आधुनिक युग में विधर्मियों को शुद्ध कर हिन्दू ( आर्य ) समाज में सम्मिलित करने का कार्य महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा ही प्रारम्भ कर दिया गया था । महर्षि का अनुसरण कर आर्यसमाज शुरू से ही शुद्धि के लिए प्रयत्नशील रहा , और उस द्वारा अमृतसर तथा राजकोट आदि में बहुत – से ईसाइयों व मुसलमानों को आर्य बनाया भी गया । पर व्यापक रूप से शुद्धि का कार्य उस समय शुरू हुआ , जबकि मुसलिम राजवंशों के शासन में मुसलमान बने मलकाने राजपूतों और मूले जाटों आदि को फिर से हिन्दू बनाना प्रारम्भ किया गया । ये लोग “ नौमुसलिम ” कहाते थे , और आचार – विचार तथा व्यवहार में हिन्दुओं से अधिक भिन्न नहीं थे । परिस्थितियों वश ये मुसलमान तो बन गये थे , पर इनके रीति – रिवाज व खान – पान आदि हिन्दुओं के समान ही रहे । उनके विवाह – संस्कारों में ब्राह्मणों को बुलाया जाता था , और अपने मुर्दो को गाड़ने के बजाय वे जलाया करते थे । गौमांस को वे अभक्ष्य मानते थे ।
देश के बदले हुए धार्मिक व राजनैतिक वातावरण में उनके लिए यह सोचना स्वाभाविक ही था , कि उन्हें फिर से अपनी राजपूत , अहीर व जाट आदि बिरादरियों में सम्मिलित कर लिया जाय , और सजातीय हिन्दुओं के साथ उनका रोटी – बेटी का सम्बन्ध फिर से स्थापित हो जाय । बीसवीं सदी के प्रथम चरण में ही राजपूत महासभा , क्षत्रिय महासभा , जाट महासभा आदि अनेक जातीय संगठनों का निर्माण हो चुका था ।
भारत की प्राचीन लोकतान्त्रिक परम्पराएँ बिरादरियों के रूप में इस युग में भी सुरक्षित थीं , और उनके नियमों व निर्णयों का सभी पालन किया करते थे । इस दशा में नौमुसलिमों ने अपनी बिरादरियों की जातीय महासभाओं के समक्ष यह इच्छा प्रकट करनी प्रारम्भ की , कि उन्हें शुद्ध कर अपनी बिरादरी में शामिल कर लिया जाय । यह दशा थी , जब आगरा के पण्डित भोजदत्त ने सन् १९०६ में “ राजपूत शुद्धि सभा ” की स्थापना की , और उस द्वारा राजपूत नौमुसलिमों को शुद्ध कर हिन्दू धर्म में वापस लाना प्रारम्भ किया । पर राजपूत शुद्धि सभा का कार्य सुगम नहीं था ।
हिन्दुओं में जो संकीर्णता चिरकाल से चली आ रही थी , उसे दूर कर मुसलमान माने जानेवाले लोगों को आत्मसात् कर सकना राजपूतों के लिए बहुत कठिन सिद्ध हुआ , और पण्डित भोजदत्त के प्रयत्न से जो एक हजार के लगभग नौमुसलिम शुद्ध होकर हिन्दू ‘ बन गये थे , उन्हें भी हिन्दू धर्म में स्थिर रख सकने में कठिनाइयाँ अनुभव होने लगीं। नौमुसलिम राजपूत तभी स्थायी रूप से हिन्दू रह सकते थे , जबकि हिन्दू राजपूत उन्हें अपनी बिरादरी में शामिल करने तथा उनके साथ रोटी – बेटी का सम्बन्ध करने के लिए सहमत हो जाते । इसी तथ्य को दृष्टि में रखकर ३० अगस्त , १९२२ को क्षत्रिय उपकारिणी सभा के अधिवेशन में निम्नलिखित प्रस्ताव स्वीकृत किया गया — ‘ शाही जमाने में जो राजपूत भाई हिन्दू धर्म और हिन्दू जाति से अलग हो गये या अलग कर दिये गये थे और अब पुनः अपने धर्म तथा हिन्दू बिरादरी में आना चाहते हैं , उन्हें पुनः शुद्ध करके राजपूत बिरादरी में शामिल कर लिया जाय । ” इस सभा के अध्यक्ष महाराजा सर रामपाल सिंह थे । इसके बाद दिसम्बर , १९२२ को क्षत्रिय महासभा की कान्फरेन्स शाहपुराधीश महाराजा श्री नाहर सिंह के सभापतित्व में हुई , जिसमें नौमुसलिम राजपूतों को हिन्दू बिरादरी में शामिल करने की बात की पुष्टि की गयी । यह प्रस्ताव अत्यन्त महत्त्व का था , क्योंकि पण्डित भोजदत्त ने जिस राजपूत शुद्धि सभा की स्थापना की थी , वह १९१० तक ही कायम रह सकी थी । पर अपने जीवन की स्वल्प अवधि में ही उस द्वारा मैनपुरी , हरदोई तथा शाहजहाँपुर जिलों के हजार से ऊपर नौमुसलिमों को शुद्ध कर लिया गया था । पर इस सभा के टूट जाने से शुद्ध हुए लोगों के हितों की रक्षा करनेवाली तथा बिरादरी में उन्हें सम्मिलित करने के लिए प्रेरणा देनेवाली कोई संस्था नहीं रह गयी थी ।
क्षत्रिय उपकारिणी सभा के प्रस्ताव से उन्हें कुछ सहारा अवश्य प्राप्त हुआ , पर उसका एक उलटा परिणाम भी हुआ । जब ये प्रस्ताव समाचारपत्रों में प्रकाशित हुए , तो मुसलिम क्षेत्रों में विक्षोभ उत्पन्न हो गया । मुसलिम मौलवी बड़ी संख्या में उन स्थानों पर जाने लगे , जहाँ नौमुसलिमों की बस्तियाँ थीं । उनका प्रयत्न था , कि ये लोग न केवल इस्लाम का परित्याग न करें , अपितु पूर्ण तया मुसलमान बन जायें । मुसलिम समाचारपत्रों में नौमुसलिमों को आर्यसमाज के ‘ आक्रमण ‘ से बचाने के लिए आन्दोलन शुरू हो गया । दिल्ली के ख्वाजा हसन निजामी ने इस अवसर से लाभ उठाया , और मुसलमानों को ‘ धर्म की रक्षा के लिए उकसाना प्रारम्भ कर दिया । उन्होंने एक पुस्तक प्रकाशित की , जिसमें इस्लाम के प्रचार के लिए नानाविध उपाय प्रतिपादित किये गये थे । यह पुस्तक स्वामी श्रद्धानन्द के हाथ लग गयी , और उन्होंने ‘ मुहम्मदी साजिश का इन्किशाफ ‘ नाम की एक पुस्तिका उर्दू में प्रकाशित की , जिसमें हिन्दुओं को उन उपायों व हथकण्डों से सावधान किया , जो तबलीग के लिए प्रयुक्त किये जा रहे थे । जब हिन्दुओं को ज्ञात हुआ कि क्षत्रिय उपकारिणी सभा के प्रस्तावों से सचेत होकर मौलवी नौमुसलिमों को पक्के मुसलमान बनाने के लिए जी – जान से मैदान में उतर आये हैं , तो उन्होंने भी इस मामले में कुछ करने का विचार किया ।
इसी प्रयोजन से १३ फरवरी , १९२३ को विविध प्रदेशों से ८५ हिन्दू प्रतिनिधि आगरा में एकत्र हुए , और उन्होंने ‘ भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा ‘ नाम से एक संगठन बनाने का निश्चय किया । इस सभा के निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किये गये— ( १ ) हिन्दू – समाज से बिछुड़े हुए तथा अन्य मतावलम्बी भाइयों को पुनः हिन्दू समाज में सम्मिलित करना , ( २ ) शुद्धि क्षेत्र में प्रेम तथा धर्म का प्रचार करना , ( ३ ) पाठशालाओं तथा अन्य शिक्षाप्रद संस्थाओं द्वारा शुद्धि – क्षेत्र में विद्यादि का प्रचार करना , ( ४ ) अनाथ तथा विधवाओं के धर्म की रक्षा करना , ( ५ ) आवश्यकतानुसार शुद्धि – क्षेत्र में चिकित्सालय खोलना , ( ६ ) सभा के उद्देश्यों की पूर्त्यर्थ अन्य आवश्यक साधनों को काम में लाना ।
सभा के प्रथम पदाधिकारी इस प्रकार निर्वाचित किये गये : प्रधान — स्वामी श्रद्धानन्द । उपप्रधान — महात्मा हंसराज , बाबू रामप्रसाद आगरा और कुंवर हनुमन्तसिंह आगरा । महामन्त्री — कुंवर माधवसिंह आगरा । मन्त्री बाबू नाथमल आगरा , श्री देव प्रकाश अमृतसर और चौबे विश्वेश्वर दयाल । कोषाध्यक्ष बाबू चाँदमल । अन्तरंग सदस्य – बाबू श्रीराम आगरा , राजा नरेन्द्रनाथ लाहौर , प्रोफेसर गुलशनराय लाहौर , पण्डित रामगोपाल शास्त्री लाहौर , पण्डित ठाकुरदत्त शर्मा लाहौर , महाशय खुशहालचन्द लाहौर , महाशय कृष्ण लाहौर , महात्मा नारायण स्वामी , श्री हरगोविन्द गुप्त कलकत्ता , कुंवर चाँदकरण शारदा अजमेर , बाबू शालिग्राम आगरा और डॉक्टर गोकुलचन्द नारंग लाहौर । ४ दिसम्बर , १९२४ को भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा की विधिवत् रजिस्ट्री करा ली गयी और प्रागरा में उसका मुख्य कार्यालय स्थापित कर दिया गया । नौमुसलिम वर्ग के लोगों का निवास प्रधानतया आगरा तथा उसके समीपवर्ती जिलों में था , अतः शुद्धि सभा के कार्यालय को आगरा में रखना उचित समझा गया । मार्च , १९२५ तक यह कार्यालय आगरा में रहा , फिर उसे लखनऊ में राजा साहब महवा की कोठी में ले जाया गया । एक साल बाद मार्च , १९२६ में उसे दिल्ली में स्थानान्तरित कर दिया गया ।
इस प्रसंग में यह बात ध्यान देने योग्य है , कि भारतीय हिन्दु शुद्धि सभा के प्रायः सभी पदाधिकारी आर्यसमाजी थे । उत्तरप्रदेश और पंजाब के प्रमुख आर्य नेताओं ने सहर्ष उसका पदाधिकारी होना स्वीकृत किया था , और वे पूर्ण उत्साह के साथ शुद्धि के कार्य में तत्पर हो गये थे । सनातन धर्म के अनेक विद्वानों और नेताओं का समर्थन भी शुद्धि सभा को प्राप्त हुआ , और उन द्वारा विधर्मियों को हिन्दू बनाने के पक्ष में सम्मतियाँ या व्यवस्थाएँ प्रदान की गयीं । ऐसी एक व्यवस्था लाहौर के प्राच्य महा विद्यालय के प्रधानाचार्य महामहोपाध्याय पण्डित शिवदत्त शर्मा द्वारा दी गई थी , जिसमें स्मृति – ग्रन्थों तथा पुराणों से अनेक प्रमाण देकर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला था , कि जब किसी अनार्य में आर्य बनने की इच्छा उत्पन्न हो , तो सबसे पूर्व उसके मन में आर्यत्व के त्याग का पश्चात्ताप होना चाहिए , फिर म्लेच्छत्व के प्रति ममत्त्व को उसे छोड़ देना चाहिए । फिर श्रुति , स्मृति तथा पुराणों के कथन में विश्वास रखते हुए प्रायश्चित्त के लिए विद्वानों के पास आना चाहिए और फिर उनके उपदेशों को मानकर उपवास , गंगा स्नान आदि कर्म तथा शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित विधि के अनुसार राम , कृष्ण तथा शिव के मन्त्रों की दीक्षा लेनी चाहिए । इस प्रकार अनार्यत्व दूर होकर प्रार्यत्व की प्राप्ति की जाती है । इस ढंग की जो व्यवस्थाएँ पौराणिक पण्डितों द्वारा दी जा रही थीं , उनसे शुद्धि – अान्दोलन को बहुत बल मिला । सर्वसाधारण जनता में इससे शुद्धि के पक्ष में लोक मत उत्पन्न हो गया , और पौराणिक लोग भी आर्यसमाज के कार्यकर्ताओं के साथ शुद्धि के कार्य में सहयोग करने लग गये ।
भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा ने अपनी स्थापना से मार्च , १९३१ तक के आठ वर्षों में जो कार्य किया , उसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-
( १ ) एक लाख तिरासी हजार तीन सौ बयालीस ( १,८३,३४२ ) नौमुसलिमों को शुद्ध कर हिन्दू समाज में सम्मिलित किया ।
( २ ) साठ हजार के लगभग अछूतों को विधर्मी होने से बचाया । ( ३ ) १,४५१ महिलाओं और ३,१५५ अनाथों की रक्षा की । ( ४ ) १२७ शुद्धि सम्मेलन किये गये । ( ५ ) राजपूत , अहीर , जाट आदि बिरादरियों की १५३ पंचायतें करायी गयीं , जिनमें नौ मुसलिमों को अपनी बिरादरी में सम्मिलित करने के लिए प्रेरित किया गया । ( ६ ) ८१ बड़े – बड़े सहभोज किये गये । ( ७ ) शुद्धि के क्षेत्र में अनेक पाठशालाओं तथा औषधालयों की स्थापना की गयी , और दर्जनों कुओं तथा मन्दिरों का निर्माण किया गया । ( ८ ) ‘ शुद्धि समाचार ‘ नाम का एक पत्र हिन्दी में प्रकाशित करना शुरू किया गया ( फरवरी , सन् १९२५ ) , जिससे शुद्धि – आन्दोलन को लोकप्रिय बनाने में बहुत सहायता मिली । एक समय इसकी ग्राहक – संख्या १४,००० तक पहुँच गयी थी , जो उस युग में एक असाधारण बात थी । बाद में कलकत्ता से बंगला भाषा में और सूरत से गुजराती भाषा में भी ‘ शुद्धि समाचार ‘ निकाला गया । शुद्धि – सम्बन्धी अन्य साहित्य भी बड़ी मात्रा में प्रकाशित किया गया ।
भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा का कार्य कितनी तेजी के साथ बढ़ रहा था , यह इस बात से स्पष्ट हो जायेगा , कि सन् १९२७ तक भारत के विभिन्न भागों में उसकी ३५ शाखाएँ स्थापित हो गयी थीं , और उसके तत्त्वावधान में ८० वैतनिक तथा ४५ अवैतनिक प्रचारक कार्य में तत्पर थे । अब इस सभा का कार्यक्षेत्र गुजरात , महाराष्ट्र , मद्रास , राजस्थान , मध्यप्रान्त और काश्मीर आदि में भी विस्तृत हो गया था । गुजरात में शुद्धि के कार्य का प्रधान श्रेय राजरत्न मास्टर आत्माराम अमृतसरी को प्राप्त है । उन्होंने कुंवर चाँदकरण शारदा के सहयोग से बड़ौदा में शुद्धि – सभा की स्थापना की , और उन लोगों को शुद्ध कर हिन्दु बनाना शुरू किया जो आगाखानी प्रचारकों के प्रयत्न से मुसल मान हो गये थे । सेठ जुगलकिशोर बिड़ला और राजा नारायणलाल पित्ती ने इस सभा की धन से सहायता की । महाराष्ट्र में जगद्गुरु शंकराचार्य ( डॉक्टर कुर्तकोटि ) का समर्थन शुद्धि आन्दोलन को प्राप्त हुआ , और वहाँ के पौराणिक पण्डितों ने शुद्धि के पक्ष में व्यवस्था प्रदान की । वहाँ भी हजारों विधर्मियों को हिन्दू बनाया गया ।
मद्रास प्रान्त में हिन्दुओं के क्रिश्चिएनिटी तथा इस्लाम को अपना लेने की समस्या बड़ी विकट थी । मलाबार के क्षेत्र में इड़वा , थिया , चसा आदि अनेक ऐसी हिन्दू जातियों का निवास था , जिनके लिए सार्वजनिक सड़कों का प्रयोग भी निषिद्ध था । ये लोग हिन्दू धर्म का परित्याग कर ईसाई या मुसलमान बन जाने के लिए तैयार थे । आर्य – प्रचारक पण्डित ऋषिराम , महाराय मणिकजी बेचरजी शर्मा , पण्डित वेदबन्धु और पण्डित आनन्दप्रिय आदि ने इस दशा में वहाँ जाकर प्रचार शुरू किया , और न केवल हिन्दुओं को विधर्मी होने से बचाया ही , अपितु बहुत – से लोगों को शुद्ध कर हिन्दू भी बनाया । इसी प्रकार का कार्य राजस्थान , सिन्ध , मध्य प्रान्त आदि अन्य प्रदेशों में भी किया गया , जिसके कारण लोगों में अपने धर्म की रक्षा तथा विधर्मियों को शुद्ध कर अपने समाज में सम्मिलित कर लेने के लिए उत्साह का प्रादुर्भाव हुआ ।
स्वामी श्रद्धानन्द और आर्यसमाज के नेतृत्व में शुद्धि – आन्दोलन जिस ढंग से जोर पकड़ रहा था , उससे ईसाइयों और मुसलमानों का विक्षुब्ध होना सर्वथा स्वाभाविक था । मध्य काल में हिन्दू लोग इतने संकीर्ण हो गये थे , कि किसी विधर्मी को अपने धर्म में दीक्षित करने का तो स्वप्न भी नहीं ले सकते थे , और परिस्थितिवश भय , लालच या क्षणिक आवेश के कारण जिस किसी ने इस्लाम को ग्रहण कर लिया हो , उसे भी अपने धर्म में वापस लेना उनकी दृष्टि में सर्वथा अनुचित व अकल्पनीय था । पर भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा हिन्दुओं की इस मनोवृत्ति में जो परिवर्तन ला रही थी , और आर्यसमाज द्वारा जिस ढंग से उसका नेतृत्व किया जा रहा था , मुसलमान उसे नहीं सह सके । वे हर संभव उपाय से आर्य समाज का विरोध करने और साम्प्रदायिक विद्वेष का प्रादुर्भाव करने के लिए प्रयत्नशील हो गये ।
खिलाफत – आन्दोलन के कारण मुसलमानों में जिस उग्र साम्प्रदायिक भावना का विकास हुआ था , और मौलाना मुहम्मद अली सदृश कांग्रेसी नेता जिस ढंग से अछूतों को मुसलमान बनाकर अपनी संख्या तथा शक्ति की वृद्धि करने के स्वप्न लेने लगे थे , उससे स्वामी श्रद्धानन्द ने यह आवश्यक समझा , कि अछूतों के उद्धार के साथ – साथ हिन्दू जाति को संगठित करने का भी प्रयत्न किया जाए । बीसवीं सदी के प्रथम चरण में भारत की राजनीति ने साम्प्रदायिक रूप ग्रहण करना प्रारम्भ कर दिया था । सन् १९०६ में ‘ इण्डियन मुसलिम लीग ‘ की स्थापना हुई थी , जिसका उद्देश्य भारत के मुसलमानों के राजनैतिक व अन्य अधिकारों की रक्षा करना था । उसके अनुकरण में हिन्दू हितों की रक्षा के प्रयोजन से ‘ हिन्दू महासभा ‘ स्थापित हुई , और ये दोनों संगठन अपने समुदायों के राजनैतिक हितों की रक्षा के लिए प्रयत्नशील हो गये ।
भारत में मुसलमान अल्प संख्या में थे । अतः उनके लिए राजनैतिक हितों की रक्षा का प्रश्न अर्थ रखता था । पर बहुसंख्यक हिन्दू जाति के लिए राजनैतिक हितों की रक्षा का प्रश्न उतने महत्त्व का नहीं था , जितना कि आन्तरिक सुधारों द्वारा अपने में शक्ति का संचार करने का था । हिन्दू लोग बहुत – सी जातियों और उपजातियों में विभक्त थे , और उनमें ऊँच – नीच का भाव प्रबल रूप से विद्यमान था । हिन्दुओं का बहुत बड़ा भाग उन अछूतों का था , जिन्हें मानवता के प्राथमिक अधिकार भी प्राप्त नहीं थे । महर्षि दयानन्द सरस्वती तथा आर्य समाज का यही प्रयत्न था , कि हिन्दुओं की इन बुराइयों को दूर किया जाए , और उन्हें संगठित कर उन में शक्ति का संचार किया जाए । खिलाफत – आन्दोलन के कारण मुसलिम साम्प्रदायिकता का जो उग्र रूप प्रकट होने लगा था और हिन्दू जिस प्रकार के नृशंस अत्याचारों से पीड़ित होने लग गये थे , स्वामी श्रद्धानन्द को उससे हिन्दू संगठन की आवश्यकता अनुभव हुई । स्वाभाविक रूप से उनका ध्यान हिन्दू – सभा की ओर गया । उन्हें आशा थी , कि हिन्दुओं के इस अखिल भारतीय संगठन का उपयोग इस जाति में नव चेतना उत्पन्न करने के लिए किया जा सकेगा । वह हिन्दू महासभा में सम्मिलित हो गये , और उसे अाधार बनाकर हिन्दू संगठन का कार्य शुरू कर दिया । ११ जुलाई , सन् १९२३ को उन्होंने अपना दौरा शुरू किया और उत्तरप्रदेश , बिहार , बंगाल और पंजाब के ३२ स्थानों पर स्वयं गये , और जहाँ स्वयं नहीं जा सके , वहाँ पण्डित नेकीराम शर्मा और स्वामी रामानन्द को भेजा । अगस्त मास में वाराणसी में हिन्दू महासभा का वार्षिक अधि वेशन था । उसमें सम्मिलित होने के लिए उन्होंने सब स्थानों से प्रतिनिधियों को तैयार किया ।
इस अधिवेशन की सफलता का अधिकांश श्रेय स्वामीजी को ही था । वह चाहते थे , कि महासभा हिन्दुनों में बद्धमूल कुरीतियों के निवारण तथा सुधार के लिए ऐसा क्रान्तिकारी व प्रगतिशील कार्यक्रम निर्धारित करे , जिससे इस जाति में नवजीवन एवं शक्ति का संचार हो जाय । पर उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई । वाराणसी से लौटकर स्वामी जी ने लिखा था – ‘ ‘ मेरी इच्छा थी कि हिन्दू महासभा के गत अधिवेशन में और अधिक पूर्ण सफलता प्राप्त होती । यदि अस्पृश्यता का पाप धुल जाता और विधवाओं के पुनर्विवाह की रुकावट एकदम उठा दी जाती , तो मुझको अधिक संतोष होता । यदि आग्रह किया जाता , तो दोनों प्रस्ताव बहुत अधिक सम्मति से अवश्य स्वीकृत हो जाते , परन्तु आदरणीय सभापति पण्डित मालवीयजी की सम्मति को मानते हुए मैंने काशी के ब्राह्मण पण्डितों को एक और अवसर देना उचित समझा , जिससे वे स्वयं जनता का हित करते हुए हिन्दू जाति का सम्मान प्राप्त कर सकें । मुझको यह जानकर बड़ा दुःख और निराशा हुई कि दलित भाइयों को महासभा के मंच पर से भाषण नहीं करने दिया गया । ” पर हिन्दू महासभा ने न केवल मलकाना राजपूतों को ही अपितु ब्राह्मण , वैश्य , गूजर , जाट आदि सभी को , जो रीति – रिवाज तथा संस्कारों से तो हिन्दू थे , पर नाम को मुसलमान थे , अपनी – अपनी बिरादरियों में सम्मिलित करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत कर लिया था ।
स्वामी जी की यह महान् विजय थी । जिस प्रयोजन से वह हिन्दू महासभा में सम्मिलित हुए थे , वह आंशिक रूप से सफल हो गया था । सन् १९२४ में हिन्दू महासभा का वार्षिक अधिवेशन कलकत्ता में हुआ । लाला लाजपतराय उसके सभापति थे । उसमें दलितोद्धार के पक्ष में एक प्रस्ताव स्वीकृत कराने में स्वामी जी को सफलता प्राप्त हुई थी । पर वह इतने से सन्तुष्ट नहीं थे । वह चाहते थे , कि छुआछूत सदृश बुराई हिन्दुनों से समूल नष्ट हो जाय । इसके लिए वह अत्यन्त प्रगतिशील उपायों के अवलम्बन के पक्ष पाती थे । इसीलिए उन्होंने ‘ अर्जुन ‘ और ‘ तेज ‘ नाम से दो दैनिक पत्रों का हिन्दी और उर्दू में प्रकाशन प्रारम्भ कराया ( सन् १९२३ में ) , और बाद में ( एप्रिल , १९२६ ) ‘ लिबरेटर ‘ नाम से एक अंग्रेजी साप्ताहिक भी निकाला । इन पत्रों द्वारा स्वामीजी हिन्दू संगठन के लिए सशक्त आन्दोलन करने में तत्पर थे । स्वामी श्रद्धानन्द देर तक हिन्दू महासभा में सम्मिलित नहीं रह सके । वह जिस ढंग से दलितोद्धार सदृश क्रान्तिकारी सुधार – कार्यों के लिए आन्दोलन कर रहे थे , पुराने ढंग के कट्टर सनातनी हिन्दुओं को वह पसन्द नहीं था । उसमें उन्हें आर्यसमाज की बू आती थी । स्वामी जी के कार्यकलाप के सम्बन्ध में उनकी मनोवृत्ति जगद्गुरु शंकराचार्य भारतीकृष्ण तीर्थ के निम्नलिखित कथन से स्पष्ट हो जाती है — ” सनातन धर्म के नाम पर आर्यसमाज का काम होता है । लोगों को शुद्ध करके यज्ञोपवीत देकर ब्राह्मण बनाया जाता है । हमें धोखा देकर ऐसा काम किया जाता है । ” सनातन धर्म के अनेक प्रमुख व्यक्ति हिन्दू शुद्धि सभा ‘ के कार्य को भी आशंका की दृष्टि से देखते थे । उसे भी वे आर्य समाज के प्रचार का साधन समझते थे । इसीलिए उन्होंने ‘ हिन्दू पुनःसंस्कार सम्मेलन ‘ के नाम से एक पृथक् संगठन का निर्माण किया । हिन्दू महासभा के प्रधान नेता उस समय पण्डित मदनमोहन मालवीय और दरभंगा के महाराजा श्री रामेश्वर सिंह थे ।
अछूतोद्धार और विधवा – विवाह का जिस रूप में स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा समर्थन किया जा रहा था , वे उससे सहमत नहीं थे । यही कारण है , कि हरयाणा प्रान्तीय हिन्दू कान्फरेन्स ( १९२५ ) में जब विधवा – विवाह के सम्बन्ध में प्रस्ताव प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया , तो मालवीय जी ने धमकी दी कि यदि इस प्रस्ताव के लिए आग्रह किया गया तो वह अपने साथियों के साथ कान्फरेन्स से चले जाएंगे । उसी वर्ष जब दिल्ली में हिन्दू महासभा का वार्षिक अधिवेशन हुआ , तो उसमें भी मालवीय जी ने विधवा – विवाह के समर्थन में प्रस्ताव को पेश नहीं होने दिया । शीघ्र ही , स्वामी श्रद्धानन्द ने अनुभव कर लिया , कि महासभा के साथ रहकर व उसके माध्यम से हिन्दू संगठन एवं समाज – सुधार का कार्य नहीं कर सकते । उन्होंने यही उचित समझा कि हिन्दू महासभा से पृथक् होकर कार्य करें । त्याग पत्र देकर वह उससे पृथक् हो गये , और उन्होंने हिन्दुओं के सामाजिक , धार्मिक एवं नैतिक जो अभागा सुधार का कार्य पूर्ण उत्साह से प्रारम्भ कर दिया । हिन्दू जाति जात – पात के भेदभाव और छुआछूत की भावना से ग्रस्त एक बिखरी हुई निर्बल जाति थी । उनमें अपने ‘ एक ‘ होने की अनूभूति का अभाव था । स्वामी श्रद्धानन्द उसे संगठित करना चाहते थे ।
हिन्दू संगठन के जिस आन्दोलन को अब उन्होंने प्रारम्भ किया , उसके प्रयोजन को ‘ अर्जुन ‘ के एक लेख में उन्होंने इस प्रकार प्रकट किया था— “ पाँच हजार वर्षों से दीन अवस्था को प्राप्त होते – होते गत एक हजार वर्षों में तो गिरते – गिरते यह देश दासता की पराकाष्ठा को पहुँच गया था । उस गुलाम की हालत बहुत दर्दनाक है , जो अपनी दासता को अनुभव करता हुआ भी गुलामी की जंजीरों में जकड़ा जा रहा हो । यह हालत आर्य – हिन्दू समाज की मुसलमानों के शासनकाल में थी । परन्तु दास अपनी अवस्था में ऐसा सन्तुष्ट हो जाय कि उसी को जीवन का स्वाभाविक आदर्श समझने लग जाय , उसकी अवस्था को जाहिर करने के लिए कोई शब्द ढूंढने से ही मिलते । अंग्रेजों ने जहाँ भाई – भाई को लड़ाकर सारा देश काबू कर लिया , वहाँ कुछ काल के अनुभव से ही सन् १८५७ ईसवी के विप्लव के पीछे , महारानी विक्टोरिया के घोषणापत्र के रूप में हिन्दियों को सोने की जंजीरें पहना दी । साथ ही अपनी शिक्षा विधि द्वारा ऐसा क्लोरोफार्म संघाया कि गुलाम जंजीरों को आभूषण समझने लगे । फिर अपनी हालत में ऐसे मस्त हुए कि हिलने – जुलने की जरूरत ही नहीं समझी । हिन्दियों में से मुसलमानों ने तो फिर भी अपनी हस्ती कायम रखी , परन्तु हिन्दुओं ने अपने अस्तित्व को ही भुला दिया । पचपन वर्ष हुए कि बाल ब्रह्मचारी ने मूच्छित आर्य जाति को जगाने का यत्न किया । कुछ हलचल भी हुई , परन्तु मुट्ठीभर व्यक्तियों के सिवाय बाकी सब खर्राटे ही भरते रहे । उसी नशे में चूर हिन्दू समाज की आँखें जब महात्मा गांधी ने खोलीं , तो अपनी विवशता को भूलकर उन्होंने पहले स्वयं साधन सम्पन्न बनने के स्थान में अपने मुसलमान भाइयों की रहनुमाई का दावा कर दिया । स्वार्थ इस प्रतिज्ञा की जड़ में था । इसलिए महात्मा गांधी के जेल जाते ही हिन्दुओं ने मुंह की खाई । तब परमात्मा के अटल नियम ने उनकी आँखें खोलीं , जिसका परिणाम गत सवा वर्ष का धर्मयुद्ध है ।
वह दिन दूर नहीं है जब आर्य – हिन्दू समाज संघशक्ति से सुसज्जित होकर व्यक्ति और समष्टि दोनों को बलवान् बनाकर सारे संसार के अन्य समाजों की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ायेगा । ” स्वामी जी ने यहाँ जिस धर्मयुद्ध का उल्लेख किया है , उससे हिन्दुओं का वह संघर्ष अभिप्रेत था , जो वे मलाबार , मुलतान , गुलबर्गा , अमेठी , सहारनपुर , कोहाट आदि के साम्प्रदायिक दंगों में मुसलमानों के अत्याचारों से आत्मरक्षा के लिए कर रहे थे। संगठन द्वारा स्वामी जी हिन्दुओं को शक्तिशाली अवश्य बनाना चाहते थे , पर मुसलमानों या किसी भी अन्य धर्म के अनुयायियों का विरोध करना उनका उद्देश्य नहीं था । मुसल मानों को उनका यह कहना था- ” मुसलमान – समाज को मैं सिर्फ एक सलाह देना चाहता हूँ । याद रखो — संगठित और शक्ति – सम्पन्न समाज का असंगठित और कमजोर समाज पर अत्याचार करना वैसा ही पाप है , जैसा कि कमजोर और कायर होना पाप है । इस लिये हिन्दुओं के संगठन और शक्ति – सम्पन्न होने में विघ्न न डालो । यदि तुम हिन्दू समाज के अस्तित्व को इस भूमि पर से मिटा सकते , तो मैं कुछ भी नहीं कहता , क्योंकि मनुष्य – समाज का यह दुर्भाग्य है कि इस वसुन्धरा का भोग वीर लोग ही कर सकते हैं । साथ ही तुमको यह भी मालूम होना चाहिए कि जो समाज पाँच हजार वर्ष के निरन्तर पतन के बाद भी नष्ट नहीं हुआ उसको भगवान् ने किसी भावी हेतु से ही कायम रखा हुआ है । यदि हिन्दू समाज के अस्तित्व को नष्ट नहीं किया जा सकता , तो उसको संगठित तथा दृढ़ होने दो , जिससे यह भारतीय राष्ट्र के राजनैतिक अभ्युदय में मुसलमानों के गले का भार न होकर शक्ति का पूँज साबित हो सके । ” हिन्दू संगठन और शुद्धि के आन्दोलन का संचालन करते हुए भी स्वामी श्रद्धानन्द मुसलमानों के प्रति भ्रातृभाव रखते थे और साम्प्रदायिक मेल – जोल के प्रबल समर्थक थे । वह नहीं चाहते थे , कि ईद के अवसर पर गाय की कुर्बानी से हिन्दू लोग उद्वेग अनुभव करें और मुसलमानों का विरोध करने को उतारू हो जाएँ ।
इसीलिए सन् १९२५ में ईद के अवसर पर दिल्ली के निवासियों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने लिखा था ” परमात्मा सारे संसार का पिता है । यदि तुम्हें इस बात पर विश्वास है , तो प्राणिमात्र को मित्र की दृष्टि से देखना चाहिये , और मनुष्यमात्र को तो भाई समझना चाहिए । ‘ आज मुसलमान स्त्री – पुरुष , बाल – वृद्ध – युवा नये कपड़े पहनकर अद्वितीय ब्रह्म के आगे अपनी श्रद्धा की भेंट धरने जा रहे हैं ।
क्या यह श्रद्धा उनके अन्दर घर कर गयी है ? यदि ऐसा होगा , तो वे अपने त्यौहार पर हिन्दुओं का दिल दुखाने की कोई बात नहीं करेंगे । मेरे हिन्दु भाइयो ! आज तुम्हें भी अपने भ्रातृभाव का स्पष्ट प्रमाण देना है । परमात्मा की उपासना में अपने मुसलमान भाइयों को निमग्न देखकर प्रसन्नता से उनको आशीर्वाद दो । यदि तुम्हारी आँखों के आगे से कुर्बानी के लिए गौमाता जाती हो , तो क्रोध और द्वेष का लेश भी अपने अन्दर न आने दो , प्रत्युत परमात्मा से हार्दिक प्रार्थना करो कि वह परम पिता उनकी बुद्धियों को प्रेरणा करे , जिससे स्वयं गौरक्षा का भाव उनमें उत्पन्न हो । ” जून , १९२५ में स्वामी श्रद्धानन्द ने हिन्दू महासभा से त्यापत्र दे दिया था , और वह स्वतन्त्र रूप से दलितोद्धार , शुद्धि तथा हिन्दू संगठन के कार्यों में लग गये थे । इससे हिन्दू जनता में असाधारण चेतना उत्पन्न होने लगी , और ऐसे लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती गयी , जो हिन्दू जाति की दुर्दशा और निर्बलता को अनुभव करते थे और साथ ही उसे सशक्त बनाने के लिए स्वामी जी द्वारा प्रतिपादित उपायों को स्वीकार करने के लिए उद्यत थे । कट्टर व संकीर्ण साम्प्रदायिक मनोवृत्ति वाले मुसल मानों का इससे क्षुब्ध होना स्वाभाविक था ।
सन् १९२२-२५ के काल में भारत के विविध प्रदेशों में जो अनेक हिन्दू – मुसलिम दंगे हुए , वे इसी क्षोभ के परिणाम थे । मुसलमानों को यह सहन नहीं हुआ , कि हिन्दू लोग केवल अछूतों को ही नहीं , अपितु नौमुसलिमों को भी अपने समाज में सम्मिलित कर लें , और जात – पाँत के संकीर्ण भेदभावों को भुलाकर एक संगठन में संगठित हो जाएँ । यदि ईसाइयों और मुसलमानों को यह अधिकार था , कि अन्य लोगों को अपने धर्म में दीक्षित कर सकें , तो हिन्दुओं को यह अधिकार क्यों नहीं था ? यदि निर्बलता , प्रमाद या संकीर्णतावश गत समय में हिन्दुओं ने अपने इस अधि कार का प्रयोग नहीं किया , तो भविष्य में इसे प्रयुक्त करने से उन्हें कैसे रोका जा सकता था ? साम्प्रदायिक उपद्रवों के कारण भारत के सार्वजनिक जीवन में जो वातावरण उत्पन्न हो गया था , महात्मा गांधी उससे बहुत चिन्तित थे । १८ मई , १९२४ को उन्होंने ‘ यंग इण्डिया ‘ में एक लेख लिखा , जिसमें साम्प्रदायिक विद्वेषभाव के कारणों का विवेचन करते हुए आर्यसमाज को उसके लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी ठहराया ।
सत्यार्थप्रकाश और महर्षि दयानन्द पर भी इस लेख में अनेक आक्षेप किये गये ” मैंने आर्यसमाजियों की बाइबल सत्यार्थप्रकाश को पढ़ा है । मैंने इतने बड़े सुधारक का ऐसा निराशाजनक ग्रन्थ आज तक नहीं पढ़ा ।
स्वामी दयानन्द ने सत्य और केवल सत्य पर खड़े होने का दावा किया है , परन्तु उन्होंने अनजाने में जैन धर्म , इस्लाम धर्म , ईसाइयत स्वयं हिन्दू धर्म को अशुद्ध रूप से प्रकट किया है । उन्होंने पृथिवीतल पर अत्यन्त सहिष्णु और स्वतन्त्र सम्प्रदायों में से एक ( हिन्दू सम्प्रदाय ) को संकुचित बनाने का प्रयत्न किया है । आप जहाँ कहीं भी आर्यसमाजियों को पाएँगे , वहाँ जीवन और जागृति मिलेगी । परन्तु संकुचित विचार और लड़ाई – झगड़े की पादत से वे अन्य सम्प्रदायवालों से लड़ते रहते हैं , और जहाँ ऐसा नहीं वहाँ स्वयं आपस में लड़ते रहते हैं । स्वामी श्रद्धानन्द जी को भी इसका अधिकांश भाग मिला हुआ है , परन्तु इन सब त्रुटियों के होते हुए भी मैं उन्हें ऐसा नहीं समझता जिसके लिए ( सुधार की ) प्रार्थना न की जा सके । ” महात्मा गांधी के इस लेख से मुसलमानों को बहुत बल मिला । जनता की गांधी जी में अगाध श्रद्धा थी । सब कोई यह समझने लगे , कि देश में जो साम्प्रदायिक समस्या उत्पन्न हो गयी है , उसके लिए आर्य समाज और उसके नेता प्रधानतया उत्तरदायी हैं । आर्यसमाज की ओर से गांधी जी द्वारा किये गये आक्षेपों के उत्तर में अनेक लेख लिखे गये और आर्य विद्वानों के एक डेपुटेशन ने उनसे भेंट भी की।
इसपर महात्मा गांधी ने आंशिक रूप से उस भ्रम के निराकरण का कुछ प्रयत्न भी किया , जो उनके लेख से उत्पन्न हो गया था । पर जो तीर छूट चुका था , उसे वापस ले सकना सम्भव नहीं था । स्वामी श्रद्धानन्द और आर्यसमाज द्वारा जो कार्य शुद्धि और हिन्दू संगठन के लिए किया जा रहा था , मुसल मान उससे उनके प्रति उग्र विरोधभाव पहले ही रख रहे थे , अब गांधी जी का आश्रय पाकर उसमें और अधिक वृद्धि हो गयी ।

