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हिंदी सबको जोड़ती है

हिंदी-दिवस हर वर्ष १४ सितंबर को मनाया जाता है। सरकारी कार्यालयों में, शिक्षण-संस्थाओं में, हिंदी-सेवी संस्थाओं आदि में हिंदी को लेकर भावपूर्ण भाषण व व्याख्यान, निबंध-प्रतियोगिताएं, कवि-गोष्ठियां पुरस्कार-वितरण आदि समारोह धड़ल्ले से होते हैं। प्रश्न यह है कि इस तरह के आयोजन पिछले लगभग पचहत्तर सालों से होते रहे हैं। क्या हिंदी को हम वह सम्मानजनक स्थान दिला सके हैं जिसका संविधान में उल्लेख है? जन-जन की भाषा भले ही वह बन गई हो मगर क्या अच्छी नौकरियां दिलाने में इस भाषा की कोई भूमिका है? कई सारी अच्छी नौकरियां दिलाने वाली प्रतियोगी-परीक्षाओं में आज भी हिंदी उपेक्षित है। हिंदी को ‘ज़रूरत’ से जोड़ने की आज सख्त जरूरत। हिंदी-आयोजन अपनी जगह और हिंदी की ‘वास्तविक उपयोगिता’ अपनी जगह। विज्ञान, मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रबंधन आदि विषयों में जब तक मूल-लेखन सामने नहीं आएगा, हिंदी का भविष्य अधर में ही झूलता रहेगा।

हिंदी-प्रेमियों को इस मुद्दे पर हिंदी-समारोहों के दौरान गंभीरता से विचार करना चाहिए। भाषण देने, बाज़ार में सौदा-सुलफ खरीदने या फिर फिल्म/सीरियल देखने के लिए हिंदी ठीक है, मगर अच्छी नौकरियों के लिए या फिर उच्च अध्ययन के लिए अब भी अंग्रेजी का दबदबा बन हुआ है। इस दबदबे से कैसे मुक्त हुआ जाए? निकट भविष्य में आयोजित होने वाले हिंदी-आयोजनों के दौरान इस पर भावुक हुए बिना वस्तुपरक तरीके से विचार-मंथन होना चाहिए। एक बात और निजी क्षेत्र के संस्थानों में हिंदी की स्थिति शोचनीय बनी हुई है और मात्र कमाने के लिए इसका वहां पर ‘दोहन’ किया जा रहा है? इस प्रश्न का उत्तर भी हमें निष्पक्ष होकर तलाशना होगा।

कुल मिलाकर हिंदी-प्रेम का मतलब हिंदी विद्वानों, लेखकों, कवियों आदि की जमात तैयार करना नहीं है। हिंदी-प्रेम का मतलब है हिंदी के माध्यम से रोजगार के अच्छे अवसर तलाशना, उसे उच्च अध्ययन खास तौर पर विज्ञान और टेक्नोलॉजी की पढ़ाई के लिए एक कारगर माध्यम बनाना और उसे देश की अस्मिता व प्रतिष्ठा का सूचक बनाना।

संघ लोक सेवा आयोग के सीसैट पर्चे की परीक्षा के विरुद्ध आंदोलन ने एक बार फिर अंग्रेजी के बरक्स हिंदी की हैसियत का एहसास कराया है। चाहे प्रश्न-पत्र हो या सरकारी चिट्ठी, राज-काज की मूल प्रामाणिक भाषा अंग्रेजी है। रैपिड इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स के सर्वव्यापी विज्ञापन और कुकरमुत्ते की तरह उगते इंग्लिश मीडियम के स्कूल अंग्रेजी के साम्राज्य का डंका बजाते हैं। बॉस को खुश करने को लालायित जूनियर, मेहमान के सामने बच्चे को पेश करते मां-बाप या प्रेमिका को पटाने की कोशिश में लगा लड़का… जहां-जहां अभिलाषा है वहां-वहां अंग्रेजी है। सत्ता का व्याकरण हिंदी में नहीं अंग्रेजी में प्रकट होता है। ऐसे में राज-भाषा का तमगा एक ढकोसला है। हिंदी-भाषी प्रदेशों में स्थिति फिर भी कुछ ठीक है।

हिंदी प्रचार-प्रसार सम्बन्धी कई राष्ट्रीय संगोष्ठियों में मुझे सम्मिलित होने का सुअवसर मिला है। इन संगोष्ठियों में अक्सर यह सवाल अहिंदी-भाषी हिंदी विद्वान करते हैं कि हम तो हिंदी सीखते हैं या फिर हमें हिंदी सीखने की सलाह दी जाती है, मगर आप लोग हमारी यानी दक्षिण भारत की एक भी भाषा सीखने के लिए तैयार नहीं हैं। यह रटा-रटाया तर्क सुनते-सुनते मैं पक गया और आखिर एक सेमिनार में मैंने कह ही दिया कि दक्षिण की कौनसी भाषा आप लोग हम को सीखने के लिए कह रहे हैं? तमिल/मलयालम/कन्नड़/या तेलुगु? और फिर उससे होगा क्या? आपके अहम् की संतुष्टि? पंजाबी-भाषी डोगरी सीखे तो बात समझ में आती है। राजस्थानी-भाषी गुजराती या सिन्धी सीख ले तो ठीक है। इन प्रदेशों की भौगोलिक सीमाएं मिलती हैं, अतः व्यापार या परस्पर व्यवहार आदि के स्तर पर इससे भाषा सीखने वालों को लाभ ही होगा। अब आप कश्मीरी-भाषी से कहें कि वह तमिल या उडिया सीख ले या फिर पंजाबी-भाषी से कहें कि वह बँगला या असमिया सीख ले (क्योंकि इससे भावात्मक एकता बढ़ेगी) तो आप ही बताएं यह बेहूदा तर्क नहीं है तो क्या है? इस तर्क से अच्छा तर्क यह है कि अलग-अलग भाषाएँ सीखने के बजाय सभी लोग हिंदी सीख लें ताकि सभी एक दूसरे से सीधे-सीधे जुड़ जाएं।

देखिए किसी भी भाषा का विस्तार या उसकी लोकप्रियता या उसका वर्चस्व तब तक नहीं बढ़ सकता जब तक कि उसे ‘ज़रूरत’ यानी ‘आवश्यकता’ से नहीं जोड़ा जाता। यह ‘ज़रूरत’ अपने आप उसे विस्तार देती है और लोकप्रिय बना देती है। हिंदी को इस ‘ज़रूरत’ से जोड़ने की आवश्यकता है। मुझे यह कहना कोई अच्छा नहीं लग रहा और सचमुच कहने में तकलीफ भी हो रही है कि हिंदी की तुलना में ‘अंग्रेजी’ ने अपने को इस ‘ज़रूरत’ से हर तरीके से जोड़ा है। जिस निष्ठा और गति से हिंदी और गैर-हिंदी प्रदेशों में हिंदी प्रचार-प्रसार का कार्य हो रहा है उससे दुगुनी रफ्तार से अंग्रेजी माध्यम से ज्ञान-विज्ञान के नए-नए क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं जिनसे परिचित हो जाना आज हर व्यक्ति के लिए लाजिमी हो गया है। मेरे इस कथन से यह अर्थ कदापि न निकाला जाए कि मैं अंग्रेजी की वकालत कर रहा हूं। नहीं बिल्कुल नहीं। मैं सिर्फ यह रेखांकित करना चाहता हूं कि अंग्रेजी ने अपने को जरूरत से जोड़ा है।

अपने को मौलिक चिंतन, मौलिक अनुसंधान व सोच तथा ज्ञान-विज्ञान के अथाह भंडार की संवाहिका बनाया है जिसकी वजह से पूरे विश्व में आज उसका वर्चस्व अथवा दबदबा है। हिंदी अभी ‘ज़रूरत’ की भाषा नहीं बन पाई है। आज हमें इसका जवाब ढूंढना होगा कि क्या कारण है अब तक उच्च अध्ययन खास तौर पर विज्ञान और तकनीकी, चिकित्साशास्त्र आदि के अध्ययन के लिए हम स्तरीय पुस्तकें तैयार नहीं कर सके हैं। मैं यह रेखांकित करना चाहता हूं कि मेरी बातों से कदापि यह निष्कर्ष न निकाला जाए कि हिंदी के सुंदर भविष्य के बारे में मुझ में कोई निराशा है। नहीं ऐसी बात नहीं है। उसका भविष्य उज्जवल है। वह धीरे-धीरे अखिल भारतीय स्वरूप ले रही है। मगर इसके लिए हम हिंदी प्रेमियों को अभी बहुत काम करना है। एकजुट होकर युद्ध स्तर पर राष्ट्रभाषा हिंदी की अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करना है। यहां पर मैं जो रदेकर कहना चाहूंगा कि हिंदी की अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करना है।

यहां पर मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि हिंदी प्रचार-प्रसार या उसे अखिल भारतीय स्वरूप देने का काम केवल हिंदी के विद्वानों, लेखकों, कवियों या अध्यापकों की जमात तैयार करना नहीं है। जो हिंदी से सीधे-सीधे आजीविका या अन्य तरीकों से जुड़े हुए हैं, वे तो हिंदी के अनुयायी हैं ही। यह उनका कर्म है, उनका नैतिक कर्तव्य है कि वे हिंदी का पक्ष लें। मैं बात कर रहा हूं ऐसे हिंदी वातावरण को तैयार करने की जिसमें भारत देश के किसी भी भाषा-क्षेत्र का किसान, मजदूर, रेल में सफर करने वाला हर यात्री, अलग-अलग काम-धंधों से जुड़े आम-जन हिंदी समझने और बोलने का प्रयास करे। टूटी-फूटी हिंदी ही बोले—मगर बोले तो सही। यहां पर मैं दूरदर्शन और सिनेमा के योगदान का उल्लेख करना चाहूंगा जिसने हिंदी को पूरे देश में लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कुछ वर्ष पूर्व जब दूरदर्शन पर ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ सीरियल प्रसारित हुए तो समाचार पत्रों के माध्यम से सुनने को मिला कि दक्षिण भारत के कतिपय अहिंदी भाषी अंचलों में रहने वाले लोगों ने इन दो सीरियलों को बड़े चाव से देखा क्योंकि भारतीय संस्कृति के इन दो अद्भुत महाकाव्यों को देखना उनकी भावनागत जरूरत बन गई थी और इस तरह अनजाने में ही हिंदी सीखने का उपक्रम भी किया। हम ऐसा ही एक सहज सुंदर और सौमनस्यपूर्ण माहौल बनाना चाहते हैं जिसमें हिंदी एक ज़रूरत बने और उसे जन-जन की वाणी बनने का गौरव प्राप्त हो।

DR.S.K.RAINA
(डॉ. शिबन कृष्ण रैणा)
2/537 Aravali Vihar(Alwar)
Rajasthan 301001
whatsapp No. +918209074186

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