Homeपत्रिकाकला-संस्कृतिसंस्कृति और शृंगार बोध को जीवंत कर देते हैं पारंपरिक परिधान

संस्कृति और शृंगार बोध को जीवंत कर देते हैं पारंपरिक परिधान

भारत विविध संस्कृतियों के फूलों का एक मनोहारी गुलदस्ता है। सिंधुघाटी, वैदिक, उत्तर वैदिक, हिन्दू, राजपूत, मुगल राजाओं के काल से लेकर वर्तमान समय तक आभूषण और परिधान शृंगार के प्रतीक रहे हैं।
भारत में कश्मीर, पंजाब, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, ओडिशा राज्यों के साथ – साथ पूर्वोत्तर भारत राज्यों में विविध प्रकार के आभूषणों के साथ – साथ विविध रंगों, डिजाइनों, आकर – प्रकार की वेशभूषा भी किसी शृंगार से कम नहीं है। कश्मीर और लद्दाख के हेमिस और गोम्पा नृत्यों, पंजाब के भांगड़ा और गिद्दा नृत्यों, हिमाचल के नृत्यों, उत्तर प्रदेश के कथक और शास्त्रीय नृत्यों, राजस्थान के घूमर, कालबेलिया, डांडिया, चिरमी, तेरहताली आदि नृत्यों, गुजरात के गरबा नृत्य, ओड़िशी नृत्य, दक्षिण भारत के कथकली, पूर्वोत्तर भारत के आदिवासियों का नागा नृत्य, बांस नृत्य, असम का  बिहू नृत्य आदि देश के प्रमुख नृत्यों में विशभूषा की शृंगारिता नयनाभिराम होती है। इनमें हमें देश की शृंगारित वेशभूषा के दर्शन होते हैं।
यही नहीं हमारे देवी देवताओं की पोषक भी किसी आकर्षण से कम नहीं है जो उनका शृंगार करती हैं। लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती,पार्वती आदि देवियों, कृष्ण – राधा आदि को मंदिरों और चित्रकला में आकर्षक पोशाक के साथ शृंगारित रूप में देखा जाता है। आभूषणों के साथ – साथ शृंगारित पोशाक सौंदर्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी भी रूप में हम वेशभूषा , परिधान और पोषक को शृंगार से पृथक कर नहीं देख सकते। वेशभूषा भी शृंगार का ही एक प्रबल और महत्वपूर्ण हिस्सा है। सोलह शृंगार की अवधारणा भी इसकी पुष्टि करती है।
निर्विवाद कह सकते हैं कि शृंगार में आभूषण पहनना अथवा विविध प्रकार सजने – संवारने के साथ – साथ परिधान की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि सुंदर और आकर्षक दिखने के लिए राजाओं के काल में चाहे वह राजपूत काल हो या मुगल काल  अथवा देश के किसी अन्य राजाओं का काल अलंकृत परिधान न केवल राजाओं वरन कुलीन वर्ग, सामंतों की शोभा बढ़ाती थी। उनके वस्त्र कीमती कपड़े के होने के साथ – साथ जटिल कारीगरी युक्त स्वर्ण रजत से जड़े होते थे। महिलाओं की तरह पुरुष भी आभूषणों के शौकीन थे और आभूषण धारण करते थे।
रत्नजड़ित वस्त्र :
हमें जब भी किसी भी संग्रहालय को देखने का मौका मिलता है तो हम देखते हैं कि अमूमन हर संग्रहालय में पृथक से एक वस्त्र दीर्घा होती है। यह वस्त्र दीर्घा हमें प्राचीन समय में राजाओं और रानियों के वस्त्रों के बारे में उपयुक्त जानकारी देते हैं, जो उस काल खंड की कुलीन वेशभूषा के बारे में बताते हैं। खास कर राजपूत शासकों के समय के वस्त्र आकर्षक कशीदाकारी और रत्न जड़ित दिखाई देते हैं। यह इस ओर इंगित करते हैं कि राजा और रानी केवल आभूषणों से ही शृंगार नहीं करते थे वरन उनके परिधान भी किसी आभूषण से कम नहीं होते थे। इन रत्न जड़ित वस्त्रों का आकर्षण देखते ही बनता है।
राजपूत राज्य में शृंगार  :
 हमारे देश के इतिहास में 7वीं शताब्दी ई. से 12वीं शताब्दी ई. तक का 500 साल का काल राजपूत शासन काल कहा जाता है। इस काल खंड में हिंदू धर्म का नवीनीकरण हुआ, इस काल को शौर्य का युग भी कहा जाता है। राजपूतों के अनेक कुल हुए। खासकर इस काल में चौहानो और प्रतिहारों का प्रभुत्व बढ़ा। लगभग संपूर्ण उत्तर भारत उनके आधिपत्य में  था। त्रिपक्षीय संघर्ष में जीत ने उत्तर भारत में प्रतिहारों की प्रभुता स्थापित की। पृथ्वी राज चौहान प्रतापी शासक हुए। मुगल काल में भी राजा, रानी और दरबारियों की अलंकृत पोशाखें देखते ही बनती हैं।
 जयपुर के सिटी पैलेस संग्रहालय के  मुबारक महल के भूतल पर स्थित वस्त्र दीर्घा अत्यंत समृद्ध है। यहाँ विभिन्न प्रकार के वस्त्र और कपड़े प्रदर्शित हैं, जिनमें महाराजा सवाई माधो सिंह प्रथम का आत्मसुख , महाराजा सवाई प्रताप सिंह की शादी का जामा जो लाल सूती वस्त्र का 129 सेंटीमीटर लंबा है और 320 कली का विशाल घेर वाला है देखते ही बनता है। यही पर महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय के अंगरखी ,महारानियां द्वारा दीपावली पर पहने जाने वाली सूती पोशाक, कशीदाकारी के कश्मीरी शाल,बनारस और सूरत के खीमखाब, सांगानेर की ठप्पा छपाई के वस्त्र, जयपुर की बांधनी, बंधेज, गोटा के वस्त्र देखने को मिलते हैं। यहां प्रदर्शित पोशाखें अत्यंत जटिल कारीगरी लिए हुए आकर्ष हैं।
 राजपूत शासक शौर्य और वीरता की प्रतिमूर्ति होने से उनकी वेशभूषा में भी इस भाव का प्रदर्शन स्पष्ट देखने को मिलता हैं। इनकी पारंपरिक वेशभूषा की एक अलग शैली का प्रदर्शन करते हुए इनकी संस्कृति दिखाई देती हैं। शासक ही नहीं इस समुदाय के व्यक्ति भी अपने को विभिन्न आभूषणों और गहनों से सजाना पसंद करते थे। जो समृद्ध और शक्तिशाली होते थे वे जटिल डिजाइन  की सजावट वाले उच्च स्तर के कपड़े से बने वस्त्र धारण करते थे। कुलीन पोशाकें मुख्य रूप से राजपूत पुरुषों द्वारा पहनी जाती थीं जो काफी विस्तृत दरबारी पोशाक होती थी। शासकों की पोशाकें महंगी और बारीक होती थी। उनके  सिर पर रत्नजड़ित या गोटेदार पगड़ी, मालवेद या रत्नजड़ित पट्टी होती थी। वैष्णव परंपरा के मुताबिक, पुरुषों के लिए बारह कसों की अंगरखी का पहनावा महत्वपूर्ण माना जाता था। राज दरबार के मुखिया ही इस अंगरखी को पहन सकते थे।
कुलीन वर्ग :
 कुलीन वर्ग के परिधान में मुख्य तौर पर पगड़ी, अंग राखी, चूड़ीदार पायजामा और एक बेल्ट होती है जिसे “कमरबंध” कहा जाता है। अंगरखी एक लंबा ऊपरी वस्त्र है जिसे बिना आस्तीन के करीब-करीब सामने पहना जाता है। इसमें एक विषम सामने का योक होता है और यह बीच में खुला होता है और केंद्र-सामने कमर के कोने में बंधा होता है। जामा और शेरवानी  शाही लोगों द्वारा पहने जाने वाले अन्य ऊपरी वस्त्र हैं। निचले परिधान में पतलून शामिल है। ‘धोती’ भी पहनी जाती है,  तेवेटा शैली सबसे अधिक थार रेगिस्तान क्षेत्र में पहनी जाती है, जबकि अन्य क्षेत्र में तिलंगी शैली का उपयोग करते हैं।
पगड़ी :
16वीं सदी के बाद पहनावे में बदलाव आया।  महाराणा करण सिंह का मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के पगड़ी बदल भाई बनने पर पगड़ी पर मुग़ल प्रभाव आने लगा था। जगतसिंह प्रथम, राजसिंह एवं जयसिंह के राज्यकाल में शाहजानी पगड़ी चलती रही। राणा अमरसिंह द्वितीय ने पगड़ियों की नई शैली अपनाई, जो आकार में छोटी थी। यह महाराणा राजसिंह द्वितीय तक चलती रही। इस प्रकार की पगड़ी को ‘अमरशाही पाग’ के रूप में जाना गया। महाराणा अरसी की पगड़ी बूँदी शैली के निकट है, जो महाराणा भीमसिंह एवं जवानसिंह के राज्यकाल तक चलती रही। जवानसिंह के बाद पगड़ी के रूपों में बहुत अधिक परिवर्तन आये। महाराणा स्वरूपसिंह ने जो पगड़ी में परिवर्तन किया, उसे ‘स्वरूशाही पगड़ी’ के नाम से जाना जाता था।
राजपूत महिला :
 राजपूत महिलाओं की पारंपरिक पोशाक में घाघरा, चोली, और ओढ़नी शामिल हैं।  घाघरा  लंबाई में कशीदाकारी वाली स्कर्ट होती है । घाघरा साटन, रेशम या ऑर्गेजा से बना एक बड़ा गोटेदार स्कर्ट होता है। घाघरा सोने या चांदी की कढ़ाई से सजा होता है जो पहनने वाले की संपन्नता को दर्शाता है। राजपूत महिलाएँ  कलीदार, चारपाई और कालीपट्टी किस्म के घाघरे पहनती हैं। ऊपरी शरीर का पहनावा चोली , अंगिया या कुर्ती,  होता है। ओढ़नी या चुनार, कपड़े का एक लंबा टुकड़ा होता है, जिसे घूंघट के रूप में पहना जाता है। महिलाओं की पोशाक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “ओढ़ना ” था जिसे ब्रोकेड में बुना जाता है और गुलाबी या बैंगनी जैसे चमकीले आधार पर रेशम के धागे से बनाया जाता है। राजपूत महिलाएँ अलग-अलग अवसरों के आधार पर अलग-अलग तरह के ‘ओढ़ना’ पहनती हैं, जो जो लाल, मैजेंटा, हरे या पीले रंग में साटन या महीन सूती कपड़े से बने होते हैं।
राजपूत महिलाओं के आभूषणों की शैली और डिज़ाइन देखते ही बनते हैं। युवा राजपूत लड़कियों के कपड़ों में ‘पुथिया’ नामक एक ऊपरी वस्त्र शामिल होता है जो पीले, गुलाबी और सफेद रंग के सूती कपड़े से बना होता है और यह सादा या मुद्रित हो सकता है। युवा लड़कियाँ ‘सुलहंकी’ नामक एक ढीला पायजामा पहनती हैं।
आभूषणों में रखड़ी सिर का आभूषण है; माची-सूलिया कानों में पहना जाता है। उनके हार तेवटा, पटिया और आड़ हैं। रखड़ी, नथ और चूड़ा महिला की वैवाहिक स्थिति के प्रतीक हैं। पैरों के आभूषणों में जोड़, रिमझोल और पगपन शामिल हैं। महिला और पुरुषों के जूतों पर आकर्षक कढ़ाई की हुई होती है, जिस से वे खूबसूरत प्रतीत होते हैं।
राजस्थान में विभिन्न जातियों बंजारा, सपेरा, गुर्जर, रेबारी आदि के पुरुष और महिलाओं खासकर इनके लोक कलाकारों की वेशभूषा और शृंगार उनकी जातीय परम्परा और राजस्थानी संस्कृति का सुंदरतम प्रतीक हैं।
आजकल सभी समुदाय की आधुनिक लड़कियां राजपूती पोशाक फैशन के रूप में धारण करती हैं। यह पोषक अत्यंत जटिल डिजाइन में सुंदर लगती हैं। कढ़ाई और अलंकरण युक्त राजपूती पोशाकों को पहन कर किसी भी लड़की की प्रबल इच्छा होती है कि वह  दुल्हन के रूप में शाही और सुंदर लगे।
इसी तरह विवाह के समय लड़के और लड़कियां जोधपुरी पोशाक पहना चाहती हैं। राजस्थानी पोशाक का सलमे सितारों और कशीदाकारी वाला कीमती से कीमती घाघरा दुल्हन की पहली पसंद होती है। यह धाधरा   कॉटन, साटन  क्रेप,  जार्जेट और शिफॉन आदि कपड़ों से बनाया जाता है। यह सुंदर, क्लासिक और फैशनेबल डिज़ाइन और कढ़ाई में लाल, मजेंटा, गुलाबी, नारंगी, नीला और हरे रंग में होती हैं। इन पर ज़रदोज़ी, गोटा पट्टी, ज़री और कुंदन आदि की कलात्मक सजावट की जाती है। बारात में राजस्थानी पगड़ी और साफ़ों का इंद्रधनुषी रंग देखते ही बनता है।
पंजाबी शृंगार :
पंजाब के प्रसिद्ध नृत्य भांगड़ा और गिद्दा नृत्यों के समय नर्तक पुरुषों और महिलाओं की रंडबरंगी पोशाक का आकर्षण देखते ही बनता है।  पुरुष परंपरागत रूप से  ‘कुरता-पजामा’ और पगड़ी तथा स्त्रियां ‘सलवार-कमीज़’ के साथ एक रंग-बिरंगा ‘दुपट्टा’  पहनते हैं। हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में महिलाएं ज्यादातर पंजाब के प्रसिद्ध लोक नृत्य ‘गिद्दा’ के दौरान पंजाबी घाघरा पहनती है जो अत्यंत आकर्षक होता है और उनके सौंदर्य में चार चांद लगता है। महिलाओं के परिधानों पर पारंपरिक पुष्प कला ” फुलकारी ” के वस्त्र शॉल, कुर्ते, दुपट्टे और लहंगे पर जटिल डिजाइन के आकर्षण के साथ बुना जाता है, विशेष अवसरों पर पहनती हैं। फूल शिल्प’ कला पंजाब की संस्कृति में 15वीं शताब्दी से चली आ रही है। वारिस शाह के प्रसिद्ध रोमांटिक उपन्यास ‘हीर-रांझा’ में इस रचनात्मक कढ़ाई का उल्लेख किया गया है। शॉल, दुपट्टे, लहंगे, कुर्ते और सलवार सूट पर जीवंत रंगीन बनाई में बुने गए उत्तम फूलों के पैटर्न इन परिधानों को वास्तव में आकर्षक बनाते हैं। खूबसूरत डिजाइन लिए पटियाला सलवार सूट अपनी शान और स्टाइल के लिए न केवल पंजाब में वरन पूरे उत्तरी भारत में लोकप्रिय है। जामा – कपड़े से लंबाई में बने जामा को  मुगल काल के दौरान पंजाब क्षेत्र के पुरुष सिर पर पगड़ी के साथ पहनते थे जो राजाओं की शाही और राजसी प्रकृति को दर्शाता है। यह मूल रूप से पुरुषों के लिए एक पोशाक थी, लेकिन महिलाएं भी इसे टाइट-फिटिंग पायजामा के साथ पहनती थी।
महिलाओं में सिर के बालों के साथ गुंथी आभूषणों और रंग-बिरंगे धागों से सजी परांडी या परांदा पंजाब की महिलाओं द्वारा उपयोग  की जाने वाली बालों का सहायक शृंगार है। यह प्यार का भी प्रतीक है जब दुल्हन इसे अपने पति से स्नेह के रूप में प्राप्त करती है। परांडी अलग-अलग आकार और रंगों में आती हैं और इन्हें हार, टीका, चूड़ियों और इसके सिरे पर सुनहरे रंग की चमक जैसे आभूषणों से सजाया जा सकता है। यह पंजाब की महिलाओं के उत्साह को दर्शाता है और पूरे भारत में महिलाओं द्वारा इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। पंजाबी जूता या जूती  400 सालों से राजाओं की शाही परंपरा का हिस्सा रही है और पारंपरिक रूप से असली सोने या चांदी के धागों से चमड़े पर कढ़ाई की जाती है। पंजाब की पारंपरिक पोशाक सुंदरता और चमकीले रंगों का एक आकर्षक मिश्रण है।
गुजराती शृंगार
गुजरात संस्कृति में शृंगार और शृंगारित वेशभूषा जग जाहिर हैं। पारंपरिक वेशभूषा अपने जीवंत  और भड़कीले रंगों और जटिल शिल्प कौशल के लिए प्रसिद्ध है। मिरर वर्क और कशीदाकारी उनके परिधानों को चित्ताकर्षक बनती है। शृंगारित परंपरा हमें उनके प्रसिद्ध गरबा, डांडिया रास , तिप्पनी , पधार , सिदी और डांगी नृत्यों के समय  बखूबी देखने को मिलती है।  पुरुषों के लिए, विशिष्ट पोशाक में ‘कुर्ता’ या ‘केडिया’ और ‘धोती’ या ‘चूड़ीदार’ शामिल हैं, जिसके साथ  एक पारंपरिक पगड़ी भी होती है। महिलाएं आमतौर पर ‘चनिया चोली’ पहनती हैं, जो एक खूबसूरत पहनावा है जिसमें एक भड़कीली स्कर्ट (चनिया), एक फिट ब्लाउज (चोली) और एक दुपट्टा होता है। इन कपड़ों को अक्सर बेहतरीन कढ़ाई, शीशे के काम और मनके के काम से सजाया जाता है, जो गुजरात की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। त्योहारों, शादियों और अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक और पारिवारिक समारोहों और पारंपरिक नृत्यों के दौरान पहने जाने वाले ये कपड़े गुजरात के लोगों की शृंगार प्रियता और सौंदर्य बोध का प्रतीक है। पाटन में हथकरघा पर बुनी पटोला साड़ी पूरे विश्व में मशहूर है।
  यहीं शृंगार परिधान बोध हमें देश के अन्य राज्यों कश्मीर, ओडिशा, आदि में भी देखने को मिलता है। आभूषणों के शृंगार के साथ – साथ परिधान शृंगार मिल कर ही सम्पूर्ण रूप से शृंगार का बोध करता है।
————
शिखा अग्रवाल, भीलवाड़ा, राजस्थान
चित्र : गूगल से साभार
spot_img
RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

लोकप्रिय

उपभोक्ता मंच

- Advertisment -

वार त्यौहार