ब्राह्मणों ने न केवल अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह/ संग्राम का बार बार नेत्तृत्व किया था बल्कि उनका अंग्रेजों से विरोध इस हद तक था कि यदि वे डिप्टी कमिश्नर/ कलेक्टर भी हों तो भी रसोई के लिए पुरोहित के रूप में ब्राह्मण अपनी सेवाएँ देने राज़ी न हुए।
दरिद्र से दरिद्र ब्राह्मण ने भी देश को गुलाम बनाने वालों को खाना खिलाने से स्पष्ट इन्कार कर दिया।
ब्राह्मणों के इस भीतरी विरोध पर ध्यान दिया ही नहीं गया है। बल्कि इसे यों प्रस्तुत किया गया कि उच्च जाति के हिंदू (ब्राह्मण, क्षत्रिय) गोमांस, सुअर का मांस, या शराब को छूने की उन वर्जनाओं के कारण यूरोपियनों के लिए खाना बनाने से बचते थे, जो ब्रिटिश आहार में आम थीं। यह कार्य “अपवित्र” और निम्न-स्थिति का माना जाता था। इसलिए, रसोइए आमतौर पर शूद्र (श्रमिक) या “अछूत” (दलित/परिया) समुदायों से, या गैर-हिंदू जैसे गोवा के कैथोलिक या मुस्लिम होते थे। शूद्र, हिंदू समाज में चौथा वर्ण, सेवा व्यवसायों से जुड़े थे और औपनिवेशिक भारत में घरेलू श्रम का मुख्य स्रोत थे।
मेमसाहिब्स एंड देयर सर्वेंट्स इन नाइनटीन्थ-सेंचुरी इंडिया (1994) पढ़िये तो पता चलेगा कि निम्न जाति के हिंदू” या “अछूत” रसोई के लिए पसंद किए जाते थे ताकि मिश्रित मांस और शराब को समायोजित किया जा सके। कास्ट, फूड एंड कोलोनियलिज्म (2024) में बताया गया है कि मद्रास प्रेसीडेंसी (तुलनीय प्रशासकीय क्षेत्र) में, परिया (अछूत) रसोइए “अंग्रेजी, फ्रांसीसी और इतालवी पुडिंग” बनाने की अपनी क्षमता का विज्ञापन करते थे। हू इज (नॉट) अ सर्वेंट, एनीवे? (2020) में यह बताया गया है कि ये रसोईये दो तीन तरह के और भी काम कर लेते थे।
अंग्रेजी शासन काल में एक हजार से ज्यादा डिप्टी कमिश्नर/ कलेक्टर हुए। सबने कथित शूद्र रसोइये रखे। ये अधिकारी, अक्सर 20–30 वर्ष की आयु के युवा आईसीएस अधिकारी, एकांत बंगलों में रहते थे और स्थानीय भारतीय घरेलू कर्मचारियों पर बहुत अधिक निर्भर रहते थे, जिसमें खाना पकाने जैसे कार्य भी शामिल थे, क्योंकि उष्णकटिबंधीय जलवायु और स्थानीय भोजन तैयार करने की अपरिचितता थी। कहा यह गया कि cultural friction से British comfort न प्रभावित हो जाये, इसलिए यह हुआ और यह सिर्फ कलेक्टर स्तर की बात न थी, हर ब्रिटिश अधिकारी का यही तौर तरीका था। After Five Years in India पुस्तक में Anne C. Wilson (1895) ने एक ब्रिटिश अधिकारी के घर के हाल बताए हैं। उससे भी इसकी पुष्टि होती है।
भारत में ब्रिटिश घरों, जिसमें डीसी के घर शामिल थे, में औसतन 10–20 नौकर काम करते थे, जो सस्ते श्रम और औपनिवेशिक जीवनशैली के “प्रतिष्ठा” पर जोर के कारण संभव था। रसोइए (बावर्ची या खानसामा) आवश्यक थे, क्योंकि ब्रिटिश अधिकारी करी जैसे भारतीय भोजन के साथ-साथ यूरोपीय शैली के व्यंजनों (जैसे रोस्ट, पुडिंग) को पसंद करते थे। मेमसाहिबों के गाइड (उदाहरण के लिए, फ्लोरा एनी स्टील की The Complete Indian Housekeeper and Cook (1888)) और संस्मरणों में रसोइए पुरुष गैर ब्राह्मण भारतीय थे। वे इस पुस्तक में इस बात पर दुख जताती हैं कि जातीय प्रतिबंधों (caste restrictions) ने servant versatility को सीमित कर दिया। अंग्रेजों ने इस आधार पर यह अवधारणा भी बनाई कि भारत के लोग lazy होते हैं और काम करने से मना करने के बहाने बनाते हैं।
Servants’ Pasts: Late-Eighteenth to Twentieth-Century South Asia (2019) में नितिन शर्मा और नितिन वर्मा भी अंग्रेजों के इस दृष्टिकोण से सहानुभूति रखते प्रतीत होते हैं :
“The Europeans in India incessantly complained of being forced to hire innumerable servants because of the alleged caste taboos that defined work. Tied to this was the idea that servants were characteristically lazy, who often gave the excuse of caste prohibitions in order not to perform certain tasks. In this orientalising mix of caste and essentialised native character, where does the possibility of recovering agency on the part of servants lie?” (pp. 34–35).
उत्सा रॉय अपनी किताब Culture of Food in Colonial Bengal (2009) में भी इसका उल्लेख करती हैं कि ब्राह्मण कैसे इस कार्य को करने से इन्कार करते रहे। पंचकारी बंदोपाध्याय और महेंद्रनाथ दत्ता के विवरण भी यही बताते हैं कि “Brahmins never took up cooking at other people’s houses… [it was seen as] disrespectful.” तनिका सरकार Caste–ing Servants in Colonial Calcutta नामक अपने लेख में 19वीं सदी की सैनिटेशन रिपोर्ट्स का हवाला देकर इस तरह के caste avoidance की पुष्टि करती हैं।
ब्राह्मणों की इस अवज्ञा ने caste reinforcement में क्या भूमिका निभाई होगी? क्या अंग्रेज अधिकारी ब्राह्मणों के द्वारा किये जा रहे इस रिजेक्शन के वास्तविक अर्थ नहीं समझ रहे होंगे? क्या वे इससे अपमानित नहीं महसूस करते होंगे? क्या ब्राह्मणों को उन्होंने इसका सबक न सिखाना चाहा होगा? और इसलिए ब्राह्मिनिज्म के विरोध में उन्होंने अपना मानस दृढ़तर बना लिया?
क्या अस्पृश्यता के सवाल को कभी सामाजिक दमन की जगह शुद्धता और पवित्रता के इस आग्रह से कभी देखा गया? कि ब्राह्मण प्रभुता के निरंकुशत्व से सम्पन्न अंग्रेजों के साथ छुआछूत बरत रहे थे। और इसलिए ब्राह्मण इसकी कीमत चुकाते रहे और अंग्रेजों से ब्राह्मणों से अपनी घृणा का स्थानांतरण भारतीय समाज के दूसरे वर्गों में करने के लिए वे नैरेटिव्स बोने शुरू कर दिये जिसकी फसल आज भी काटी जा रही है।


