वे जब भारत में ब्रिटिश सरकार के श्रम मंत्री बने तब के उनके भाषण पढ़िये।मैं सिर्फ एक भाषण का उदाहरण देता हूँ। तत्कालीन कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में ही नहीं, कांग्रेस के बारे में और गांधी व जयप्रकाश नारायण के बारे में उनके विचार इसमें जानिए । उनके द्वारा वायसराय और सेक्रेटरी ऑफ द स्टेट को वीटो की शक्ति प्रदान करने के पक्ष में तर्क पढ़िये। हिटलर और ब्रिटिश सरकार के बीच में फर्क करते हुए वे कहते हैं कि ऑटोक्रेसी में वीटो नहीं होता, उत्तरदायी शासन में वीटो होता है। उनके द्वारा विधायी सदन की जगह सेक्रेटरी ऑफ द स्टेट के पक्ष में वीटो रखने का औचित्यीकरण इसमें पढ़िये।
जिस विधायिका के सामने वे अपना मत रख रहे थे वे उसे वीटो अधिकार के लिए इसलिए अनर्ह मान रहे थे कि वह तीन वर्ष के लिए चुनी गई थी पर नौ वर्ष से चल रही थी पर वे सेक्रेटरी ऑफ द स्टेट और वॉयसरॉय को अनर्ह नहीं कह रहे थे जो आये तो भारत में व्यापार करने के लिए थे लेकिन यहाँ दो सौ साल से कब्जा किये बैठे थे। वे कांग्रेस को एक हिंसक संगठन बता रहे थे और गाँधी को कांग्रेस के संकल्प द्वारा डिक्टेटर और कमांडर इन चीफ बनाये जाने का तथ्य याद दिला रहे थे पर स्वयं एक औपनिवेशिक सत्ता की मूलभूत हिंसक प्रकृति का उल्लेख नहीं कर रहे थे।
वे कह रहे थे कि “यह केवल एक तथ्य नहीं है कि कांग्रेस कार्यसमिति के लगभग सभी सदस्य — या कम से कम उनमें से बहुत से — अहिंसा में अपना विश्वास खो चुके थे; उनमें से बहुत से लोग इस सिद्धांत के प्रति उदासीन हो गए थे, बल्कि पर्याप्त प्रमाण भी उपलब्ध हैं जो संकेत देते हैं कि कांग्रेस के भीतर योजनाबद्ध हिंसात्मक अभियान की कोशिशें की जा रही थीं… मैंने जिन बातों का उल्लेख किया है, वे यह विश्वास दिलाने के लिए पर्याप्त हैं कि कांग्रेस को उस औपचारिक अहिंसा-सिद्धांत के पालन पर भरोसा नहीं किया जा सकता था, जिसे वे लिप सर्विस ही देते हैं।”
क्या यह किसी के भी ध्यान में नहीं कौंधता कि यह आलोचना उस साम्राज्य के मंच से की जा रही थी जिसने दो सौ वर्षों से अधिक समय तक भारत को लूटा, विद्रोहों को कुचला, नीतियों के माध्यम से अकाल थोपे और बंदूक की नली से नियंत्रण बनाए रखा। 1857 का विद्रोह, 1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड और असंख्य शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर लाठीचार्ज केवल ऐतिहासिक घटनाएँ नहीं थीं, बल्कि औपनिवेशिक राज्य की “मूलभूत हिंसक प्रकृति” को फाश कर देने वाली थीं।
यह स्पीच पीड़ित और अपराधी की भूमिकाओं को उलट देती थी: उपनिवेशित लोग प्रतिरोध के लिए आक्रामक ठहराए जा रहे थे, जबकि उपनिवेशक की संस्थागत हिंसा—भारतीय दंड संहिता के दमनकारी प्रावधानों और सैनिकों की स्थायी तैनाती में प्रकट—को “उत्तरदायी शासन” के रूप में पवित्र बनाया जा रहा था। गांधी के अहिंसक असहयोग की पुकार को राजद्रोह में बदल दिया गया था ताकि सामूहिक गिरफ़्तारियाँ और दमन उचित ठहराया जा सके। भाषणकर्ता सज्जन इस असमानता को स्वीकार न कर केवल भारतीय आकांक्षाओं को अवैध ठहरा रहे थे, बल्कि एक नैतिक दोहरा मापदंड भी कायम कर रहे थे, जहाँ दमनकर्ता दमित को नैतिकता का पाठ पढ़ाता था। जिस साम्राज्य के हाथ खून से लथपथ थे, उसके श्रम मंत्री के रूप में कार्य करते हुए ये सज्जन राष्ट्रीय आंदोलन से नैतिक शुद्धता की मांग कर रहे थे।
विधायी सभा सभा भले ही ब्रिटिश युद्ध-स्थगन के कारण विस्तारित हुई हो, इस स्पीच में वीटो अधिकार के अयोग्य ठहराई गई। यह नजरअंदाज करते हुए कि वीटो साम्राज्यवादी नियंत्रण का हथियार था, जो 1935 के भारत सरकार अधिनियम की कथित स्वायत्तता को नाममात्र का बना देता था। ऐतिहासिक रूप से, ऐसे तर्क 1930-40 के दशक की बहसों में प्रचलित थे, जहाँ ब्रिटिश वफ़ादार “उत्तरदायी सरकार” को द्वैध शासन की असफलताओं को छिपाने के लिए इस्तेमाल करते थे, जहाँ गवर्नर वित्त और कानून पर विधायिकाओं को नियमित रूप से ओवरराइड करते थे। पाखंड इस बात में था कि निर्वाचित वैधता का उपदेश देते हुए उन अ-निर्वाचित विदेशियों को सशक्त बनाने में ये सज्जन अपनी विद्वता का उपयोग कर रहे थे जिनकी “योग्यता” नस्लीय श्रेष्ठता से उपजी थी, न कि जनादेश से। पर इन सज्जन के हाथ पर वह औपनिवेशिक घड़ी सजी थी जो हमेशा साम्राज्य के घंटे पर सेट थी तभी लंदन से निगरानी वाले स्टेट सेक्रेटरी के वीटो को “उत्तरदायी” ठहराना संभव हो सकता था।
इस दोहरे मापदंड ने न केवल भारतीय विधायकों का अपमान किया था बल्कि स्वतंत्रता के बाद संसदीय लोकतंत्र में अविश्वास के बीज बोए। वैश्विक संदर्भ में, यह अन्य औपनिवेशिक पाखंडों के समानांतर ही था। फ्रांस का “सभ्यता मिशन” अल्जीरियाई मतों को वीटो करता था।
ये सज्जन लॉर्ड लिनलिथगो के द्वारा युद्धकालीन १००,००० की बिना मुकदमा कैद “शासन” के रूप में सामान्यीकृत कर सकते थे पर गाँधी या जयप्रकाश या स्वयं कांग्रेस की आंतरिक गतिशीलता—अहिंसा में विश्वास खोने—पर ध्यान देने का परिश्रम इनके श्रम मंत्री होने की भूमिका का निर्वहन था। विधायी निकाय को संबोधित करके उसकी अपनी शक्तिहीनता के लिए सहमति मांगना चरम पाखंड था। जब ब्रिटिश “नागरिक स्वतंत्रताएँ” बंदूकों और संगीनों से थोपी जा रहीं थीं तब ये श्रम मंत्री न्यूनतम मजदूरी या यूनियन अधिकार जैसे प्रगतिशील सुधारों को अवरुद्ध करने वाले वीटो का समर्थन कर रहे थे। साम्राज्यवादी “श्रम सुरक्षा” का अर्थ कुली कानून थे जो प्रवासियों को बागानों से बाँधते थे।
भाषणकर्ता सज्जन इस असमानता को स्वीकार न कर न केवल भारतीय आकांक्षाओं को अवैध ठहरा रहे थे, बल्कि एक नैतिक दोहरा मापदंड भी कायम कर रहे थे, जहाँ दमनकर्ता दमित को नैतिकता का पाठ पढ़ाता था। जिस साम्राज्य के हाथ खून से लथपथ थे, उसके श्रम मंत्री के रूप में कार्य करते हुए ये सज्जन राष्ट्रीय आंदोलन से नैतिक शुद्धता की मांग कर रहे थे।
पर नहीं, वे तो दमित दलित के पैरोकार मान लिए गए तो मान लिए गए।
अब इतने बरसों बाद ये बात क्यों उठा रहे हैं?
वो तो सिर्फ उन्हें ही हक था कि सहस्राब्दियों पुरानी किसी किताब का मुद्दा उठा सकें।
(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और मध्यप्रदेश के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं)

