अविभावक महत्वाकांक्षाओं के लबादों की लदान को लाद कर ज़िन्दगी के सफर में अकेला नहीं छोड़े ……..
दीप बाती में साहस की ऊर्जा का संचार करो, अभय संयुक्त और तनाव रहितता से जीवन में उजास भरो’ यह पंक्तियाँ किसी कविता की सर्जनात्मक के लिए नहीं हैं अपितु वर्तमान दौर के उन भयावह दुःस्मरणीय घटनाक्रमों के लिए है जिन्होंने जीवन को क्षणिक बना दिया है। अनेकानेक जीवों के खोल रूपी पड़ाव से यात्रा करती हुई जब जीवात्मा एक बौद्धिक परिवेश में जन्म लेती है तब वह अपने कर्मों को उस साँचे में ढालने का प्रयन करती हैं जिन्हें नियति ने उन्हें क्रियान्वित कर अपने जीवन को सँवारने के लिए प्रेषित किया है।
कलियुग में प्राणी अपनी लिप्सा के लिए अपने ही अंश की बलि चढ़ाने में कोई कोताही नहीं बरतता या कहें कि इस दुस्साहसिक कृत्य के लिए अपने भीतर इतनी अमानुषिक ऊर्जा का भंडार निर्मित कर लेता है कि उसके आगे उसे जीवन का कोई मूल्य ही समझ नहीं आता। यह स्थितियाँ तब और भीषण बन जातीं हैं जब विषमताओं के अनेक मोड़ उस तथाकथित निरीह बालक की राह में मुँह बाए खड़े हो जाते हैं। जिन्दगी दूभर हो जाती है और उस तमस्त्र के भीतर एकाकीपन की चुभन उसे ज़िन्दगी के उजास से दूर और दूर ले जाती है।
यह अवस्था एक नहीं अनेकानेक उन छात्रों की कहानी बयान करती है जो अपने अभिभावकों के सपनों की उड़ानों को आकार देने के लिए अपने सपनों को छोड़कर एक ऐसे बंधन से संयुक्त जीवन में प्रवेश करते हैं जहाँ प्राकृतिक तो कुछ होता ही नहीं होती है तो सिर्फ अनुशासित मशीनी ज़िन्दगी। यह जीवन बुरा नहीं है किन्तु इसमें प्रवेश करने से पूर्व उस बालक को ठीक उस तरह नर्चर करने की आवश्यकता होती है जैसे किसी पौधे को नर्सरी में तैयार किया जाता है। उसे कोचिंग के वातावरण में ढालने के लिए मानसिक तौर पर तैयार किया जाना उन समस्याओं के समाधान के मूल में होता है जो आत्महत्या के जहरीले, दमघोंटू धुएँ का निर्माण कर रही होती हैं। दुष्कर या दुर्लभ तो इंसान के लिए कुछ होता नहीं यदि वह ठान ले अर्थात दृढ़ निश्चय कर ले तो पत्थर को भी पानी पर तैरा सकता है। तब फिर शिक्षा के लक्ष्यों को संभावित करना असम्भव नहीं हो सकता।
इन सबके लिए मजबूत इच्छाशक्ति और दृढ़ निश्चय का होना जरूरी है और यह तभी संभव है जब बच्चे को अपने लक्ष्य स्वयं निर्धारित करने का अवसर दिया जाए न कि उस पर अपनी महत्वाकांक्षाओं के लबादों की लदान को लाद कर ज़िन्दगी के सफर में अकेला छोड़ दिया जाए। सुअवसर की पहचान कराना और उन्हें पाने की तकनीक बताना बच्चों को सही राह पर ले जाने का प्रथम प्रयास होता है।
इनमें मुख्य भूमिका अभिभावकों और संरक्षकों की होती है। ऐसा बालक सरलता से लक्ष्य हासिल कर लेता है और यदि किसी कारण वश नहीं प्राप्त कर पाया तो जिंदगी की डोर को मजबूती से थामे रहता है, टूटने नहीं देता। इन घटनाओं को अंजाम देने के प्रति उत्तरदायी दूसरा कारण धन कमाने की लिप्सा में लगे वह शैक्षणिक संस्थान हैं जो कोचिंग के नाम पर न केवल छात्रों के शरीर अपितु उनकी आत्मा पर भी जोंक (रक्त चूषण जीव) की तरह चिपक जाते हैं जो अपने समयबद्ध और जटिल पाठ्यक्रमों के भार को बिना यह जाँचे कि यह सभी की जीवनशैली के अनुरूप है या नहीं लाद देते हैं और उसके सामर्थ्य की आजमाइश में उसे मानसिक तौर पर आत्महत्या जैसे कृत्यों के दलदल में धकेल देते हैं। इन्हें बच्चों को सोना उगलने वाली मशीन नहीं समझ कर जीते-जागते है। इंसान के रूप में ही जानना चाहिए। बच्चे के राष्ट्र की सम्पत्ति हैं, वह राष्ट्र का भविष्य हैं उन्हें जिस भी क्षेत्र के लिए तैयार किया जाए तो उन्हें प्रशिक्षण के साथ मानसिक और आत्मिक सम्बल भी दिया जाना आवश्यक है।
इतना ही नहीं उनकी व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं को भी समय-समय पर जानकारी में लेते हुए उनका तात्कालिक समाधान दिया जाना भी इस दुष्प्रवृत्ति को रोकने का कारगर उपाय हो सकता है। कोचिंग छात्रों में आत्महत्या की अमानुषिक प्रवृत्ति को रोकने का तीसरा समाधान पर। उनकी असामाजिक तत्वों से ठीक उसी प्रकार हिफाजत करना है जैसे बहुमूल्य मणियों को चोर-लुटेरों से सुरक्षित किया जाता है। इसके लिए प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। प्रशासनिक तौर पर यदि चाक-चौबंद व्यवस्था है और शिकायत प्राप्त होने पर शीघ्र कार्रवाई की प्रवृत्ति है तो छात्र अपने को सुरक्षित और संरक्षित अनुभव करता है और उसमें भय नहीं व्याप्तता।
भय के कुहासा से मुक्त छात्रों का जीवन उन्हें एकाग्रता देता है और राह तथा लक्ष्य से भटकने से रोके रखता है। इनके अतिरिक्त भी कहीं मानसिक अशांति छात्र के मन में घर कर गई है तो उसके निराकरण के लिए मनोचिकित्सकों की व्यवस्था अनिवार्य है। यह व्यवस्था प्रायोगिक होनी चाहिए सैद्धांतिक नहीं। समय रहते निदान देना और इसके लिए किसी प्रकार का अतिरिक्त भार छात्र के ऊपर नहीं डालना यह कोचिंग संस्थानों का प्रमुख दायित्व होना चाहिए।
छात्रों को अभिभावकों एवं कोचिंग संस्थानों के शिक्षकों द्वारा इस अहसास को थोपना कि ‘हम तुम्हें थाली में परोस कर सब दे रहे हैं’, उनमें हीन भावना को जन्म देने का कारण बनता है। यही भाव जब बढ़ने लगता है तो ग्रन्थि का जन्म लेकर नासूर बनाने का काम करता है यही नासूर उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाता है। अतः कोमल मन वाले इन छात्र रूपी पौधों को उचित सार-सँभाल और सद्भावों और सुविचारों का पोषण दिया जाए तो अपनी इहलीला समाप्त करने का विचार इनके मस्तिष्क से दूर से दूर रखा जा सकता।
छात्रों से कहती हैं कि खुले नयन से सपने देखो, देखो जीवन की खुशहाली, स्वस्थ और दृढ़ मानस से सुलझाओ विषमताओं की जाली, मानव जीवन अति दुर्लभ है, खुशियों का संधान करो, उन्नत, उत्तम लघु प्रयल से हर पल, नितप्रति इसको आबाद करो। माना कठिन डगर है जीवन लेकिन निराश न होना तुम, संकल्पों की दृढ़ता थामें भवसागर पार उतरना तुम।
डॉ. गीता सक्सेना,
आचार्य, हिन्दी, माधव विश्वविद्यालय,
आबू रोड सिरोही

