साहित्य को पाठकों का टोटा आजादी के बाद भी था और आज भी है। साहित्यकार हैं, साहित्य भी है पर पाठक कहां हैं? चिंता जाहिर हैं, जन – जन तक साहित्य कैसे पहुंचे? साहित्य और पाठक के इस अंतर्संबंध को शिद्दत से रेखांकित किया वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने। अवसर था 2 नवंबर 25 को दिल्ली के पब्लिक पुस्तकालय में युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच न्यास के 12 वें अखिल भारतीय साहित्य समारोह का आयोजन। मुझे भी बतौर पुरस्कार प्राप्तकर्ता सम्मिलित होने का मौका मिला।
समारोह में विभिन्न साहित्यिक विषयों पर परिचर्चा में विशिष्ठ अतिथि पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के विचार सुने। उन्होंने “समाचार पत्रों से विलुप्त होता साहित्य” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। पत्रकार होने के नाते उनकी साहित्य, समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले साहित्य और पाठक को लेकर अनुभवजनित विचार मेरे मन को भी छू गए।
साहित्य को पाठक नहीं, की चिंता को उनके साथ – साथ मैंने भी महसूस किया और साहित्यिक पत्रकारिता के अंतर्गत पिछले दो वर्ष से कोटा में नई बढ़ती पौध बच्चों में साहित्य की समझ पैदा कर उनमें साहित्य अनुराग जीवित करने का अभियान चला रखा है। उद्देश्य यही है साहित्यकार भी बने और पाठक भी। इसमें कोटा के साथ हाड़ोती अंचल के कुछ साहित्यकार आगे आए हैं और मेरे साथ कंधे से कंधा मिला कर इस मुहिम में सक्रिय हैं।
जब मैं उनके विचार सुन रहा था मुझे वे अपने ही मन की बात नजर आ रही थी। मेरे मन की बात कह रहे थे अरविंद भाई। वे कह रहे थे आज़ादी के समय 1949 में जब करीब आठ हज़ार पत्र और पत्रिकाएं थी तब उनमें साहित्य का प्रकाशन भरपूर होता था। उस समय की पत्रकारिता की खूबी थी कि उस समय के समाचार पत्रों ने कई बड़े लेखकों को जन्म दिया। ज्यादातर साहित्यकार ही समाचार पत्र-पत्रिकाओं के संपादक हुआ करते थे। उन्होंने बताया अज्ञेय से लेकर रघुवीर सहाय तक जैसे अनेक मूर्धन्य साहित्यकारों ने अखबारों में साहित्य का भरपूर प्रकाशन किया। हर समाचार पत्र में एक साहित्य संपादक हुआ करता था, लंबे समय तक यह परम्परा चलती रही और आज साहित्य संपादक की संस्था डगमगा गई है तथा कुछ ही समाचार पत्रों में दिखाई देती हैं। समाचार पत्र से साहित्य का बहुत कम प्रकाशन होना साहित्य संपादक की कड़ी का विलुप्त हो जाना भी है।
उनके इस तथ्य को मैने भी महसूस किया और देखा 70 और 80 के दशकों में एक पूरा पृष्ठ, कभी-कभी दो पृष्ठ साहित्य के नाम होते थे। लेखकों को भरपूर स्थान मिलता था। अच्छे समाचार पत्र कुछ प्रोत्साहन राशि प्रदान कर लेखक के इस अहसास को बल प्रदान करते थे कि मेरी रचना किसी अखबार में छपी है। आज साहित्य का स्थान समाचार पत्रों में या तो विलुप्त हो गया या फिर बहुत सीमित रह गया है। इस सीमित स्थान में भी बड़ी जगह खुद उनके संपादक अथवा विशिष्ठ साहित्यकार के लिए रहती है, साहित्यिक रचनाएं गिनती की होती हैं। धर्म, दर्शन, स्वास्थ्य, फिल्म आदि पर एक पूरा पृष्ठ रहता है परन्तु साहित्य पृष्ठ हाशिए पर आ गया है।
अनुभव बताता है स्वयं साहित्यकारों का भी पाठक के रूप में साहित्य से संबंध निरंतर कम हो रहा है। पठन वृति कम हो रही है, लिखने, छपने, किसी समारोह में अतिथि बनने, सम्मानित होने पर ही जोर दिखाई देता है। जिस कृति को वे स्वयं लोकार्पित कर साथ ले आते हैं, अपवाद को छोड़ कर उसे भी देखते तक नहीं और वह अलमारी की शोभा बन जाती है।
इसी भाव को रेखांकित करते हुए अरविंद ने कहा दिल्ली के पुस्तक मेले में लोग की भीड़ तो बहुत जुटती है परन्तु लौटते समय उनके थैले में किताब के कैटेलॉग अधिक होते हैं। साहित्य के पाठक कम होना चिंता का विषय है और समस्या है की जन-जन तक साहित्य कैसे पहुंचे?
बच्चों को तो हम यह कह कर दोष मढ़ देते हैं कि वे हर समय मोबाइल से जुड़े रहते हैं, कविता, कहानी पढ़ते भी हैं तो इंटरनेट से, अब ऐसे साहित्यकारों को क्या कहें कि किस वजह से ये किताबें नहीं पढ़ते हैं, फिर आम जन से उम्मीद क्यों? बात रुचि की भी है, ऐसे – ऐसे लोग भी हैं जो साहित्यकार नहीं हो कर भी पुस्तकें पढ़ने का शौक रखते हैं। दिल्ली जाने से कुछ दिन की साहित्यकार डॉ. वैदेही गौतम जी के निवास पर जाना हुआ, वहां चर्चा के दौरान ज्ञात हुआ कि उनके पतिदेव संदीप जी जो एक व्यवसायिक हैं और पुस्तकें पढ़ने की जबरदस्त रुचि रखते हैं। कई क्षेत्रों में उनका ज्ञान उस क्षेत्र के ही व्यक्ति से कहीं ज्यादा और पुख्ता है।
प्रतिक्रियाओं को देखें तो साहित्यकार एवं पत्रकार रामकिशोर उपाध्याय इस पर कहते हैं लेखकों की इस शाश्वत चिंता के विकल्प खोजने होंगे। अरविन्द कुमार सिंह के स्वर में स्वर मिलाकर इस चिंता को रेखांकित किया गया है। कोटा के साहित्यकार डॉ. अतुल चतुर्वेदी का कहना है साहित्य और उसके पाठक दोनों कम हुए हैं। जितेंद्र निर्मोही का कहना है हर समारोह एक सीख देता है। झालावाड़ के कवि रूप जी रूप कहते है यदा कदा ऐसे विचार आँखें भी खोलते हैं। कोटा के कथाकार और समीक्षक विजय जोशी इस अभिव्यक्ति पर कहते है कि साहित्यिक सन्दर्भों का गहराई से विश्लेषण करती यह अभिव्यक्ति सप्रसंग सार्थक संवाद को उभारती है तथा साहित्य, साहित्यकार एवं पाठक के अन्तर्सम्बन्धों को विवेचित करती है।
यहां अब इस विमर्श को विराम देते हैं। समाचार पत्रों में साहित्य की कमजोर स्थिति और पाठकों की कमी के रहते हुए भी उम्मीद का दिया जलता रहेगा, नए विकल्प आयेंगे, राज्य सरकारें साहित्यकारों को और अधिक प्रोत्साहन देगी। सार्थक परिचर्चा के लिए मंच अध्यक्ष डॉ. रामकिशोर उपाध्याय जी को साधुवाद।
– डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार, कोटा

