Homeमन की बातभारतीय मानस को औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त करने की आवश्यकता

भारतीय मानस को औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त करने की आवश्यकता

समालखा ,पानीपत में आयोजित त्रयोदश राष्ट्रीय महाधिवेशन के समापन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के पालक अधिकारी आदरणीय सुरेश सोनीजी ने कहा कि,” पश्चिम केंद्रित प्रत्यय हमारे जीवन प्रणाली, शिक्षा प्रणाली, सामाजिक संरचनात्मक परिदृश्य, कार्य व्यवहार एवं राजनीतिक संस्कृति में  अति व्याप्त हैं,जबतक  औपनिवेशिक मानसिकता को विनष्ट नहीं करेंगे, तबतक  हम ‘ विकसित भारत’ एवं ‘ अग्रणी भारत’ की संकल्पना को गति नहीं दे पाएंगे”।  भारत में औपनिवेशिक मानसिकता ने राष्ट्रीय एकता, अखंडता एवं केंद्रीकरण की अवधारणा को बोझिल किया है, बल्कि सांस्कृतिक स्वतंत्रता में मंदक की भूमिका निभाया है। 1947 के पश्चात भी शिक्षा व्यवस्था, शासकीय संरचना, सामाजिक संरचना, विज्ञान एवं नवोन्मेष में  यूरोपियन दृष्टिकोण व्याप्त है। हम सभी भारतीयों को सन् 2035 तक इस औपनिवेशिक मानसिकता को त्याग करके भारतीय मानस को वीं- औपनिवेशीकरण की अवधारणा को आत्मसात करना होगा।
विभाजनकारी शक्तियां एवं औपनिवेशिक मानसिकता ‘ अग्रणी भारत’ एवं’ परम वैभव भारत’ के निर्माण में बाधक रही है। यह मूर्त शक्तियां भारत की एकता व अक्षुण्णता के लिए निरंतर   चुनौती रहे हैं । विभाजनकारी शक्तियों ने राष्ट्रीय एकता व अखंडता पर निरंतर प्रहार किया है, वही औपनिवेशिक मानसिकता ने भारत को उसकी परंपरागत प्रत्यय, धर्म की व्यापक अवधारणा एवं सनातन संस्कृति से जुड़ने नहीं दिया। सन् 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सत्ता अभिकरण में ‘ पाश्चात्य केंद्रित मानसिकता ‘ के कारण भारत के संस्कृति, विरासत ,लोकतांत्रिक संस्कृति एवं आदर्श के अनुरूप शिक्षा का  उन्नयन नहीं हो सका, शासकीय संरचना, वैज्ञानिक विकासात्मक  कारकों, नवोन्मेष ,चिकित्सा एवं विकास के ‘ नूतन प्रतिमान’ नहीं विकसित कर सका था। भारतीय मानस के विवेकी पटल पर ‘ वीं- औपनिवेशीकरण ‘ की अवधारणा का उन्नयन कर  2035 तक सशक्त करना होगा। हम सभी को हीनभावना त्यागना होगा, हमें अपने सांस्कृतिक विरासत पर  गर्व करना होगा ,अपने जीवन दर्शन में ‘ स्वदेशी’ एवं ‘ भारतीयता’ की भावना को सशक्त करना होगा ।हमें अपने संविधान को भारतीयता की भावना से आत्मसात करना होगा। भारत वैश्विक स्तर पर ‘ लोकतंत्र की जननी’ है। लोकतंत्र भारतीयों के’ डीएनए’ में  हैं।
सवाल यह है कि हम ” वि – औपनिवेशीकरण ” को कैसे भारतीय मानस के ढांचे में रूपांतरित करें ?
 भारतीय शोधार्थी एवं बुद्धिजीवी वर्ग में थॉमस बेडिंगटन मैकाले द्वारा स्थापित शिक्षा  – प्रणाली एवं औपनिवेशिक मानसिकता भारतीय मानस में गहरी जड़े जमा चुकी हैं ,जो प्रत्येक    ‘ इच्छित बदलाव’ में बाधा बनती हैं । सन् 2014 के शासकीय बदलाव एवं मजबूत इच्छा शक्ति की सरकार ने भारतीय मानस के” वि- औपनिवेशीकरण” के दिशा में कई पहल  किया है। नवोदित मेधा के लिए भारत सरकार ने   ‘ नई शिक्षा नीति- 2020 ‘ के सफल क्रियान्वयन के लिए प्रशासकीय स्तर पर सकारात्मक पहल किया है। नागरिक समाज एवं नागरिक सरकार ने भी” वि- औपनिवेशीकरण” के लिए राष्ट्रीय संकल्प लिया है। मैकाले के सोच एवं चिंतन को भारत के काल, ज्ञान ,इतिहास एवं संस्कृति से पूरी तरह  अनाछादित करना नागरिक सरकार के दूरदर्शी सोच है। नागरिक सरकार एवं सांस्कृतिक संगठनों के सद्प्रयासों से भारतीय ज्ञान- प्रणाली को पुन: स्थापित करना एवं भारतीय ज्ञान- परंपरा पर गर्व करने की आवश्यकता पर जोर दिया है, और इनका कहना है कि,”  वि- औपनिवेशीकरण “की मानसिकता भारत के विकास, आत्मनिर्भर भारत एवं विकसित भारत @ 2047 का आधार   – स्तंभ है।
 स्वतंत्रता के  पश्चात् भी सामाजिक, शैक्षणिक ,आर्थिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों पर  ‘ पश्चिमी कारकों’ का प्रभाव है, एवं भाषा, पोशाक, सांस्कृतिक पहचान एवं मूलभूत विज्ञान की अवधारणाओं की अनदेखी होती रही थीं। विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों ,बौद्धिक संस्थाओं एवं वैश्विक स्तर की विचार – विमर्श की संस्थाओं में ज्ञान एवं मेघा , योग्यता एवं  कार्य कुशलता की बजाय ‘ आंग्ल भाषा’ की जानकारी माना जाने लगा ,जिससे भारतीय युवाओं में अपने भाषा, ज्ञान ,प्रतिभा ,इतिहास एवं संस्कृति के प्रति  हीनभावना आने लगी थी।” वि – औपनिवेशीकरण” की संकल्पना को भारत सरकार ‘ राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020’ के द्वारा ‘ भाषाई समानता ‘ एवं ‘ मातृभाषा के महत्व ‘ के आधार पर उन्नयन  कर रहा है । भारतीय मानस में ” वि – औपनिवेशीकरण” के द्वारा सांस्कृतिक मूल्यों की महत्ता को बढ़ाकर भारतीय युवाओं में ‘ प्रोत्साहन’ ‘ पुरस्कार’ एवं    ‘ मनोबल ‘ के कारकों से उन्नयन करके भारत को  ‘ समग्र विकास’ एवं ‘ अग्रणी राष्ट्र ‘ के रूप में स्थापित करना होगा।
 वैश्विक स्तर पर विश्वविद्यालयों की संकल्पना भारतीय मनीषियों  एवं बौद्धिक  व्यक्तित्वों  का अनमोल देन है। योग की अवधारणा, आयुर्वेद की अवधारणा एवं वास्तु शास्त्र की अवधारणा भारतीय मेधा एवं चिंतन का देन है। वैश्विक स्तर पर काल   – गणना, ग्रह नक्षत्र पर पारंपरिक शोध एवं सांस्कृतिक विविधता में “तार्किकता” का प्रत्यय भारतीय मनीषियों  का देन है। समसामयिक स्तर पर इन अवधारणाओं का योगदान वैश्विक स्तर पर अधिक कलात्मक स्तर पर हो रहा है। यह भारत की ‘ समृद्ध गणना प्रणाली’ की  उपादेयता है। सिंधु घाटी की नगर  – नियोजन व्यवस्था ,सर्वोत्तम वस्तु कलाओं तथा मंदिरों की नक्काशी ,ऐतिहासिक विकासात्मक अवधारणा एवं सांस्कृतिक धरोहरों की समग्रता भारतीयों को वैश्विक राष्ट्र- राज्यों को  देन है।
हमारी विविधता पूर्ण सांस्कृतिक परंपरा में    ‘ सभी रंगों ‘ को सम्मान मिलता हैं।भारत के सांस्कृतिक प्रेरक व्यक्तित्व ,श्री राम जी एवं श्री कृष्ण जी श्याम वर्ण के थे, जो चारित्रिक सौंदर्य एवं  उदारता  के आदर्श थे। हमारे समाज का खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा एवं जीवन शैली प्रकृति के अनुकूल और पर्यावरण के प्रति   धारणीय है। इतिहास का काल विभाजन भी औपनिवेशिक मानसिकता का परिणाम है। हमें अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र को भी ” वि- औपनिवेशीकरण “की मानसिकता से देखना होगा। भारत ‘ सिरमौर राष्ट्र’ तभी होगा जब हम सभी अपनी संकल्पनाओं के प्रति पूरी तरह ‘ भारतीय दृष्टिकोण’ को आत्मसात करें।
भारत का विकास अंग्रेजों के आगमन से पहले हो चुका था। अंग्रेज अधिकारियों के संस्मरणों के अनुसार 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में भारत में 10000 से अधिक लौह- भट्ठियां थी, जहां तत्कालीन संयुक्त राज्य( ग्रेट ब्रिटेन) से उन्नत इस्पात बनाया जाता था। तत्कालीन भारत की शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था, कृषि, उद्योग एवं प्रौद्योगिकी विकसित थी। विद्वान इतिहासकार धर्मपाल जी ने अपने दो प्रसिद्ध पुस्तकों में  इन तथ्यों  को ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुत किया है। भारत की लोह – इस्पात तकनीकें अंग्रेजों से अधिक उन्नत थी। 18वीं एवं 10वीं सदी में  तत्कालीन समाज में  कृषि, उद्योग, सिंचाई, यातायात एवं सूती वस्त्रों के  उत्पादन के क्षेत्र में उन्नत एवं प्रगतिशील था। खाद्यान्न, दलहन, तिलहन ,फल, फूल, सब्जी, बागवानी एवं  दुग्ध उत्पादन में भारत की स्थिति तत्कालीन इंग्लैंड से बेहतर थीं। 18वीं शताब्दी के दौरान भारतीय खेती की उपज इंग्लैंड से लगभग” दोगुनी” थी। 18वीं सदी तक सूती वस्त्रो का निर्यात उच्चतर स्तर का था जिसके प्रतिक्रियास्वरूप  संयुक्त राज्य( ग्रेट ब्रिटेन) में भारतीय  वस्त्रों के निर्यात पर विरोध प्रारंभ हो गया था।18वीं सदी तक भारत में ‘ चेचक’ के टीके उपलब्ध थे।  शल्य चिकित्सा में भारत के वैद्य  यूरोपीय चिकित्सकों से बेहतर थे। इस तरह भारतीय मानस को गुलामी की मानसिकता से  मुक्ति की आवश्यकता है।
राष्ट्रपति भवन में “परमवीर दीर्घा” का निर्माण औपनिवेशिक मानसिकता के त्यागने एवं देश को मानवीय दृष्टिकोण से  जोड़ने का माध्यम है। राष्ट्रपति भवन की”  परमवीर गैलरी” में देश के नायकों  के चित्र हमारे राष्ट्र के रक्षकों  को हार्दिक श्रद्धांजलि है! वह नायक जिन्होंने अपने सर्वोच्च त्याग से  मातृ भूमि की रक्षा किए, जिन्होंने भारत की एकता व अखंडता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। राष्ट्र ने उनके अदम्य साहस एवं बलिदान के लिए कृतज्ञता व्यक्त कर रहा है।”
     मेरा सुझाव है –
1. अंतःकरण से भारतीय शिक्षा पद्धति, भारतीय चिंतकों एवं मनीषियों  के    ‘ विचारों’ को आत्मसात करना होगा;
2. प्रत्येक स्तर पर ‘ स्वदेशी शिक्षा ‘ को प्रोत्साहित करना होगा;
3. सामयिक  स्तर पर सरकार ‘ प्रतीकों ‘ को हटाकर “वि – औपनिवेशीकरण” का उन्नयन करें;
4. महामहिम ,लॉर्ड्स एवं अन्य औपनिवेशिक शब्दों को व्यक्तिगत स्तर एवं सार्वजनिक स्तर पर त्यागने की आवश्यकता है।
5. ‘ हिस मजेस्टी’ एवं ‘ हर मैजेस्टी  ‘ जैसे शब्दों की जगह  ‘ महोदय’ एवं  ‘ महोदया  ‘ का प्रयोग अंतःकरण की आवश्यकता है।
(लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना झंडेवालान, नई दिल्ली के राष्ट्रीय सचिव हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास एवं  सामयिक विषयों पर गंभीर चिंतन करते हैं )
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