मुंबई के सुधी जनों की चौपाल एक ऐसा मंच है जहाँ हर महीने, कला, साहित्य, संस्कृति, थिएटर, पुस्तक, लेखक, कलाकार, साहित्यकार, संगीतकार से लेकर संस्कृति से जुड़े किसी न किसी व्यक्ति की उपस्थिति या उसके संस्मरणों की महक उपस्थित श्रोताओं पर जादुई रसवर्षा कर देती है। इस बार चौपाल में गीतकार आनंद बक्षी के बेटे राकेश बक्षी द्वारा लिखित पुस्तक ‘नगमें, किस्से, बातें, यादें’, से आनंद बक्षी के जीवन और उनकी गीत लेखन यात्रा पर संवाद किसी फिल्म के जादू की तरह श्रोताओं को रोमिंचत कर गया। बातचीत का सिलसिला प्रारंभ किया निर्माता निर्देशक व लेखक रवि यादव ने और राकेश बक्षी भी अपने खट्टे, मीठे, चुटीले संस्मरणों का ऐसा पिटारा खोला कि श्रोताओं ने गीतकार आनंद बक्षी के साथ एक पिता, एक अध्यात्मिक गुरू और समाज व रचनाधर्मिता के प्रति एक ऐसे आनंद बक्षी के विराट व्यक्तित्व का एहसास किया जो उनके कालजयी गीतों को सुनकर आ उनके बारे में पढ़कर कभी पता नहीं चलता।
आनंद बख्शी ने अपने 40 साल के करियर में 300 से ज़्यादा फ़िल्मों के लिए 6,000 से ज़्यादा गीत लिखे हैं. वह एक बेहद प्रतिभाशाली गीतकार थे जिन्होंने आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और शंकर-जयकिशन जैसे कई संगीतकारों के साथ काम किया।
फिल्मी दुनिया में एक सफल गीतकार के रूप में स्थापित आनंद बक्षी जैसे गीतकार के बेटे के रूप में, एक बेटे को किस तरह के बचपन और युवावस्था से गुजरना पड़ता है, उसे राकेश बक्षी ने जिस गहनता और आत्मबोध के साथ समझाया, उससे ऐसा लगा कि कोई व्यक्ति समाज में कितना बड़ा स्थान हासिल कर ले वह अपने बच्चों की परवरिश एक आम आदमी की तरह ही करना चाहता है। आनंद बक्षी ने फिल्म उद्योग के सफलतम गीतकार होने के बावजूद अपने परिवार को एक मध्यमवर्गीय संस्कार में पाला पोसा।
बातचीत के सूत्रधार रवि यादव ने जिस कुशलता के साथ राकेश बक्षी की पुस्तक नग्में, किस्से, बातें, यादें के पन्नों को परत -दर-परत खोलते हुए उनसे अपने स्वर्गीय पिता के व्यक्तित्व, रचनाधर्मिता व उनकी जीवनशैली को लेकर सवाल किए और जिस सहजता से राकेश बक्षी ने जवाब दिए उससे पूरा संवाद किसी फिल्म की तरह दर्शकों की स्मृति को गुदगुदाता रहा।
राकेश बक्षी ने बताया कि एक सख्त पिता का अनुशासन, रचनाधर्मिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी और परिवार चलाने की मजबूरियों के साथ उन्होंने अपने पिता के व्यक्तित्व में कई आयाम देखे।
राकेश बक्षी ने बताया कि पिताजी किसी गीत के अच्छा होने का श्रेय हमेशा फिल्मी की कहानी, उसके निर्देशक और उस फिल्म की पूरी टीम को देते थे, वे हमेशा कहते थे कि ये लोग अपनी सोच और कलाका जितना श्रेष्ठतम विचार लेकर मेरे पास आते हैं, उसी भाव के अनुसार मैं कोई गीत लिख पाता हूँ। इसीलिए मैने कुछ फिल्मों के लिए साधारण, कुछ के लिए असाधारण और कुछ के लिए कालजयी गीत लिखे, ऐसे गीत मेरे अकेले की नहीं सभी की सामूहिक सोच का परिणाम होते हैं।
राकेश बक्षी ने कहा कि मेरे पिता ने मुझे पहला सबक ये दिया कि जिंदगी में जो भी कुछ करना हो, उसके लिए आत्मनिर्भर बनो, दूसरों के या माता-पिता के पैसों से अपने शौक पूरे मत करो। माता-पिता का काम आपको योग्य बनाना है, आपके शौक पूरे करना नहीं।
यह एक ऐसा आत्मीय संवाद था जिसमें प्रश्नकर्ता रवि यादव और जवाब दे रहे राकेश बक्षी के साथ एक-एक श्रोता अपने आपको रोमांचित, कृतज्ञ और सौभाग्यशाली महसूस कर रहा था।
एक कालजयी गीतकार के गीत ही नहीं उसका पूरा जीवन, उसकी रचनाधर्मिता आने वाली पीढ़ियों के लिए सबक और प्रेरणा कैसे बन सकती है, ये श्रोताओं ने इस पुस्तक पर हुई चर्चा के माध्यम से गहराई से अनुभव किया।
एक गीतकार किस तरह अपने समाज की सच्चाई, मन के द्वंद और युवा दिलों के रोमांस को अपने शब्दों के माध्यम से अपने गीतों में उड़ेल देता है, आनंद बक्षी उसके अद्वितीय उदाहरण थे।
कार्यक्रम के पूर्व श्री रवि पिक्चर्स द्वारा आनंद बक्षी पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री फिल्म का भी प्रदर्शन किया गया।
चौपाल में संगीतकार कुलदीप सिंह जी, अभिनेता राजेन्द्र गुप्ता, विष्णु शर्मा, मध्यप्रदेश से मुंबई आए पुलिस अधिकारी व कवि मदन मोहन समर, मोहम्मद रफी के परिवार से उनकी पुत्रवधू फिरदौस शाहिद जैसे जाने माने लोगों की उपस्थिति विशेष आकर्षण रही। इस आयोजन को सफल व यादगार बनाने अशोक बिंदल हर बार की तरह इस बार भी परदे के पीछे पूरे मन से लगे रहे।

