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गोवर्ध्दन पूजा पशुधन, पर्यावरण, संस्कृति और समाज को बचाने का संदेश देती है

मुझे गोवर्द्धन पूजा का यह नाम बड़ा अच्छा लगता है। इसमें श्लेष अलंकार है। पर्वत की भी बात है और गौओं की भी। भारतीय प्रज्ञा पर्वत और गायों को एक दूसरे के विरोध में नहीं देखती, उनकी सहचारिता में देखती है। गो-वर्धन गायों का भी वर्धन है। भागवत में कृष्ण कहते हैं: ‘वार्ता चतु‌र्विधा तत्र वयं गोवृत्तयो’ कि आजीविका चार तरह की हैं:- कृषि, वाणिज्य, ब्याज और गोवृत्त। हमारी आजीविका गोवृत्त है- गाय के इर्द गिर्द घूमती है। कृष्ण कहते हैं कि हम तो ‘वनशैल निवासिनः’ हैं- वन और पर्वत ही हमारे घर हैं। फिर क्या होता है: गोधनानि पुरस्कृत्य गिरिं चक्रः प्रदक्षिणम् – गौओं को आगे करके गिरिराज की प्रदक्षिणा की जाती है।

गोवर्धन पर्वत भी भारत के उसी पवित्र भूगोल का हिस्सा है जिसमें गोचारण होता था। यह sacred geography हमारी संस्कृति की विशेषता है जिसमें नदियाँ पर्वत सब एक दिव्यत्व की आभा से जगमगाते हैं। एक पर्वत के रूप में गोवर्धन को गिरिराज कहा गया और हमारी संस्कृति हमें कभी गोवर्धन की तो कभी कामदगिरि की परिक्रमा सिखाती है। पर्वत हमारा पोषण करते हैं, इसीलिए गोवर्धन पूजा को अन्नकूट भी कहते हैं।

गोवर्धन पूजा की भागवत में आई कथा सिर्फ कृष्ण की चामत्कारिक शक्ति की कथा नहीं है। उस एलीगरी है जिसे आध्यात्मिक, नैतिक, पर्यावरणीय और आस्तिविक मनीषा की कितनी ही लेयर्स ने मिलकर बुना है। ईश्वर की एक उंगली अकेले ब्रज के लिए क्या, सारी दुनिया को बचाने के लिए पर्याप्त है। जब तक ईशानुकंपा का छत्र है, जीवन के सारे तूफानों और आपदाओं के विरुद्ध आपको एक शरण्य है। गोवर्धन उसी शरण्य का प्रतीक है, तब आप के अस्तित्व का भार, आपका योगक्षेम ईश्वर ही वहन करेगा। कृष्ण का यही अभिवचन है, हमारे कर्म- पर्वत को वही उठायेंगे।

यह प्रसंग यह भी संदेश देता है कि वर्षा आकाशीय कृपा से नहीं, अपनी पृथ्वी के पेड़-पर्वतों और पर्यावरण का सत्कार करने से होती है। आज जब हम देखते हैं कि हमारे पर्वतों का क्षरण हो रहा है, स्वयं गोवर्धन का क्षरण हो रहा है, लैंड स्लाइड्स हो रहे हैं, पर्वतों के पेड़ काट काट कर हमने उन्हें नंगा कर दिया है, क्लाउड बर्स्ट हो रहे हैं, तब हमें गोवर्धन पूजा के माध्यम से रेखांकित किये जा रहे संदेश की गंभीरता को समझना चाहिए। पर्वत पृथ्वी का गौरव हैं, वे सिर्फ geographical temenity नहीं हैं, वे पृथ्वी का स्वप्न हैं, पृथ्वी की महत्त्वाकांक्षा हैं।

राजेश जोशी जी की एक कविता है:
स्वप्न अगर आसमान में थे/ तो पहाड़ों के सबसे करीब थे / स्वप्न अगर लुककर बैठ गये थे / तो हमें विश्वास था/ वे पहाड़ों में कहीं छुपे होंगे/ हम स्वप्नों की खोज में गये थे/ पहाड़ों की ओर/ और हम जानते थे/ पहाड़ दोगले नहीं हुए हैं/ वे हमारी हिफाजत करते रहेंगे।

तो गोवर्धन ने ब्रजवासियों की रक्षा की थी। यह एक ग्रीन रिलेशनशिप है, हरित रिश्तेदारी। धर्मो रक्षति रक्षितः की तरह। आप पर्वतों की रक्षा करें, पर्वत आपकी करेंगे। कृष्ण ने इंद्र की पूजा की जगह गोवर्धन की पूजा की बात की – रिचुअलिज़्म की जगह नेचुरलिज़्म की। इंद्र अमूर्त हैं, intangible हैं, पर्वत प्रत्यक्ष हैं, पड़ोसी हैं।

विलियम ब्लेक की एक कविता थी:
Great things are done when men and mountains meet
This is not done by jostling in the street.

यह प्रसंग प्रकृति के साथ हार्मनी का प्रसंग है। यहां environmental stewardship को एक sacred duty माना गया। यह प्रसंग बताता है कि यूनिटी इन कम्युनिटी क्या होती है और कृष्ण की शरण्य से कैसे एक कलेक्टिव बांड पैदा होता है, तब जात-प्रतिष्ठा सब के भेद छोड़कर एक ईश्वर की छत्रछाया में सब जाते हैं। आज भारत की सामाजिक एकता का जो फ्रेग्मेंटेशन करने की कोशिश हो रही है, तब हमें कृष्ण की उस एक उँगली की शक्ति पर भरोसा करना है।

इस प्रसंग में कृष्ण भी हैं तो बाल गोपाल है, इसकी अबोधता ही, इसकी मासूमियत, इसकी निर्दोषता इन्द्र की cosmic forces पर भी भारी पड़ती है। बाल कृष्ण खेल खेल में गोवर्धन उठा लेते हैं, इसे ही जैसे बाल सीता ने खेल खेल में शिवजी का धनुष उठा लिया था। मतलब यह कि approach God as play, not puzzle.

अनिल कपूर की एक फिल्म भाई थी वे सात दिन। पर ब्रज के इन सात दिनों पर कोई फिल्म नहीं बनी है। कृष्ण लीला का यही तो आनंद है। एक उँगली minimal effort का प्रतीक है पर वह पहाड़ का भी बोझ उठा लेती है। जो असंभव था, ब्रजवासियों का प्यार और विश्वास उसे संभव बना देता है, उसे ईशकृपा संभव बना देती है, प्यार का प्रतिदान संभव बना देता है।

मैं गौ पूजक और कुकुर पूजक संस्कृति में लॉक और रूसो की सैद्धान्तिकी का द्वंद्व देखता हूँ। कुकुर पूजक संस्कृति में हर व्यक्ति के बारे में प्रारंभिक उपकल्पना एक चोर की, एक संदिग्ध व्यक्ति की है। कि वह inherently selfish, violent, competitive, nasty, brutish है जब तक कि अन्यथा नहीं प्रमाणित कर दिया जाता। प्रवेश करते ही कुत्ता सूँघ सूँघ कर बताता है कि आप निरापद हो। गौपूजक संस्कृति में अतिथि देवता है तो आप उसका स्वागत दूध और उससे बने द्रव्य या मिठाई से करते हो। यह रूसो की तरह है जो मनुष्य को inherently good, free, and compassionate मानता था।

आज का दिन गौपूजा का है।

(लेखक मप्र के चुनाव आयुक्त हैं और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं। वे धार्मिक विषयों पर वैज्ञानिक विवेचन के साथ कई पुस्तकें लिख चुके हैं)
 
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