4–5 दिसंबर को राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दो दिवसीय भारत यात्रा केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह बदलती वैश्विक राजनीति में भारत–रूस रिश्तों की नई दिशा और नई गहराई का स्पष्ट संकेत बनकर सामने आई। एक ओर यूक्रेन युद्ध को तीन वर्ष पूरे होने को हैं, दूसरी ओर पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंध, वैश्विक मंदी का डर और ऊर्जा संकट पूरी दुनिया को अस्थिर बनाए हुए हैं। ऐसे समय में भारत और रूस का साथ यह बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब केवल दबाव और टकराव से नहीं, बल्कि संतुलन और व्यावहारिक साझेदारी से आगे बढ़ रही है।
पुतिन की यह यात्रा इस मायने में भी खास रही कि रूस आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, जबकि भारत तेजी से उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। इस पृष्ठभूमि में दोनों देशों ने साफ कर दिया कि उनकी दोस्ती किसी तात्कालिक मजबूरी की नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर आधारित है।
यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की पूरी कोशिश की। स्विफ्ट भुगतान प्रणाली से रूस को बाहर करने, उसके बैंकों और ऊर्जा निर्यात पर रोक लगाने जैसे कदम उठाए गए। इसके बावजूद भारत–रूस व्यापार कमजोर नहीं पड़ा। उलटे वर्ष 2024–25 में द्विपक्षीय व्यापार 65 अरब डॉलर के पार पहुँच गया, जो अब तक का सबसे ऊँचा स्तर है।
रुपया–रूबल व्यापार व्यवस्था, रूस की SPFS प्रणाली और भारत की रूपे प्रणाली के तालमेल, नई शिपिंग और बीमा व्यवस्थाओं ने इस व्यापार को प्रतिबंधों से काफी हद तक सुरक्षित रखा। आज भारत रूस से समुद्री रास्ते से कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है। सस्ते रूसी तेल से भारत को दो बड़े फायदे हुए—एक तो घरेलू महँगाई पर नियंत्रण बना रहा, दूसरा उद्योगों को लगातार सस्ती ऊर्जा मिलती रही। यह भारत की उस स्वतंत्र विदेश नीति का उदाहरण है, जिसमें वह दबाव में नहीं, बल्कि अपने हितों के आधार पर फैसला करता है।
यूरोप आज भी ऊर्जा संकट से पूरी तरह उबर नहीं पाया है, लेकिन भारत ने इस संकट को रणनीतिक अवसर में बदल दिया। पुतिन की यात्रा के दौरान दीर्घकालिक तेल और गैस आपूर्ति समझौते, एलएनजी सहयोग, आर्कटिक क्षेत्र में भारतीय निवेश और परमाणु ऊर्जा सहयोग पर सहमति बनी है। कुडनकुलम परमाणु परियोजना की आगे की इकाइयों पर भी ठोस बातचीत हुई है।
भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का करीब 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में रूस के साथ मजबूत ऊर्जा साझेदारी भारत की आर्थिक वृद्धि, औद्योगिक विकास और महँगाई नियंत्रण तीनों के लिए बेहद अहम है। साफ है कि आने वाले वर्षों में यह साझेदारी भारत की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ बनने जा रही है।
भारत–रूस रक्षा संबंध अब केवल हथियार खरीद तक सीमित नहीं रहे। अब जोर संयुक्त निर्माण और तकनीक हस्तांतरण पर है। ब्रह्मोस मिसाइल भारत–रूस की सबसे सफल संयुक्त रक्षा परियोजना बन चुकी है, जिसे अब तीसरे देशों को भी निर्यात किया जा रहा है। एस-400 वायु रक्षा प्रणाली ने भारत की सुरक्षा क्षमता को नई मजबूती दी है।
पुतिन की यात्रा के दौरान ड्रोन तकनीक, हाइपरसोनिक हथियार, साइबर सुरक्षा, सुखोई विमानों के इंजन निर्माण और संयुक्त शोध पर नई सहमतियाँ बनी हैं। ये सभी कदम ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को सीधे मजबूती देते हैं और भारत को धीरे-धीरे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाते हैं।
भारत–रूस संबंध अब केवल द्विपक्षीय नहीं रहे, बल्कि यूरेशिया के बड़े भू-आर्थिक नेटवर्क से जुड़ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) भारत को ईरान और रूस के रास्ते मध्य एशिया और यूरोप से जोड़ता है। इसे चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। वहीं चेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग भारत को रूस के सुदूर पूर्व से सीधे जोड़ने की क्षमता रखता है।
पुतिन की यात्रा में इन परियोजनाओं के तहत लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह विकास और कस्टम प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर सहमति बनी, जिससे आने वाले समय में भारत का निर्यात और निवेश दोनों बढ़ सकते हैं।
ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन (SCO), रूस–भारत–चीन (RIC) और जी-20 जैसे मंचों पर भारत और रूस का सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। ब्रिक्स का विस्तार, न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार के प्रयास डॉलर आधारित वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को धीरे-धीरे संतुलित कर रहे हैं। भारत आज ‘ग्लोबल साउथ’ की मजबूत आवाज़ बन रहा है, जबकि रूस पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती देने वाली शक्ति के रूप में उभरा है। दोनों मिलकर बहुध्रुवीय विश्व की नींव मजबूत कर रहे हैं।
भारत ने इस शिखर सम्मेलन में साफ कर दिया कि वह किसी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं है। भारत अमेरिका, यूरोप, रूस और एशिया—सबके साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर रिश्ते रखता है। भारत–रूस साझेदारी किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं, बल्कि वैश्विक अस्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखने की नीति का हिस्सा है।
आज की दुनिया तेजी से बदल रही है। शक्ति-संतुलन नया रूप ले रहा है। ऐसे समय में राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा और 22वां भारत–रूस शिखर सम्मेलन यह साबित करता है कि दोनों देशों का रिश्ता सिर्फ इतिहास की विरासत नहीं है, बल्कि भविष्य की रणनीति है। अनिश्चितताओं से भरी वैश्विक राजनीति में भारत–रूस साझेदारी स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा क्षमताओं और आर्थिक विकास का मजबूत आधार बनती जा रही है।
(लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना झंडेवालान,नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैें)

