कोटा से 30 किलोमीटर दूर छोटा से गांव का राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय । दृश्य था छोटी – छोटी बच्चियाँ कंप्यूटर कक्ष के बाहर कतार में लगी थी। जिज्ञासा वश एक बालिका से पूछ लिया तुम्हारा नाम क्या हैं ? बोली मेरा नाम आशिया है। फिर प्रश्न किया बिटिया यहां क्यों खड़े हो तुम ? बोली हम यहां कंप्यूटर पर खेलते हैं। मुझे विद्यालय अवलोकन करवाने साथ गई प्रधानाचार्या डॉ. वैदेही गौतम ने बताया , ” हमारे विद्यालय में कंप्यूटर शिक्षा है। आपने कोटा में बच्चों को साहित्य से जोड़ने के लिए मिशन बाल मन चला रखा है। मैंने कुछ समय पूर्व यहां चार्ज संभाला है। मैने सोचा आज कम्प्यूटर भी साहित्य का अभिन्न हिस्सा बन गया है तो छोटी – छोटी बच्चियों को भी क्यों न इस से जोड़ा जाए। यह विचार आया तो बच्चें प्रेरित हुए और इन कक्षा 3 की बच्चियों की कुछ ही समय में कंप्यूटर से दोस्ती हो गई है।
हमारी बात चल रही थी, इस बीच कंप्यूटर सीखने वाली टीचर गायत्री सुमन भी पास आ गई। मैंने उनको कहा चलो बच्चियों को कंप्यूटर पर बैठाओ देखते हैं क्या करती हैं ? अब क्या था कतार में खड़ी बच्चियां आगे बढ़ी और कंप्यूटर के सामने बैठ गई। अल्प समय में सीखे ज्ञान से उन्होंने नीचे झुक कर सीपीयू का बटन दबा कर स्क्रीन चालू कर लिया। देखते – देखते देवा, अंतिमा, इशिका ने तो कमांड दे कर गेम खोल लिया और खेलना शुरू कर दिया। कृष्णा,हेमलता,आशिया को टीचर में कमांड दे कर आगे बढ़ने को कहा। कुछ बच्चियाँ वहीं कक्ष के मध्य बिछावन पर बैठ कर इन सब को देखने लगी।
नन्हीं-नन्हीं बच्चियों के नन्हें-नन्हें हाथ की बोर्ड पर मचल रहे थे और वे गेम खेलने लगे। मेरे मुंह से निकल पड़ा, वाह वैदेही जी बहुत खूब , खेल का खेल और इस उम्र में तकनीक से बच्चियों को जोड़ने की पहल।
सीढ़ियां उतर कर नीचे आए । कुछ ही देर में बच्चियाँ को मध्यान्ह पोषाहार परोसा गया। यह देख मेरे मन का जन संपर्क अधिकारी जाग उठा जब मैं विद्यालयों में बड़े अधिकारियों के साथ पोषाहार निरीक्षण के लिए जाता था। वैदेही जी से कहा मुझे भी पोषाहार चखाएं , देखता हूं यहां बच्चियों को कैसा भोजन दिया जाता है ?
पोषाहार पकाने वाली रेखा जी ने मुझे एक थाली में रोटी , दाल और रसे की आलू की सब्जी परोस दी। पोषाहार चखा तो उसकी उसकी गुणवत्ता से गदगद हो गया। रेखा ने बताया साहब हम तो अपने बच्चे समझ कर अच्छे से पकाते हैं। हर दिन बदल-बदल कर मीनू के अनुसार पोषाहार बनाते हैं । जब से ये मैडम आई हैं पूरा ध्यान देती हैं और कहती है इन्हें अपने घर की बच्चियाँ समझें।
विद्यालय बहुत बड़ा नहीं पर दुमंजिला और साफ सुथरा है। भवन निर्माण में गढ़ेपान कंपनी का सहयोग प्राप्त हुआ है। यहां 350 बच्चियाँ शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। अधिकांश बच्चियाँ आर्थिक दृष्टि से कमजोर परिवारों की हैं। इन बच्चियों को साहित्य, संस्कृति और तकनीक से जोड़ने के वैदेही जी प्रयासरत हैं।
आपके मन में विचार आना स्वाभाविक है मैं अचानक 10 दिसंबर को इस विद्यालय में कैसे पहुंच गया। प्रयोजन था मिशन बाल मन तक अभियान के समापन कार्यक्रम की रूपरेखा को अंतिम रूप प्रदान करना। कार्यक्रम पर विस्तार से विचार विमर्श हुआ, स्थान देखा और तय हुआ कि विद्यालय के सहयोग से 15 दिसंबर को परिसर में समापन कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। समारोह का नाम करण ” बाल रंगोत्सव ” तय किया गया।

– डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार,कोटा

