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लैंड पूलिंग और ममलेश्वर लोक प्रस्ताव का मसला: यह बैकफुट नहीं, सरकार का बैकअप है

राज्य के विकास एवं जनता के लिए कल्याणकारी योजनाओं का निर्माण किया जाता है. यह संभव नहीं होता कि प्रत्येक योजना अथवा कार्यक्रम चाकचौबंद हो क्योंकि इन योजनाओं का निर्माण नौकरशाह करते हैं और राज्य के मुखिया को प्रस्तुत करते हैं. नौकरशाह से भी कई बार कमी रह जाती है और वे राज्य के मुखिया को भी वैसा ही प्रस्तुत कर देते हैं लेकिन जब राज्य के मुखिया अर्थात मुख्यमंत्री की नजर में आता है कि जनता के लिए बनायी गई कल्याणकारी योजनाओं में कोई कमी रह गई है अथवा इससे जनहित का नुकसान हो रहा है तो वह तत्काल ऐसी योजनाओं को वापस लेती है. हाल में ही लैंड पूलिंग और ओंकारेश्वर में ममलेश्वर लोक निर्माण के प्रस्ताव को डॉ. मोहन यादव सरकार ने वापस लिया है. डॉ. मोहन यादव सरकार के इस फैसले को इस तरह प्रचारित किया जा रहा है कि सरकार बैकफुट पर आ गई है. लैंड पूलिंग और ममलेश्वर के मसले को इसी नजर से देखा जाना चाहिए. किसी भी सरकार के समक्ष सबसे पहले होता है कि जनभावनाओं को और उनके हितों को ठेस ना पहुँचे. लैंड पूलिंग मामले में किसानों के हितों पर आँच आ रही थी तो एक्ट में संशोधन किया गया वहीं ममलेश्वर में जनभावनाओं को ध्यान में रखकर ममलेश्वर निर्माण की प्रस्तावित योजना को वापस लिया गया है.
लैंड पूलिंग का मामले को थोड़ा समझें तो मोहन सरकार ने किसानों के हक में फैसला लिया है. लैंड पूलिंग के मामले में भूमि अधिग्रहण कानून 2013 को लागू करने का फैसला किया है और इस संबंध में आदेश भी जारी कर दिया गया है. लैंड पूलिंग में सरकार जमीन का अधिग्रहण करेगी और उस पर पक्का निर्माण करेगी लेकिन संशोधन के पहले हितग्राही को मुआवजा देने का प्रावधान नहीं था किन्तु संशोधन के उपरांत अब आधी जमीन वापसी के साथ मुआवजा के हकदार भी होंगे. यहाँ यह भी जान लेना उचित होगा कि लैड पुलिंग क्या है तो यह लैंड पूलिंग एक शहरी विकास प्रक्रिया है जिसमें निजी भूमि को एक साथ मिलाकर सडक़, पार्क और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ विकसित किया जाता है। इसके बाद, विकसित भूमि का एक हिस्सा मूल मालिकों को वापस दे दिया जाता है, जिसका मूल्य पहले से अधिक होता है। यह सरकार को सीधे भूमि खरीदने के बजाय शहरी विकास की अनुमति देता है। अब सिंहस्थ 2028 के लिए किसी भी किसान की जमीन अधिग्रहित नहीं की जाएगी। पूर्व की तरह तय अवधि के लिए जमीन ली जाएगी। बदले में मालिकों को रुपए दिए जाएंगे। सिंहस्थ के सफल आयोजन और किसानों के सम्मान में सरकार ने निर्णय लिया है। सीएम डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि पूरा विश्व सिंहस्थ का वैभव देखेगा।
सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच महत्वकांक्षी भूमि अधिग्रहण योजना को सरकार ने वापस ले लिया है। किसान लगातार लैंड पूलिंग एक्ट का विरोध कर रहे थे। इसके बाद सीएम ने किसानों के साथ मीटिंग कर यह फैसला लिया है। बीकेएस के वरिष्ठ नेता के. राघवेंद्र पटेल ने अखबारों से जैसा कहा और उनकी बात मानें तो  दिल्ली से वापसी की मंजूरी मिलने के बाद ही मुख्यमंत्री ने उनसे मिलकर योजना की बारीकियों पर दो घंटे तक चर्चा की। विरोध की पहली चिंगारी फरवरी में ही भडक़ उठी थी, जब बीकेएस ने मालवा क्षेत्र में आंदोलन शुरू किया। इस क्षेत्र में बीकेएस के 8 लाख से ज्यादा सदस्य और 4,000 से ज्यादा ग्राम समितियां हैं। बीकेएस का कहना है कि मुख्यमंत्री को बार-बार भेजे गए पत्रों का जवाब न मिलने के बाद ही मामला गंभीर हुआ। नौकरशाहों की मानें तो सरकार के इस फैसले का कारण नीतिगत खामियों से ज्यादा पारदर्शिता की कमी थी। मसौदा अधिसूचना जारी करने के बाद, अधिकारियों ने भूमि मानचित्र और लाभ मॉडल का खुलासा नहीं किया, जिससे छिपे हुए इरादों पर संदेह पैदा हुआ। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि लोग ब्लूप्रिंट मांगते रहे, यह जानना चाहते थे कि कौन सी जमीन ली जाएगी, मुआवजा कैसे मिलेगा, लेकिन हमने हफ्तों तक देरी की। उस देरी की कीमत हमें चुकानी पड़ी। हालांकि इसे बड़े केनवास पर देखें तो मामला सुलझ गया है.
ममलेश्वर लोक : जनभावना के साथ सरकार
उज्जैन सिंहस्थ- 2028 के तहत 4.6 हेक्टेयर में 120 करोड़ रुपए की लागत से ममलेश्वर लोक प्रस्तावित किया गया। इसके लिए 3 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन का अधिग्रहण होना था। इसकी डेडलाइन दिसंबर 2027 तक तय की गई। तीर्थनगरी ओंकारेश्वर में प्रस्तावित 120 करोड़ रुपए का ममलेश्वर लोक प्रोजेक्ट आखिरकार निरस्त कर दिया गया है. प्रशासन ने कहा कि भविष्य में किसी ‘लोक’ निर्माण पर स्थानीय सहमति को प्राथमिकता दी जाएगी. विधायक नारायण पटेल ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और दिल्ली में मौजूद कलेक्टर ऋषभ गुप्ता से बात कर ओंकारेश्वर की गंभीर स्थिति से अवगत करवाया।
इसके बाद डिप्टी कलेक्टर ने लिखित में आदेश जारी किया कि ममलेश्वर लोक ब्रह्मपुरी क्षेत्र में नहीं बनेगा। इसे अन्यत्र स्थान पर बनाया जाएगा और निर्माण से पहले स्थानीय संत समाज व जनता की सहमति ली जाएगी।  सरकार के प्रतिनिधि के रूप में मांधाता विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक नारायण पटेल की विवाद के हल में अहम भूमिका रही। उन्होंने बीच का रास्ता निकाला और मुख्यमंत्री से चर्चा कर समस्या का समाधान निकाल लिया। पटेल ने कहा कि मैं विनाश पर विकास नहीं होने दूंगा, मैं हमेशा सनातनी हूं, संतों के चरणों में पहुंचा हूं। किसी भी संत की बद्दुआ से कैसे राजनीति कर सकता हूं। प्रस्तावित ममलेश्वर लोक का मामला भी मोहन यादव सरकार ने वापस लेकर जनभावना का आदर किया है. इसमें सबसे बड़ी बात यह  है कि सरकार की महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट ममलेश्वर लोक का विरोध भाजपा के विधायक नारायण पटेल ने किया और मुख्यमंत्री से चर्चा के उपरांत इसे वापस लिए जाने का फैसला हुआ.
सबसे दुर्भाग्य की बात तो यह है कि जो अधिकारी जीवनभर सरकार की तरफदारी करते रहे, रिटायरमेंट के बाद वे लगातार सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. लैंड पूलिंग के मामले में वे लेग पुलिंग जैसी भाषा का उपयोग करने से परहेज नहीं कर रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि यह लोग यह जानते हैं कि स्थिति और परिस्थितियों के मुताबिक फैसले लिए जाते हैं, उनमें संशोधन होता है और कई बार प्रस्तावित योजना पूरी तरह निरस्त कर दिया जाता है. जिम्मेदार लोगों का जनभावना को कई बार उद्धेलित करता है तो कई बार उनका मन बदल देता है. शांति के टापू मध्यप्रदेश में सरकार और शासन किसी का भी रहा हो, जनभावनाओंं को हमेशा ऊपर रखा गया. लैड पूलिंग और ममलेश्वर लोक के संबंध में निर्णय वापस लेने का यह पहला और इकलौता फैसला नहीं है. इसके पहले के सरकारों ने भी जनहित में अनेक फैसलों को बदला है, संशोधित किया और कई बार पूर्ण रूप से रद्द भी किया है.
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