारथी बनना, कृष्ण भी रथ ही तो हाँक रहे थे। जब मीराबाई ने बचपन में बारात देखी तो माँ से पूछ लिया था कि उसका दूल्हा कौन है और माँ ने कृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा कर दिया था।
सूरदास को बचपन में अपने भाई का विद्वेष सहन करना पड़ा। उन्होंने माँ से कह दिया कि मेरे साथ कोई नहीं खेलता। माँ ने उनके हाथों में लड्डू गोपाल की छोटी प्रतिमा रख दी कि यह है तुम्हारे बाल सखा। मीरा के पदों में और सूरदास के भजनों में कोई आडंबर इसलिए भी नहीं है कि वे किसी को प्रसन्न करने के लिए नहीं गा रहे। मीरा अपने प्रियतम के लिए और सूरदास अपने कृष्ण सखा के लिए गा रहे थे। मैत्री में कोई दूजाभाव कहाँ होता है। मैत्री में मोल-भाव भी नहीं होता। जो मोल-भाव करता है, वह व्यवहार करता है, सरस्वती की उपासना नहीं। सूरदास जब स्वामी हरिदास से मिलते हैं तो वे तानसेन के अकबर दरबार में गाने जाने की फाँस कह पड़ते हैं।
महाप्रभु वल्लभाचार्य के अष्टछाप के प्रमुख कवि सूरदास की ख्याति मुहावरा गढ़ देती है, उनके साथ न्याय करती है यह प्रस्तुति। दूर-दूर फैले शहर में किसी दो घंटे के आयोजन के लिए जाना मतलब भी आधे दिन को न्योछावर करना होता है। बदलती मानसिकता में लोग मॉल या मूवी देखकर आधा क्या पूरा दिन ख़त्म करना पसंद करते हैं पर नाटक देखने जाना, वह भी हिंदी नाटक, वह भी टिकट खरीदकर, वह भी अहिंदीभाषी क्षेत्र में हिंदी नाटक, पर कोई प्रस्तुति या प्रस्तुतकर्ता का नाम वलय ऐसा होता है कि लोग समय से पहले पहुँचते हैं। जिस पर प्रस्तुति होनी हो वह व्यक्तित्व भी उतना ही प्रभावशाली हो तो सोने पर सुहागा।
पुणे जैसे शहर में जहाँ सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था उतनी उम्दा न हो तो लोग अपने वाहनों और निजी वाहनों से पहुँचते हैं। सभागार ऐसा भी होना चाहिए जहाँ पर्याप्त कार पार्किंग हो। महाराष्ट्र एजुकेशन सोसाइटी का 2009 में बना कोथरूड स्थित सभागार इस आवश्यकता की पूर्ति करता है। कार खड़ी करने को सुरक्षित जगह मिल जाना दर्शकों को निश्चिंत करता है फिर सभागार में ध्वनि-प्रकाश, मंच भी अच्छे हैं और सबसे बड़ी बात वॉशरूम्स भी पर्याप्त संख्या में हैं और पर्याप्त स्वच्छ भी। कुल जमा ये सारी बातें अच्छी प्रस्तुति के लिए सहायक होती हैं क्योंकि दर्शक रिलैक्स भाव से नाटक देखते हैं, उन्हें और कोई चिंता नहीं होती तो नाटक से एकरूप हो जाते हैं…बशर्ते कि नाटक में भी इतनी ताकत हो कि वह दर्शकों को एकरूप करवा ले।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं और सामाजिक व सांस्कृतिक विषयों पर लेखन करती हैं)

