आज बी.आर.चोपड़ा जी की पुण्यतिथि है। 5 नवंबर 2008 को बी.आर.चोपड़ा जी का देहांत हुआ था। बी.आर. चोपड़ा साहब के पिता चाहते थे कि ये पढ़-लिखकर कोई बड़े सरकारी अफसर बनें। वो खुद भी सरकारी अफसर थे। बीआर चोपड़ा पढ़ने-लिखने में बहुत अच्छे थे। और साथ ही साथ वो खेलकूद में भी खूब हिस्सा लेते थे। ये उन दिनों की बात है जब देश का विभाजन नहीं हुआ था। और बीआर चोपड़ा व इनका परिवार लाहौर में रहता था।
पिता की ख्वाहिश पूरी करने के इरादे से बीआर चोपड़ा ने आई.सी.एस (Indian Civil Service) की तैयारी करनी शुरू कर दी। लेकिन एग्ज़ाम से कुछ ही दिन पहले ये बीमार हो गए। नतीजा, ये उस परीक्षा में फेल हो गए। इनका दिल बहुत दुखा। हालांकि इनके पिता ने इन्हें लंदन जाकर आईसीएस की तैयारी करने का सुझाव दिया था। लेकिन इन्होंने मना कर दिया। ये कहकर कि अगर भगवान को मुझे आईसीएस अफसर ही बनाना होता तो वो यहीं बना देते। बीआर चोपड़ा तय कर चुके थे कि इन्हें अब सरकारी नौकरी करनी ही नहीं है।
एक अच्छी बात बीआर चोपड़ा जी के साथ ये रही कि जब ये बीए कर रहे थे तो इन्हें लिखने का शौक हो गया था। और चूंकि उस ज़माने में इनके आस-पास के लोग सिनेमा के बड़े फैन थे तो इन्हें भी सिनेमा में दिलचस्पी होने लगी थी। ये भी चाहते थे कि किसी दिन इन्हें भी अखबारों के लिए लिखने का मौका मिले। फिर एक दिन इन्होंने कलकत्ता के एक अखबार के लिए अंग्रेजी में एक आर्टिकल लिखा। उस अखबार का नाम था वैरायटीज़ (Varieties)। वो अखबार न्यू थिएटर्स नामक उस वक्त के कलकत्ता के एक बहुत बड़ी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी के सहयोग से निकलता था।
बीआर चोपड़ा के उस आर्टिकल का टाइटल था “Round the Indian Screen”। अपने उस आर्टिकल में बीआर चोपड़ा ने कुछ फिल्मों को क्रिटिसाइज़ करते हुए लिखा कि अब फिल्मों में स्टोरी कुछ भी नहीं है। बस गाने डाले जाते हैं। वो भी बहुत खास नहीं होते। इन्हें यकीन था कि इनका आर्टिकल ज़रूर छपेगा। लेकिन नहीं छपा। इन्होंने फिर से एक नया आर्टिकल लिखकर कलकत्ता भेजा। मगर वो भी अखबार वालों ने नहीं छापा। तब इन्होंने फैसला किया कि अब ये बस एक आर्टिकल और लिखकर कलकत्ता भेजेंगे। अगर वो भी नहीं छपा तो फिर नहीं लिखेंगे।
तीसरा आर्टिकल लिखकर इन्होंने कलकत्ता भेज दिया। और फिर कुछ दिन बाद ये अपने कॉलेज जा रहे थे कि इन्हें एक पार्सल मिला। वो पार्सल उस अखबार के एडिटर की तरफ से आया था। एडिटर ने उसमें लिखा था कि हमें आपके तीनों आर्टिकल्स मिले। और हमें बहुत अच्छे लगे। लेकिन दुर्गा पूजा की छुट्टियों की वजह से हम उन आर्टिकल्स को छाप नहीं सके हैं। लेकिन अब हमने एक ही अंक में तीनों आर्टिकल्स को छाप दिया है। एडिटर ने बीआर चोपड़ा को उस अखबार का लाहौर कॉन्ट्रीब्यूटर बनने का ऑफर भी दे दिया। जिसे इन्होंने स्वीकार भी कर लिया। और देश का विभाजन होने तक ये उस अखबार के लिए लिखते रहे।
विभाजन के बाद जब बीआर चोपड़ा अपने परिवार संग लुधियाना स्थित अपने पुश्तैनी मकान में आकर रहने लगे तो वहां इनकी मुलाकात इनके पिता के कुछ दोस्तों से हुई। उनमें से एक ने इनसे कहा, “बलदेव, क्यों ना हम मिलकर फिल्में बनाएं?” उनकी इस बात के जवाब में बीआर चोपड़ा जी ने कहा कि मैं तो फिल्में बनाना जानता ही नहीं हूं। मैं कैसे फिल्में बना पाऊंगा। तो इनके पिता के वो दोस्त बोले, “करना क्या है। हमें एक कहानी लेनी है। एक्टर्स लेने हैं। डायरेक्टर लेना है और फिल्म बनने में जो पैसा खर्च होगा वो लगाना है। यही तो सब करते हैं।”
आखिरकार बीआर चोपड़ा उनके साथ बॉम्बे आ गए। कुल मिलाकर ये पांच पार्टनर थे। पैसा उन्होंने लगाया था। बीआर चोपड़ा की ज़िम्मेदारी थी कि फिल्म अच्छी बन रही है या बुरी, इसकी खबर रखना। लेकिन मुंबई आने के बाद बीआर चोपड़ा का अपने उन पाचों पार्टनर्स से मतभेद हो गया। इस बात पर कि उन्हें किस तरह की फिल्म बनानी चाहिए। बीआर चोपड़ा चाहते थे कि कोई नई और हटकर कहानी वाली फिल्म बनानी चाहिए। लेकिन अन्य लोगों का मानना था कि वो फिल्म बनानी चाहिए जो आजकल चल रही हैं। चूंकि पैसा वो लोग लगा रहे थे तो बीआर चोपड़ा को चुप होना पड़ा।
फिर बीआर चोपड़ा के उन पार्टनर्स ने जो फिल्म बनाई थी उसका नाम था “करवट”। उस फिल्म में जीवन साहब और लीला मिश्रा जी ने काम किया था। और वो फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई। फिल्म फ्लॉप हुई तो इनके सभी पार्टनर्स लुधियाना वापस लौट गए। लेकिन बीआर चोपड़ा मुंबई में ही रहे। उन्होंने सोचा कि वो यहीं रहकर किसी अखबार में नौकरी कर लेंगे। इत्तेफाक से हिंदुस्तान टाइम्स के उस वक्त के एडिटर इन चीफ दुर्गादास इनके रिश्तेदार थे। उन्होंने बीआर चोपड़ा को आश्वासन दे दिया कि वो इन्हें नौकरी दिला देंगे। साथ ही जब उन्हें पता चला कि बीआर चोपड़ा फिल्ममेकर बनना चाहते हैं तो उन्होंने भी इन्हें इसके लिए काफी प्रोत्साहित किया।
इसके बाद तो बीआर चोपड़ा जी ने नौकरी के साथ-साथ फिल्म बनाने के अपने ख्वाब को पूरा करने के लिए भी हाथ पैर मारने शुरू कर दिए। वो बॉम्बे के एक ऐसे रेस्टोरेंट में जाकर बैठने लगे जहां संघर्षरत फिल्म कलाकार व लेखक आते थे। और इत्तेफाक से वहां इनकी कई लोगों से जान-पहचान भी हो गई। ये फिल्ममेकर बनने के ख्वाब तो देखते थे, लेकिन इन्हें पता ही नहीं था कि इन्हें करना क्या है — कहानी कहां से लेनी है, फाइनेंसर कैसे ढूंढना है।
एक दिन वो उस रेस्टोरेंट में बैठे हुए थे कि एक आदमी इनके पास आया। उस आदमी से इनकी जान-पहचान पहले ही हो चुकी थी। उस आदमी ने इनसे पूछा कि क्या तुम्हारे पास कोई स्टोरी है जिस पर तुम फिल्म बनाना चाहते हो। इन्होंने इन्कार कर दिया। तब वो आदमी इन्हें अपने साथ एक जगह ले गया और उसने इन्हें अपनी लिखी एक कहानी सुनाई। वो कहानी चोपड़ा साहब को बहुत पसंद आई। इन्होंने तय कर लिया कि ये इसी कहानी पर फिल्म बनाएंगे। और उस आदमी को फिल्म में क्रेडिट भी देंगे। वो आदमी था ज़बरदस्त एक्टर और राइटर रहे आई.एस. जौहर साहब। और वो फिल्म जिसकी कहानी उस दिन आई.एस. जौहर ने बीआर चोपड़ा को सुनाई थी, वो थी फिल्म “अफसाना” की कहानी। बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म की कहानी।
भले ही विकिपीडिया पर बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म “करवट” बताई जाती हो, लेकिन वो फिल्म इन्होंने डायरेक्ट नहीं की थी। वो फिल्म एक दूसरे डायरेक्टर प्रकाश ने बनाई थी। पर चूंकि बीआर चोपड़ा उस फिल्म के साथ जुड़े थे तो अक्सर लोग करवट को इनकी पहली फिल्म मान लेते हैं। जो कि सही नहीं है। खैर, आई.एस. जौहर की कहानी तो बीआर चोपड़ा साहब को बहुत पसंद आ गई। लेकिन अब चुनौती थी फिल्म बनाने के लिए किसी ऐसे आदमी को तलाश करना, जो पैसे लगा सके — यानी फाइनेंसर ढूंढना। अब चूंकि बीआर चोपड़ा को तो भेजा ही इस धरती पर फिल्मकार बनने के लिए, तो किस्मत से इनका फिल्म इंडस्ट्री में आने का रास्ता अपने आप बनता चला गया।
उसी रेस्टोरेंट में बीआर चोपड़ा साहब से एक दिन इनका एक पुराना जानकार मिला। उसका नाम था गोवर्धन दास अग्रवाल। बीआर चोपड़ा इन्हें लाहौर से ही पहचानते थे। विभाजन के बाद ये भी मुंबई आ गए थे और अब ये भी फिल्मों में पैसा लगाना चाहते थे। गोवर्धन दास अग्रवाल को जब पता चला कि बीआर चोपड़ा फिल्म बनाना चाहते हैं तो उन्होंने इनसे पूछा कि क्या तुम्हारे पास कोई स्टोरी है। चोपड़ा साहब ने उन्हें आई.एस. जौहर वाली स्टोरी के बारे में बताया। उन्होंने स्टोरी सुनाने को कहा तो चोपड़ा साहब ने उन्हें स्टोरी भी सुना दी। गोवर्धन दास अग्रवाल को भी वो स्टोरी बहुत पसंद आई। उन्होंने वादा किया कि वो इस फिल्म पर पैसा लगाएंगे।
ये सुनकर बीआर चोपड़ा जी बहुत खुश हुए। उन्होंने गोवर्धन दास अग्रवाल से कहा कि चलिए तो कास्ट और डायरेक्टर फाइनल करते हैं। तब गोवर्धन दास अग्रवाल ने कहा कि डायरेक्टर तो तुम ही होगे। तभी मैं पैसा लगाऊंगा। ये मेरी शर्त है। बीआर चोपड़ा बड़े हैरान हुए। क्योंकि वो तो जानते ही नहीं थे कि फिल्म कैसे बनाई जाती है। उन्होंने गोवर्धन दास अग्रवाल को बताया भी कि मैं नहीं जानता फिल्म कैसे डायरेक्ट की जाती है। लेकिन वो अपनी ज़िद पर अड़े रहे। उन्होंने बीआर चोपड़ा साहब से कह दिया कि या तो तुम खुद इस फिल्म को डायरेक्ट करो, या फिर हम इस फिल्म को भूल जाते हैं।
अब बीआर चोपड़ा के पास कोई चारा ना था। उन्होंने तय किया कि वो जानकारी जुटाएंगे और खुद फिल्म डायरेक्ट करेंगे। फिल्म की कास्टिंग शुरू हुई और अशोक कुमार, वीना, जीवन, कुलदीप कौर, प्राण और कुक्कू मोरे जी को फाइनल किया गया। बात जब डायरेक्शन की आई तो बीआर चोपड़ा ने तय किया कि वो किसी कैमरामैन को लेंगे और उसे अपनी ज़रूरत के हिसाब से शॉट बता देंगे। और इस तरह फिल्म कंप्लीट कर ली जाएगी। किसी ने बीआर चोपड़ा से कहा कि कोई अच्छा कैमरामैन हायर कर लो ताकि फिल्म अच्छी बन जाए। लेकिन उन्होंने उस आईडिया को रिजेक्ट कर दिया। क्योंकि उनका मानना था कि अगर अच्छा कैमरामैन लिया गया तो वो फिर अपने हिसाब से काम करेगा। जबकि ये इस फिल्म को अपने मुताबिक बनाना चाहते हैं।
आखिरकार साल 1951 में बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म “अफसाना” रिलीज़ हो गई। जिस दिन इस फिल्म का पहला शो था, बीआर चोपड़ा की पत्नी ने शो पर आने से इन्कार कर दिया था। क्योंकि उन्हें लग रहा था कि फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। और फिल्म लोगों को इतनी बुरी लगेगी कि लोग अंडे और जूते स्क्रीन की तरफ फेंकने लगेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि लोगों ने इस फिल्म को बहुत ज़्यादा पसंद किया। और फिल्म सुपर-डूपर हिट हो गई। यूं इस तरह भारतीय सिनेमा को मिले बी.आर. चोपड़ा — जिन्होंने आगे चलकर एक ही रास्ता, नया दौर, साधना, कानून, गुमराह, हमराज़, दास्तान, धुंध, पति पत्नी और वो, इंसाफ का तराज़ू और निकाह जैसी फिल्में बनाई। कई फिल्में प्रोड्यूस कीं और महाभारत सहित कई नामी व चर्चित टीवी शोज़ भी बनाए।
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