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पाकिस्तान में जिस मोहता परिवार ने ये महल बनवाया, वो इसमें नहीं रह पाए

आपने कभी सोचा है कि आज आज़ाद भारत में अपने ख़ुद के मंदिर आदि को वापस लेने के लिए हिंदू समुदाय को इतना स्ट्रगल करना पड रहा है तो सरहद पार पाकिस्तान में हिंदू समुदाय की कितनी जायदाद मंदिर आदि लूटे और क़ब्ज़ाए गए होंगे। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि महज़ दस वर्ष पूर्व पाकिस्तान के कराची शहर में बचेखुचे हिंदू समुदाय ने दो जायदाद वापस लेने हेतु एक लड़ाई लड़ी। लड़ाई उन्हें हारनी थी ही- दोनों जायदाद वापस नहीं मिली- बल्कि उन्हें चेतावनी दें जीने दिया गया।
आज आपको इतिहास में छिपे एक ऐसे हिंदू बदनसीब सेठ से रूबरू करवाते है जिनकी कहानी सुन आप चौंक जायेंगे- सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि समुदाय विशेष माल ए गनीमत क़ब्ज़ाने में किस कदर आमादा था और है।
उन्नीसवीं शताब्दी में बीकानेर राजस्थान से एक मारवाड़ी परिवार मोहता सेठ के सदस्य अखंड भारत के अलग अलग हिस्सों में व्यापार करने गए। कलकत्ता, मद्रास, आंध्र, कराची आदि अनेक शहरों में मोहता सेठ के मेम्बरन ने व्यापार में अपना झंडा गाड़ा। कराची में इस मोहता परिवार के लोगों ने अपार सफलता प्राप्त की। कराची में हिंदू जिमख़ाना की इमारत भी इसी मोहता परिवार के एक सेठ ने बनवाई। इसी इमारत को बंटवारे में समुदाय विशेष ने हथिया लिया- जो हिंदू सम्पत्ति थी। आज तक इस हथियाई जायदाद को वापस नहीं किया गया। यह थी जायदाद नंबर एक- जिसको वापस लेने की लड़ाई २०१३ तक लड़ी गई थी।
मोहता वंश के सेठ शिवरतन मोहता कराची के टॉप बिजनेसमैन थे- इनका काम था साबुन के कारखाने। इनके बनाये पाम आयल के साबुन की समूचे भारत में जबरदस्त मांग थी। सेठ शिव रतन ना केवल टॉप व्यापारी थे बल्कि अकूत दौलत के मालिक और अनेक दीनी राजनेताओं के मित्र भी थे।
१९२० में सेठ शिव रतन की पत्नी बहुत बीमार पड़ी- डॉक्टर ने सलाह दी यदि ये किसी ऐसे स्थान पर रहें जहाँ समुद्र की हवा इन्हें मिलती रहे तो इनका स्वस्थ होना मुमकिन है। सेठ शिव रतन ने कराची में समुद्र से लगे क्लिफ्टन एरिया में १८ हज़ार वर्गफ़ुट का एक महल बनवाया। तीन मंजिल का ये महल कराची का सबसे सुंदर विशाल और अद्भुत नगीना था। हर मंजिल का आर्किटेक्चर अपने आप में अनूठा रहा। आर्किटेक्चर और इस इमारत पे यदि लिखा तो पोस्ट सुरसा के मुख भांति बढ़ती जाएगी।
इस मोहता महल की छत पर सेठ जी ने एक विशाल शिव मंदिर का निर्माण करवाया- मंदिर के ठीक बाजू में बीमार सेठानी का शयन कक्ष था। छत से ना केवल समुद्र दिखाई देता बल्कि समुद्र की हवा भी खूब आती। सेठानी कुछ साल इस माहौल में और जी गई। सेठ को लोगों ने शाहजहाँ की उपाधि दी जिन्होंने अपनी पत्नी के लिए इतना शानदार महल जो बनवाया था।
फिर १९४७ का वर्ष आया- जहाँ समस्त हिंदू समुदाय हिन्दुस्थान जाने को बेताब था- वही सेठ शिवरतन ने कराची में रुकने का फ़ैसला किया। अपार जायदाद और इस महल को छोड़ कर जाना मुमकिन ना था। ऊपर से सेठ साहब जिन्ना के घनिष्ठ मित्र भी थे। तो सेठ साहब को किसी प्रकार का ख़तरा ना था। वो बंटवारे के कुछ महीने बाद तक अपने महल में आराम से रहते रहें।
फिर अचानक एक दिन पाकिस्तानी फौज ने उनके महल पर दस्तक दी- कहा- तुम्हारा ये घर सरकार अधिग्रहण कर रही है- इसे खाली कर निकल जाओ। अब यहाँ एक बड़ी हस्ती रहेगी। हक्के बक्के सेठ शिवरतन ने लाख दुहाई दी- रोये गिड़गिड़ाए । उसी दिन कराची में एक फंक्शन था जहाँ मंच पर जिन्ना के बगल में सेठ शिवरतन भी बैठे थे। सेठ साहब ने मंच से खुलेआम जिन्ना से गुहार लगाई- प्रार्थना की मेरा घर मुझ से ना छीनो। जिन्ना ने दो टूक जवाब दिया- ये मुल्क का मुआमला है।हम कुछ नहीं कर सकते।
अगले दिन मोहता महल सेठ जी से खाली करवा लिया गया। सेठ जी ने पूछा- ये तो बता दो, कौन हस्ती मेरे महल पे दाँत गड़ाए बैठी है। सेठ साहब को कोई उत्तर ना मिला। सेठ साहब इसके बाद वहाँ ना रुके- सीधे हिंदुस्थान आ गए। जीवित लौट आए थे- ये बहुत बात थी।
ये मोहता महल थी दूसरी जायदाद जिसको वापस लेने की लड़ाई कराची के हिंदू समुदाय ने २०१४ तक लड़ी। नाकामयाब हुए।
लेकिन मोहता महल की कहानी यही ख़त्म नहीं हुई।
मोहता महल का क़ब्ज़ा मिला जिन्ना परिवार को। जिन्ना की बहन फातिमा को ये महल पसंद आ गया था- तो जिन्ना परिवार ने इस माल ए गनीमत को क़ब्ज़ा लिया।
जिन्ना की मौत के बाद जब फ़ातिमा जिन्ना जनरल अयूब ख़ान से टक्कर ले रही थी- तो इसी मोहता महल में वो अकेली रहती थी। साठ के दशक में अकेली बुढ़िया जिन्ना जो अविवाहित थी- बिना बाल बच्चे वाली थी- इस विशाल इमारत में अकेली रहती थी। दूसरी मंजिल पे एक बेडरूम में सोना- सोने से पहले नीचे का मुख्य द्वार लॉक कर देती। सुबह उठ छज्जे से चाबी नीचे गिराती जिसे उठा ख़ादिम मुख्य द्वार खोलता – उसके लिए चाय नाश्ता आदि लेके अंदर जाता। ये फ़ातिमा का दैनिक क्रम था।
और फिर एक दिन- फ़ातिमा जिन्ना ने चाबी नीचे नहीं फेंकी। ख़ादिम ने भी ध्यान नहीं दिया। दोपहर धोबी आया- महल बंद था। फिर हल्ला मचा- फ़ातिमा बी दरवाज़ा क्यों नहीं खोल रही है। जैसे तैसे दरवाज़ा खोला गया- पाया फ़ातिमा अपने बेडरूम में बीस घंटे पहले मृत पड़ी था- चेहरे पे सूखे आँसू थे। ठीक वैसे ही आँसू जो सेठ शिवरतन के चेहरे पर थे- जब उन्हें मोहता महल से भगाया गया था।
फ़ातिमा की मौत के बाद इस महल को जिन्ना परिवार से पाकिस्तानी सरकार ने ख़रीद किया- इसे एक म्यूजियम में तब्दील कर दिया। आज भी मोहता महल कराची में ठीक वैसे ही खड़ा है जैसे सेठ जी ने बनवाया था। बस टॉप फ्लोर का मंदिर अब वहाँ नहीं है। शिव प्रतिमा नहीं है। घंटे नहीं है। शेष है तो बस माल ए गनीमत।
आप इधर मंदिरों के अस्तित्व के सबूत देते रहिए, टीवी पे डिबेट करते रहिए। फेसबुक पर सबूत के तौर पर किताबों के पन्ने लाइन नंबर आदि लिखते रहिए- स्क्रीन शॉट डालते रहिए। मोहता महल जैसी ना जाने कितनी इमारत है जिनका इतिहास सबूत आदि आज भी सीना ताने खड़ा है लेकिन कोई सुनवाई नहीं है।
साभार Mann Jee जी के फेसबुक वाल से
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