Homeभारत गौरवराष्ट्र निर्माण में नारी शक्ति: संघ और सेविका समिति की साझा दृष्टि

राष्ट्र निर्माण में नारी शक्ति: संघ और सेविका समिति की साझा दृष्टि

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और राष्ट्र सेविका समिति दोनों का मानना है कि राष्ट्र मजबूत तभी हो सकता है जब समाज का आधा हिस्सा—महिलाएँ—संगठित और सशक्त हों। हाल के वक्तव्यों और गतिविधियों ने इस साझी दृष्टि को और स्पष्ट किया है।

RSS प्रमुख डॉ. मोहन भागवत जी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था, “समाज को सुधारना है तो 50 प्रतिशत (जनसंख्या) को अलग नहीं रख सकते।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ और सेविका समिति अलग-अलग कार्य करते हैं, लेकिन उद्देश्य एक ही है—राष्ट्र की शक्ति को संगठित करना। भागवत जी ने आगे कहा: “हमने तय किया है कि हम समानांतर रूप से कार्य करेंगे। हम एक-दूसरे के क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं करेंगे। हमें हमेशा एक-दूसरे की मदद करनी है… महिला प्रतिनिधियों को कोर समिति की बैठकों में बुलाया जाता है, वे सभी चर्चाओं में हिस्सा लेती हैं, और निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं।” उनका यह वक्तव्य न केवल संघ की निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी को स्वीकार करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि संगठनात्मक संरचना में महिलाओं की उपस्थिति कितनी आवश्यक है।

भागवत जी ने एक अन्य अवसर पर कहा था, “महिलाओं का उत्थान पुरुषों पर निर्भर नहीं है; वे स्वयं सशक्त होंगी और यह स्वतः सभी को सशक्त करेगा।” उन्होंने महिलाओं की दीर्घकालीन भूमिका पर प्रकाश डालते हुए यह भी कहा: “महिला किसी राष्ट्र की प्रगति में सबसे महत्वपूर्ण घटक हैं… यदि एक पुरुष प्रशिक्षित हो, वह जीवनभर काम करेगा; लेकिन यदि महिला प्रशिक्षित हो, तो वह आने वाली पीढ़ियों को भी विकास की ओर ले जाएगी।”

हाल ही में विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यानमाला के आखिरी दिन मोहन भागवत जी ने कहा, “राष्ट्र सेविका समिति 1936 में बनी। तब से यह तय है कि वे वहां काम करेंगी, शाखाएं वहां चलाएंगी, हम पुरुषों में चलाएंगे, पैरलल रहेंगे, मिलेंगे नहीं, एक-दूसरे की मदद करेंगे।” उन्होंने आगे जोड़ा, “अगर इसमें कुछ परिवर्तन करना है, तो राष्ट्र सेविका समिति को हमें बताना पड़ेगा कि अब बदलो, तब हम बदलेंगे। हम उस वचन का पालन कर रहे हैं।” इस वक्तव्य ने यह संकेत दिया कि महिला संगठन अपनी स्वायत्तता के साथ चलता है और उसके सुझावों को संगठन में वरीयता दी जाती है।

RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले जी ने एक सभा में कहा: “भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति केवल गृहिणी की भूमिका तक सीमित नहीं रही है। वह विचार, संस्कृति और संगठन की धुरी है। जब सेविका समिति की बहनें राष्ट्रभक्ति और अनुशासन के साथ समाज में उतरती हैं, तो सामाजिक परिवर्तन की गति दोगुनी हो जाती है।”

संघ के पूर्व सरकार्यवाह भैयाजी जोशी जी ने भी महिलाओं की भागीदारी को रेखांकित करते हुए कहा था: “सेविका समिति ने यह सिद्ध किया है कि संगठन की शक्ति किसी लिंग पर आधारित नहीं होती। राष्ट्र की सेवा करने का भाव यदि प्रबल हो, तो स्त्री-पुरुष दोनों समान रूप से राष्ट्र को दिशा दे सकते हैं।”

1936 में लक्ष्मीबाई केलकर जी ‘मौसीजी’ द्वारा स्थापित राष्ट्र सेविका समिति ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक महिलाओं के संगठन और प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी है। अखिल भारतीय प्रमुख संचालिका शान्ताक्का जी ने सेविका समिति की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा: “हमारे लिए राष्ट्र सेवा केवल बाहरी कार्य नहीं है, यह घर-घर में संस्कार और संगठन की नींव डालने का कार्य है। जब महिलाएँ संगठित होती हैं, तो वे समाज के हर हिस्से में परिवर्तन का कारण बनती हैं।”

समिति की वरिष्ठ प्रचारिका सीता गायत्री अन्नादनम जी ने कहा: “महिलाओं की सुरक्षा उनकी पोशाक में नहीं, पुरुषों की नजर में है। माताओं को अपने पुत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना और मूल्य संचारित करने चाहिए।” गोरखपुर में आयोजित एक प्रशिक्षण शिविर में समिति की क्षेत्र प्रचारिका शशि जी ने कहा: “हम महिलाओं को मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक रूप से मजबूत बनाना चाहते हैं ताकि वे परिवार और राष्ट्र—दोनों के प्रति दायित्व अच्छे से निभा सकें।” इस शिविर में 25 जिलों से आईं 300 से अधिक सेविकाओं ने पैदल मार्च किया, योग और व्यायाम का प्रदर्शन किया, और राष्ट्रगीत के साथ अनुशासन का परिचय दिया।

समिति की दिवंगत प्रमुख प्रमिलताई मेधे जी ने भी अपने जीवनकाल में महिला शक्ति पर विशेष बल दिया था। 97 वर्ष की आयु में उन्होंने 266 दिनों की “भारत परिक्रमा” का नेतृत्व करते हुए कहा था, “स्त्री यदि अपने राष्ट्रधर्म के प्रति जागरूक हो जाए, तो कोई शक्ति समाज को पतन की ओर नहीं ले जा सकती। सेविका समिति का ध्येय ही यह है कि हर महिला अपने भीतर की शक्ति को पहचान सके।”

आज सेविका समिति का विस्तार देशभर में व्यापक है। देश के सभी 12 क्षेत्र और 38 प्रांतों में राष्ट्र सेविका समिति की 4,125 शाखाएं कार्यरत हैं। कुल 1,042 जिलों में से 834 जिलों में समिति का कार्य है। समिति की सेविकाओं द्वारा देशभर में 1,799 सेवा कार्य चलाए जा रहे हैं। समिति से जुड़ी महिलाओं की संख्या लगभग चार लाख तक पहुँच चुकी है।

निष्कर्षत: भारत आज वैश्विक मंच पर नई पहचान बना रहा है और इस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा राष्ट्र सेविका समिति की साझा दृष्टि और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यह स्पष्ट है कि राष्ट्र की प्रगति का मार्ग तभी प्रशस्त होगा जब महिलाएँ केवल सहयोगी नहीं, बल्कि नेतृत्वकारी भूमिका में होंगी। पुरुष शाखाओं और महिला शाखाओं का यह संयुक्त संकल्प दर्शाता है कि राष्ट्र निर्माण किसी एक वर्ग का कार्य नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। जब नारी शक्ति आत्मविश्वास, शिक्षा और संगठन के साथ खड़ी होती है, तो वह न केवल वर्तमान समाज को दिशा देती है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को भी आलोकित करती है। इस साझा दृष्टि का यही सशक्त संदेश है कि – नारी सशक्तिकरण ही सच्चा राष्ट्र सशक्तिकरण है।

(लेखिका दंत चिकित्सक एवं दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पी.एच.डी हैं तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर निरंतर लेखनरत हैं)

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