संस्कृत भाषा संसार की समस्त भाषाओं में अपना विशेष एवं गौरवपूर्ण स्थान रखती है। स्वरों की रचना हमारे ऋषियों ने ऐसी दूरदर्शिता के साथ की है कि इस भाषा को बोलने से एक प्रकार का सूक्ष्म यौगिक व्यायाम होता है जिसके कारण बोलने वाले के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बड़ा उत्तम प्रभाव पड़ता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण संस्कृत को देववाणी कहा जाता है।
‘स्वर’ – ‘अ’ का उच्चारण कंठ द्वारा होने से हृदय पर प्रभाव पड़ता है अतएव जितनी बार ‘अ’ का उच्चरण किया जायेगा, उतनी ही बार हृदय का संचालन शीघ्रता के साथ होगा। इससे शरीर में रुधिर प्रवाहित होने की क्रिया हृदय से ही होती है और किसी विकृत अंग के लिये जो रुधिर जाता है उसको भेजने वाला हृदय ही है। यदि यह रुधिर इस विकृत अंग में कम मात्रा में पहुँचाता है तो उसका प्रभाव यह होगा कि रोग दूर हो जायेगा इसके विपरीत यदि रुधिर कम मात्रा में जाता है तो अंग अच्छा होने के बजाय और अधिक रोगी हो जायेगा।
“अ” स्वर प्रत्येक अंग में शुद्ध रक्त का संचार करता है। मंत्र शास्त्र में (अ) स्वर रचनात्मक शक्ति माना गया है।
‘‘आ’’ स्वर के उच्चारण से फेफड़े के ऊपरी भाग तथा सीने पर प्रभाव पड़ता है। यह उपरी तीन पसलियों को बलवान बनाता है, भोजन ले जाने वाली नली को शुद्ध तथा फेफड़ों को उत्तेजित करके उनके ऊपरी भाग को शुद्ध करता है इसके अभ्यास से दमा और खाँसी के रोग अच्छे होते हैं। इस स्वर का अभ्यास उन लोगों को तो अवश्य करना चाहिये जिन्हें क्षय रोग होने की संभावना हो और जो झुककर अँधेरे में काम करते हैं। गायक लोग जो प्राचीन भजनों में ‘‘आ’’ का उच्चारण अनेक बार करते हुए लय मिलाते हैं। इसीलिए, देखा गया है कि संगीताचार्य कम बीमार पड़ते हैं तथा शीघ्र ही स्वस्थ हो जाते हैं। (‘‘इ ई’’) के लम्बे उच्चारण का प्रभाव गले तथा मस्तिष्क पर पड़ता है। इसके उच्चारण से गले, नाक, तालु, दिल के ऊपरी भाग की क्रिया विशेष रूप से उत्तेजित होती है। कफ, बलगम एवं आंतों में जमा हुआ मल निकल जाता है जिससे श्वासेन्द्रिय की भी सफाई होती है। इसका प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है। इसका उच्चारण सिर दर्द तथा दिल के रोगों में भी लाभदायक है। जो व्यक्ति क्रोधी तथा उदासवृत्ति के होते हैं, उन पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है।
(उ-ऊ) का प्रभाव जिगर पेट और अंतड़ियों पर पड़ता है और जो स्त्रियाँ पेडू के भार के रोग से पीड़ित रहती हैं उन्हें (उ-ऊ) के उच्चारण से बड़ा लाभ होता है कितने ही दिनों का कठिन कब्ज क्यों न हो इसके द्वारा दूर किया जा सकता है। यह स्त्रियों के गर्भ के लिये भी लाभदायक होता है।
‘‘ए-ऐ’’ के उच्चारण का प्रभाव गले और श्वांस नलिका के उद्गम स्थान पर पड़ता है और गुर्दे को उत्तेजित करता है। इसका बार-बार उच्चारण मूत्र संबंधी रोगों को दूर करता तथा पेशाब उतारने में औषधि का काम करता है। इस स्वर के प्रयोग का लाभ अध्यापकों तथा देर तक बोलने वालों को होता है तथा नलियों के अंदर की लुआवदार झिल्ली को स्वस्थ बनाता है।
(‘‘ओ-औ’’) का प्रभाव उपस्थेन्द्रिय और जननेन्द्रिय पर होता है और वह उसको स्वभाविक रूप से काम करने में सहायता देता है। जब इसके उच्चारण का अच्छा अभ्यास हो जायेगा तब यह अनुभव होगा कि जो आंतें तथा नसें सुस्त थी वह खुलकर स्वाभाविक कार्य करने लगी हैं। यह सीने के मध्य भाग को उत्तेजित करता है और निमोनियाँ तथा प्लुरेसी के लिये बहुत लाभदायक है।
(अं) के उच्चारण से नासिका द्वारा ली गयी सांस के साथ जो ऑक्सीजन या प्राणवायु शरीर के भीतर जाती है वह दूषित, रुधिर को शुद्ध तथा लाल बनाती है। नासिका द्वारा सांस लेने में नासिका तथा श्वास नलिका प्रयुक्त होती है, इसलिये इन अंगों का विकार रहित एवं निरोग होना अत्यावश्यक है और इसी अभिप्राय से हमारे महर्षियों ने प्रत्येक बीज मंत्र के अंत में ‘‘म्’’ अथवा अनुस्वार को रखा है तथा उसका देर तक लम्बा उच्चारण करने का संदेश दिया है। स्वरों के उच्चारण करने में मुख खुलता है और अनुस्वार या ‘‘म’’ के उच्चारण से ओष्ठ बंद हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मानो प्रथम स्वरों के उच्चारण द्वारा शरीर के समस्त विकारों को दूर कर ‘‘म्’’ द्वारा ओष्ट रूपी किवाड़ बंद कर लिये जाते हैं जिससे यह विकार पुन: प्रविष्ट न हो सकें।
‘‘शंख’’ – हिन्दुओं के मंदिरों में दोनों समय शंख बजाया जाता है किन्तु बजाने और सुनने वाले दोनों ही यह नहीं जानते कि इसके बजाने से ध्वनि के अलावा और भी कोई फायदा है या नहीं, फिर भी धर्म समझकर बजाते हैं।
प्रोफेसर जगदीश चन्द्र जी बोस जो एक प्रसिद्ध विज्ञानाचार्यों में से एक थे, अपने प्रयोगों द्वारा वह सिद्ध कर दिखाया कि जहाँ तक शंख ध्वनि पहुँचती है वहाँ तक रोगों के अनेक कीटाणु स्वयं नष्ट हो जाते हैं और वायु शुद्ध हो जाती है। शंख बजाना आरोग्य के लिए बहुत ही अच्छा है, छुआछूत की बीमारी के समय इसे विशेष रूप से काम में लाना चाहिए। अर्थात् संक्रामक रोगों में शंख बजाना लाभदायक है। मालवा प्रान्त के ग्रामीण अंचल में एक प्रसिद्ध कहावत प्रचलित है कि-
‘‘शंख बाजे और सरला उड़े’’ अर्थात् शंख की ध्वनि से कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। भारतीय संस्कृति में यह निर्विवाद रूप से कहा गया है कि सुबह और शाम को संधियों में शंख बजाने से राक्षसगण दूर होते हैं। राक्षस शब्द का अर्थ यह है कि जिससे रक्षा की जानी चाहिये वह राक्षस है। इस अर्थ के अनुसार रोगों के कीटाणु भी राक्षस हो सकते हैं। संध्या के समय रोगों के कीटाणु पैदा होते हैं और बढ़कर पैâलते हैं। अत: उस समय शंख बजाना आरोग्य के लिये बहुत अच्छा है। अब तो पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी शोधों के द्वारा ‘शंख ध्वनि’ की महत्ता सिद्ध कर दी है।
वेदों में कहा गया है कि ‘‘अन्ताय मूक शब्दाय’’ इसलिए, यदि किसी गूँगे व्यक्ति को ३-४ घण्टे श्ांख बजवाया जाये, शंख में २४ घण्टे तक रखा रहने वाला पानी पिलाया जाये और शंख भस्म भी खिलाया जाये, साथ-साथ छोटे शंखों की माला बनाकर गले में पहना दी जाये। तो कुछ वर्षों में ईश्वर कृपा से गूँगा मनुष्य अवश्य बोलने लगेगा। ऐसा कई प्रयोगों में प्रमाणित भी हो चुका है।
हमारे देश में बच्चों के गले में छोटे-छोटे शंख छेदकर पहनाने की परम्परा रही है। इससे बच्चे शीघ्र बोलने लग जाते थे और उन्हें नजर भी नहीं लगती थी किन्तु आजकल आधुनिकता की आँधी में यह प्रथा समाप्त होती जा रही है।
हिन्दू शास्त्रों में शंख की महिमा अपार है, समुद्र मंथन के समय १४ रत्न उत्पन्न हुए थे उसमें एक शंख भी था जो ‘ॐ’ आकार का था जिससे ‘‘ॐ’’ की ध्वनि प्रगट हुयी देव मंदिरों में मठों में भजन मंडलियों में संतों की कुटीर में सभी आनन्द मंगलों के उत्सव में शंख का पवित्र नाद आर्यावर्त के घर-घर में होता रहा है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में भगवान् श्रीकृष्ण ने पांचजन्य नामक शंख को बजाकर युद्ध का उद्घोष किया था।
यूरोपीय विज्ञान वेत्ताओं ने भी अनेक शोधों द्वारा शंख की ध्वनि में मनुष्य के लिए हितकर विद्युत ऊर्जा उत्पादन करने की क्षमता को प्रमाणित किया है।
आयुर्वेद के ग्रंथों में भी शंख की शक्ति का अपूर्व वर्णन है। शंखद्राव के सेवन से गुल्म, ताप, तिल्ली मूत्रकृच्छ्र आदि रोग दूर होते हैं। शंख में पानी या गंगाजल शोधित करके पिलाया जाय तो कीटाणु जनित सब रोग दूर हो जाते हैं।
(साभार – चिकित्सा पल्लव : मई 2020) https://www.facebook. com/share/p/1JyS5dP3ET/

