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उस युवा जोड़े को खुश देखकर रामानंद सागर ने भी अपनी मौत को मात दे दी

वो मई 1941 का कोई दिन था। 24 साल का एक नौजवान कश्मीर के टंगमर्ग में मौजूद एक टीबी हॉस्पिटल के बिस्तर पर लेटा अपनी मौत का इंतज़ार कर रहा था। टीबी उन दिनों एक लाइलाज बीमारी हुआ करती थी। और तंगमार्ग के उस टीबी अस्पताल में भर्ती अधिकतर मरीज़ जीवित वापस नहीं जा पाते थे। वो खामोशी और उदास मन से अपनी मौत का इंतज़ार करते थे। एक दिन वो नौजवान अस्पताल की खिड़की के बाहर झांक रहा था जब उसने देखा कि एक युवा जोड़ा टीबी अस्पातल से खुशी-खुशी बाहर जा रहा था। जानकारी की तो पता चला कि वो दोनों पति-पत्नी थे उन्हें टीबी से मुक्ति मिल गई थी। और वो अपने घर वापस जा रहे थे इसलिए बहुत खुश थे।
उस जोड़े को देखकर नौजवान की आंखों में आंसू आ गए। उस नौजवान ने खुद से वादा किया कि वो भी इस अस्पताल से सेहतमंद होकर वापस अपने घर जाएगा। उस वक्त उस नौजवान को भी पता नहीं था कि उसे तो वाकई में उस मौत के घर(टीबी अस्पताल) से ज़िंदा वापस जाना है। क्योंकि ईश्वर ने उसे रामायण को टीवी के ज़रिए भारत के घर-घर में पहुंचाने के लिए दुनिया में भेजा था। उस नौजवान का नाम था रामानंद सागर।
लेकिन रामानंद सागर को टीबी लगा कैसे? रामानंद सागर के पुत्र प्रेम सागर किताब “एन एपिक लाइफ- रामानंद सागर: फ्रॉम बरसात टू रामायण” में लिखते हैं कि 19-20 साल की उम्र में लाहौर में अपने संघर्ष के दिनों में रामानंद सागर क्लैपर बॉय की हैसियत से “रेडर्स ऑफ द रेल रोड” नामक एक फिल्म में काम कर रहे थे। वो फिल्म 1936 में रिलीज़ हुई थी। उस वक्त तक टॉकी फिल्मों का निर्माण बड़े पैमाने पर शुरू हो चुका था। मगर “रेडर्स ऑफ द रेल रोड” एक साइलेंट फिल्म थी। उसकी हीरोइन थी उषा।
फिर 1940 की फिल्म कोयल में बतौर हीरो रामानंद सागर ने काम किया। उनकी हीरोइन थी नीलम। वो फिल्म रोशनलाल शौरी ने डायरेक्ट की थी। उसके बाद दलसुख पंचोली की फिल्म कृष्णा में उन्होंने अभिमन्यू का किरदार निभाया। जहां पहली फिल्म कोयल फ्लॉप हो गई। तो वहीं कृष्णा कभी रिलीज़ ही नहीं हो सकी। माना जाता है कि एक्ट्रेस नीलम को टीबी था। उन्हीं से रामानंद सागर को भी टीबी लग गया।
उस वक्त रामानंद सागर को फिल्म इंडस्ट्री में कोई कामयाबी नहीं मिल सकी। नतीजा, उनके अगले दो साल बड़े कठिनाईयों में गुज़रे। फिल्म इंडस्ट्री छोड़नी पड़ गई। फिर तो कभी रामानंद सागर ने सुनार की दुकान पर काम किया, कभी एक ऑफिस में पियोन की नौकरी की, कभी साबुन बेचने का काम किया तो कभी ट्रक क्लीनर भी बने। ये सब काम करना उनकी मजबूरी थी। इस समय तक वो शादीशुदा थे और उनके घर एक बेटा(सुभाष सागर) भी जन्म ले चुका था। ऐसे में घर चलाने के लिए पैसा तो हर हाल में चाहिए ही था। दिन में रामानंद सागर काम करते थे। और रात को पढ़ाई करते थे। वो पंजाब यूनिवर्सिटी से मुंशी फज़ल की पढ़ाई कर रहे थे। मेहनत से पढ़ाई करते थे। इसलिए गोल्ड मेडल के साथ पास हुए थे।
एक दिन रामानंद सागर ने गौर किया कि थोड़ी सी मेहनत करने पर उनकी सांस फूलने लगती है। कमज़ोरी आ जाती है। मगर उनकी चिंता बढ़ी तब जब एक दिन उन्हें खांसी में ख़ून आया। वो डॉक्टर मल्होत्रा(जो उनके फैमिली डॉक्टर थे) से मिले। डॉक्टर मल्होत्रा ने उनका एक्स-रे कराया। पता चला कि रामानंद को टीबी हो गया है। परिवार में मातम पसर गया। टीबी के मरीज़ों की जान बचने की संभावना उन दिनों बहुत कम हुआ करती थी। टीबी के चंद ही अस्पताल थे तब देश में। जिनमें से एक कश्मीर के तंगमार्ग में मौजूद था। पिता लाला दीनानाथ चोपड़ा को बेटे रामानंद को लेकर वहां जाना ही पड़ा।
रामानंद सागर के पुरखे कश्मीर से ही थे। वो कश्मीर के धनाढ्य लोगों में से थे। ज़मींदार हुआ करते थे रामानंद सागर के पुरखे, जिनकी ज़मींदारी पांच सौ एकड़ ज़मीन पर थी। कई गांव उनकी ज़मीदारी में बसे हुए थे। रामानंद सागर के पड़दादा लाला शंकर दास श्रीनगर के सबसे रईस व्यक्ति हुआ करते थे। उन्हें नगर सेठ कहा जाता था। कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह के दरबार के वो अहम व्यक्ति थे। उनके पुत्र महाराजा प्रताप सिंह के दरबार में भी उनका रुतबा था। मगर रामानंद सागर के जन्म तक उनके पुरखों की अधिकांश ज़मीनें व वैभव खत्म हो चुका था।
टीबी अस्पताल में किसी वक्त पर अपनी मृत्यु का इंतज़ार कर रहे रामानंद सागर उस दिन उस युवा जोड़े को वहां से स्वस्थ होकर जाते देख उम्मीदों से भर गए थे। उन्होंने टीबी अस्पताल के अपने तजुर्बों को एक डायरी में लिखना शुरू कर दिया। 3 सितंबर 1941 को टीबी अस्पताल में ही रामानंद सागर को अपने घर से एक चिट्ठी मिली। चिट्ठी में लिखा था,”बुधवार के दिन तुम्हारे घर एक बुद्धू पैदा हुआ है।”
दरअसल, रामानंद सागर की पत्नी लीलावती ने उनके तीसरे बेटे आनंद सागर को जन्म दिया था। ये खबर टीबी अस्पताल में भर्ती अन्य मरीज़ों को भी पता चली। और सभी ने खुशी मनाई। दुनिया के एक बड़े हिस्से में तब दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था। मगर कश्मीर के तंगमार्ग के टीबी अस्पताल(जिसे मृत्यु का घर भी कहा जाता था।) में अपने साथी मरीज़ के घर बेटा पैदा होने की खुशी मनाई जा रही थी।
इलाज करा रहे कई लोग अस्पताल के पास के इलाकों में मौजूद गन्ने व मक्का के खेतों में गए। सभी ने अपने शरीर को कंबल से अच्छी तरह ढक रखा था। खेत में ही एक जगह आग जलाई गई और भुट्टे तोड़कर उन्हें भूना गया। गन्ने चबाए गए। इस तरह रामानंद सागर के तीसरे बेटे(सुभाष सागर व शांति सागर के बाद आनंद सागर का जन्म हुआ था।) के जन्म की खुशियां मनाई गई।
आज 12 दिसंबर को रामानंद सागर जी की पुण्यतिथि है। साल 2005 में आज ही के दिन रामानंद सागर जी का देहांत हुआ था। यानि आज 20 साल हो गए रामानंद सागर जी को इस दुनिया से गए।
नोट- ये पूरी कहानी रामानंद सागर जी के पुत्र प्रेम सागर जी द्वारा लिखित पुस्तक “एन एपिक लाइफ- रामानंद सागर: फ्रॉम बरसात टू रामायण” से ली गई है। प्रेम सागर जी भी अब इस दुनिया में नहीं रहे। इसी साल 31 अगस्त को प्रेम सागर जी का देहांत हो गया था। किस्सा टीवी उन्हें भी नमन करता है। #ramanandsagar #Premsagar

साभार- https://www.facebook.com/share/p/1AMh4J6tsi/ से

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