Homeभारत गौरवदत्तात्रय रामचंद्र कापरेकर, जिन्होंने गणित की कई जादुई संख्याएँ खोज निकाली

दत्तात्रय रामचंद्र कापरेकर, जिन्होंने गणित की कई जादुई संख्याएँ खोज निकाली

मराठी गणितज्ञ दत्तात्रेय रामचंद्र कापरेकर ने रहस्यमय संख्या 6174 से दुनिया को परिचित करवाकर अपनी गणितीय प्रतिभा का परचम फहरा दिया।
इस संख्या ने पूरी दुनिया के गणितज्ञों की नींद उड़ा दी है। वो एक या दो दिन नहीं, बल्कि यह संख्या 1949 से एक रहस्य बनी हुई है। कापरेकर की खोजें शुरू में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नज़रअंदाज़ की गईं, पर बाद में पश्चिमी गणितज्ञों ने इन्हें अद्भुत माना।

रामचंद्र कापरेकर ने दिखाया कि गणित सिर्फ कठिन समीकरणों की दुनिया नहीं है, बल्कि उसमें खेल, जादू और आश्चर्य भी छिपा है। उनका काम संख्या सिद्धांत (Number Theory) और Recreational Mathematics में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यद्यपि उन्होने औपचारिक रूप से परास्नातक प्रशिक्षण नहीं पाया था और एक विद्यालय में अध्यापन करते थे, फिर भी उन्होने व्यापक रूप से शोधपत्र प्रकाशन किए और मनोरंजक गणित के क्षेत्र में विख्यात हुए।

उनका जन्म 17 जनवरी 1905 को मुंबई के पास दहाणु में हुथा था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा थाणे और पुणे में, तथा स्नातक की शिक्षा मुम्बई विश्वविद्यालय से हुई थी। उन्होंने गणित या किसी अन्य विषय में स्नातकोत्तर शिक्षा नहीं पायी थी और नासिक में एक विद्यालय में अध्यापक थे। गणित में उच्च शिक्षा न प्राप्त करने के बावजूद उन्होंने संख्या सिद्धान्त पर काम किया।

कुछ स्थिरांक और बहुत सी संख्यायें उनके नाम से जाने जाते हैं। वे मनोरंजात्मक गणित के क्षेत्र में जाने माने व्यक्ति थे। उच्च शिक्षा न प्राप्त करने के कारण भारत में गणितज्ञों ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जो उन्हें मिलना चाहिये था। उनके शोधपत्र भी निम्न श्रेणी के गणित की पत्रिकाओं में छपते थे। वे गणित के सम्मेलनों में अपने पैसे से जाते थे और अंको पर व्याख्यान देते थे। उन्हें भारत में सम्मान तब मिला मार्टिन गार्डनर ने साईंटिफिक अमेरिकन के मार्च, 1975 अंक में, उनके बारे में लिखा।

वे पेशे से स्कूल शिक्षक थे, परंतु दिल से महान गणितज्ञ। उन्हें अक्सर “रेक्रिएशनल मैथमेटिक्स (Recreational Mathematics) के महारथी” कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने गणित को खेल और रहस्य के रूप में प्रस्तुत किया। कापरेकर के पास गणित विषय में आधिकारिक शिक्षा नहीं थी। लेकिन वे गणित से बहुत प्यार करते थे। आगे बढ़ते हुए उन्होंने मंदिर क्षेत्र के एक स्कूल में गणित की पढ़ाई शुरू की। बस इसी तरह वे बचपन से ही गणित के सबसे कठिन प्रश्नों को हल करना पसंद करते थे कई स्थिर, साथ ही कई संख्याएं उनके नाम से पहचाने जाते हैं। उन्होंने ‘मनोरंजन गणित’ को लोकप्रिय बना दिया।

लेकिन यह सब तुरंत नहीं हुआ। सिस्टम उनसे हमेशा भेदभाव करता रहा क्योंकि उनके पास गणित में आधिकारिक शिक्षा नहीं थी और मिडिल स्कूल में शिक्षण नहीं था। कोई भी उनके अपने खोज निबंध नहीं छापता, वे अपने खर्च पर गणित सम्मेलन में जाते थे क्योंकि इनका गणित के लिए प्यार था। उन्होंने 1949 में एक समान गणित सम्मेलन में इस असाधारण संख्या के बारे में जानकारी दी थी। लेकिन दूसरे गणितज्ञों ने अपने अहंकार में उस समय उनका मजाक उड़ाया था। भले ही भारत इस अवधारणा का महत्व नहीं समझता था, लेकिन विदेशी गणितज्ञों ने इस भारतीय जीनियस का संज्ञान लिया।

1975 में एक प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक मार्टिन गार्डर ने एक बड़ी विज्ञान पत्रिका में इस बारे में एक लेख लिखा था। उसके बाद, दुनिया भर के गणितज्ञों का ध्यान उन पर गया।

कापरेकर की खोजें
कापरेकर ने कई अनोखी खोजें कीं:

कापरेकर संख्या (Kaprekar Numbers)
जैसे: 297

297² = 88209

अब (88 + 209) = 297

यानी यह संख्या खुद ही “अपनी पहचान” वापस देती है।

कापरेकर स्थिरांक – 6174
इसे “कापरेकर रूटीन” भी कहा जाता है।

प्रक्रिया:

कोई भी 4-अंकीय संख्या लीजिए (लेकिन सभी अंक एक जैसे न हों)।
उसके अंकों को बड़े से छोटे और छोटे से बड़े क्रम में लिखकर दो संख्याएँ बनाइए।
बड़ी संख्या – छोटी संख्या का घटाव कीजिए।
इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराइए।
हर बार अंत में आप 6174 पर पहुँचेंगे।

उदाहरण:

3524 → 5432 – 2345 = 3087
8730 – 0378 = 8352
8532 – 2358 = 6174 ✅

इसके बाद प्रक्रिया दोहराएँ तो हमेशा 6174 ही आता रहेगा।
इसलिए 6174 को “गणित की जादुई स्थिरांक (Kaprekar’s Constant)” कहा जाता है।

स्वयं संख्याएँ (Self Numbers)
ऐसी संख्याएँ जिन्हें किसी भी संख्या + उसके अंकों के योग से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
जैसे 20 → (15 + 1 + 5 = 21), तो 20 किसी से उत्पन्न नहीं हो सकती, इसलिए यह एक Self Number है।

उदाहरण से समझें
मान लीजिए हमें देखना है कि 20 स्वयं संख्या है या नहीं।
पहले जाँचते हैं कि क्या 20 किसी संख्या का परिणाम हो सकती है?

मान लीजिए संख्या 15 लेते हैं।
15 + (1+5) = 15 + 6 = 21 ❌ (20 नहीं बना)

अब 14 लेते हैं।
14 + (1+4) = 14 + 5 = 19 ❌

13 लेते हैं।
13 + (1+3) = 13 + 4 = 17 ❌

16 लेते हैं।
16 + (1+6) = 16 + 7 = 23 ❌

👉 कहीं से भी 20 नहीं बन रही।
इसलिए 20 एक Self Number है ✅

यह कॉप्रेकर मुद्दा कैसे काम करता है यह देखने के लिए संख्या 1234 ले लें।
बस एक बात का ख्याल रखना एक नंबर एक बार आना चाहिए
अब इसे एक अवरोही क्रम में लिखते हैं – 4321
चढ़ाई क्रम में इसे फिर से लिखें – 1234
अब बड़ी संख्या से छोटी संख्या घटायें – (4321-1234= 3087)
अब अंकों के घटते क्रम में लिखे ये नया नंबर – 8730
उस संख्या को फिर से बढ़ते क्रम में लिखो – 0378
अब बड़ी संख्या से छोटी संख्या को घटाएं – (8730 – 378 =8352)
आइए अंक के बढ़ते क्रम में उत्तर लिखें – 8532
चलो बड़ी संख्या से छोटी संख्या को फिर से घटाएं – (8532-2358 = 6174).
ये 6174 जवाब है कैप्रेकरों का जादू जादुई संख्या का जवाब है।

अब ऊपर दी गई प्रक्रिया के अनुसार इस जादुई संख्या को दोहराएँ, चाहे कुछ भी करें जवाब है 6174 कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह प्रक्रिया कितनी बार बार बार हो, अगला जवाब 6174 है…
आपकी पुष्टि के लिए दूसरा नंबर लेकर इस प्रक्रिया को आजमाएं। अब इस नंबर को 2005 लेते हैं, इसके साथ ऊपर की प्रक्रिया दोहराएँ
5200 – 0025 = 5175
7551 – 1557 = 5994
9954- 4599 = 5355
5553 – 3555 = 1998
9981 – 1899 = 8082
8820 – 0288= 8532
8532 – 2358 = 6174
7641 – 1467 = 6174

जरूरी शर्त सिर्फ एक बात का ध्यान रखे नंबर एक बार जरूर आए। इसे अपने लिए देखें। जवाब 6174 आएगा। गणितज्ञों के लिए आज भी पहेली है ये नंबर।

कापरेकर संख्या
ऐसी संख्या को कापरेकर संख्या कहते हैं जिसके वर्ग को दो ऐसे ‘भागों’ में विभाजित किया जा सके कि उन्हें जोड़कर हम पुनः प्रारम्भिक संख्या को प्राप्त कर सकें।

उदाहरण के तौर पर यदि हम ५५ की संख्या को लें तब

५५² = ५५ x ५५ = ३०२५३० + २५ = ५५

अतः ५५ एक कापरेकर संख्या है। इस तरह के अन्य संख्याएं हैं –

१, ९, ४५, ५५, ९९, २९७, ७०३, ९९९, २२२३, २७२८, ४८७९, ४९५०, ५०५०, ५२९२, ७२७२, ७७७७, ९९९९, १७३४४, २२२२२, ३८९६२, ७७७७८, ८२६५६, ९५१२१, ९९९९९, १४२८५७, १४८१४९, १८१८१९, १८७११०, २०८४९५, ३१८६८२, ३२९९६७, ३५१३५२, ३५६६४३, ३९०३१३, ४६१५३९, ४६६८३०, ४९९५००, ५००५००, ५३३१७० आदि।

डेमलो संख्याएँ
1, 11, 111, 1111, आदि Repunit संख्याएँ हैं, अर्थात Repeated Unit संख्याएँ। इनके वर्ग को डेमेलो संख्या कहते हैं जिनका आविष्कार कर्पेकर ने किया था।

देखिए,

1² = 111² = 121111² = 123211111² = 1234321

डेमलो संख्या के नामकरण की भी कहानी है। डेमलो (Demlo) कोई रेलवे स्टेशन है जहाँ उन्हें इस संख्या का विचार आया था।

हर्षद संख्या
हर्षद संख्याओ वे संख्याएँ हैं जो अपने अंको के योग से भाज्य होती हैं। काप्रेकर ने इनका आविष्कार किया था और इन्हे हर्षद संख्या अर्थात ‘आनन्ददायक संख्या ‘कहा था।

उदाहरण के लिये 12 एक हर्षद संख्या है क्योंकि यह संख्या 1 + 2 = 3 से भाज्य है।

#भारतीयगणित

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