सुबह की पहली किरण जब भारत के गाँवों, खेतों और नदियों पर पड़ती है, तो वह यह स्मरण कराती है कि हमारी संस्कृति और पर्यावरण एक-दूसरे से अभिन्न हैं। सनातन परंपरा ने पंचमहाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—को जीवन का आधार माना और वेदों में नदियों, पर्वतों और वृक्षों की स्तुति करते हुए उनके संरक्षण का संदेश दिया। गंगा और यमुना को जीवनदायिनी समझा गया, पीपल और तुलसी जैसे वृक्षों को पूजा गया। यह दृष्टिकोण केवल आस्था नहीं बल्कि पर्यावरण के प्रति नैतिक दायित्व है। यही भाव भारतीय संविधान और आधुनिक पर्यावरण संरक्षण कानूनों में परिलक्षित होता है।
संविधान का अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण की रक्षा का निर्देश देता है और अनुच्छेद 51A(g) नागरिकों पर यह कर्तव्य डालता है कि वे प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण करें। 1972 का वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1974 का जल प्रदूषण निवारण अधिनियम और 1986 का पर्यावरण संरक्षण अधिनियम इसी संवैधानिक दृष्टि के प्रत्यक्ष परिणाम हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 2025 में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि “जलवायु परिवर्तन से मुक्त जीवन का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।” न्यायालय के अनुसार स्वच्छ और संतुलित वातावरण जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न अंग है और प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार भी। यह विचार सनातन संस्कृति की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से गहराई से जुड़ा है। जब पृथ्वी परिवार है, तो उसके संसाधनों और संतुलन की रक्षा करना हर नागरिक का धर्म और दायित्व बन जाता है।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान प्रारंभ किया और कहा—“आज लगाया गया पौधा कल हमारे जीवन को संजोएगा।” इस अभियान से आठ वर्षों में 204 करोड़ पौधे लगाए गए, जिनमें लगभग 75% जीवित हैं, जिससे पाँच लाख एकड़ वन क्षेत्र बढ़ा। यह उपलब्धि सरकारी पहल के साथ समाज की सक्रिय भागीदारी और सांस्कृतिक चेतना का परिणाम है। साथ ही 90,000 ग्राम पंचायतों ने कचरे को कंपोस्ट में बदलकर गाँवों को स्वच्छ बनाने के साथ करोड़ों की आय अर्जित की। यह उदाहरण दिखाता है कि संविधानिक कर्तव्य समाज स्तर पर सार्थक रूप से साकार हो रहा है।
राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वैश्विक मंचों पर भारत की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा था—“भारत प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन को विशेष महत्व देता है। हम सतत विकास हेतु एकल-उपयोग प्लास्टिक और सूक्ष्म-प्लास्टिक प्रदूषण को घटाने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं।” अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में उन्होंने घोषणा की—“साल 2030 तक हमारी 50 प्रतिशत बिजली स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त होगी, लेकिन भारत ने यह लक्ष्य पाँच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया है।” यह कथन केवल घोषणा नहीं, बल्कि उत्तर भारत में चल रहे रेल विद्युतीकरण और सौर ऊर्जा परियोजनाओं से प्रमाणित होता है, जिनसे लाखों टन कार्बन उत्सर्जन घटा है। उत्तर मध्य रेलवे ने 3,294 किलोमीटर नेटवर्क का विद्युतीकरण कर सात करोड़ लीटर डीज़ल की बचत की। समाज ने भी पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। “पॉन्ड मैन ऑफ इंडिया” रामवीर तंवर ने तालाबों का पुनरुद्धार कर जल संरक्षण का सफल मॉडल प्रस्तुत किया। यह उदाहरण दर्शाता है कि पर्यावरणीय सफलता केवल कानूनों पर निर्भर नहीं, बल्कि संस्कृति और समाज की साझी भागीदारी से संभव है। उत्तराखंड का चिपको आंदोलन और सुन्दरलाल बहुगुणा का कथन—“पर्यावरण ही स्थायी अर्थव्यवस्था है”—इस विचार को बल देते हैं। विद्वान कृष्णकांत शुक्ला ने भी लिखा कि “प्रकृति हमारी माता है” और प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार उसकी रक्षा हेतु सक्रिय कार्यकर्ता बनना चाहिए, जैसा सनातन संस्कृति में प्रतिपादित है —“माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
कुंभ के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का हालिया वक्तव्य वास्तव में पर्यावरणीय कानूनों के मूल सार को सामने लाता है। उनका यह कहना कि “आपदा की प्रतीक्षा न की जाए” भारतीय पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और जल-वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियमों में निहित निवारक दृष्टिकोण के अनुरूप है। कुंभ का संदेश है कि प्रकृति पवित्र है और उसकी रक्षा धर्म है। योगी जी का यह कथन बताता है कि पर्यावरणीय कानून तभी सार्थक होंगे जब उन्हें केवल दंडात्मक प्रावधानों के रूप में न देखकर सांस्कृतिक और नैतिक जिम्मेदारी माना जाए। यह दृष्टिकोण धार्मिकता से आगे बढ़कर विधिक और सामाजिक दायित्व को भी स्मरण कराता है। प्रधानमंत्री द्वारा स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को समय से पहले प्राप्त किए जाने का उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि संस्कृति और कानून का संगम सामूहिक शक्ति को जन्म देता है।
उत्तर भारत का यह अनुभव हमें यह समझाता है कि पर्यावरण संरक्षण महज़ कानूनी अनिवार्यता नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना, आत्मिक मूल्य और आने वाली पीढ़ियों की साझी धरोहर है। जब संविधान कानूनी प्रावधानों के माध्यम से संरक्षण की गारंटी देता है और संस्कृति उसे नैतिक और आध्यात्मिक कर्तव्य के रूप में स्थापित करती है, तब यह सम्मिलन पूरे समाज को यह दिशा देता है कि सतत विकास और मानवता का अस्तित्व केवल प्रकृति के संरक्षण से ही संभव है। मनुस्मृति का यह श्लोक इस दृष्टि को प्रकट करता है—
“अद्भ्यः पर्जन्यजः सोमो ब्रह्मणोऽस्य मुखादभूत्।
तेषां यः पालयेदेते स पालयत्यात्मानम्॥”
अर्थात जो मनुष्य जल, वायु और अन्य प्राकृतिक तत्वों की रक्षा करता है, वही वास्तव में अपनी आत्मा और जीवन की रक्षा करता है।
(लेखक – वर्तमान में उच्च न्यायालय, लखनऊ में राज्य विधि अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं।)

