Homeअध्यात्म गंगा"शिवसंकल्पसूक्त" में छुपे रहस्य और इसका महत्त्व

“शिवसंकल्पसूक्त” में छुपे रहस्य और इसका महत्त्व

शिवसंकल्पसूक्त शुक्ल यजुर्वेद का अंश (अध्याय ३४, मन्त्र १-६) है । इसे शिवसंकल्पोपनिषद् के नाम से भी जाना जाता है । सूक्त में छः ऋचा हैं, जिनमें मन को अपूर्व सामर्थ्यों से युक्त बता कर उसे श्रेष्ठ व कल्याणकारी संकल्पों से युक्त करने की प्रार्थना की गई है । अन्वय के साथ इन मन्त्रों का सरल भावार्थ देते हुए इनकी व्याख्या की गई है ।

संक्षिप्त परिचय: छह ऋचाओं वाला शिवसंकल्पसूक्त शुक्ल यजुर्वेद का अंश (अध्याय ३४, मन्त्र १-६) है । यह छह ऋचा अपनी संरचना और संदेश में इतने सारगर्भित व भावपूरित है कि इन्हें स्वतंत्र रूप से एक उपनिषद् की मान्यता भी दी गई है । इस प्रकार शिवसंकल्पसूक्त को शिवसंकल्पोपनिषद् के नाम से भी जाना जाता है । यहाँ शिव संकल्प से तात्पर्य शुभ संकल्प, श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी संकल्प से है। इन मन्त्रों में मनुष्य को ईश्वर से प्राप्त `मन` नामक दिव्य ऊर्जा के अद्भुत सामर्थ्यों का वर्णन है ।

मन के संबंध में पातंजलि योगसूत्र में लिखा गया है कि प्रत्येक मनुष्य को जिस प्रकार स्थूल अस्तित्व के रूप में देह मिली है, उसी प्रकार सूक्ष्म अस्तित्व के रूप में उसे मन मिला है तथा कारण अस्तित्व के रूप में आत्मा प्राप्त हुई है । दार्शनिकों ने मन को छठी इन्द्रिय कहा है और यह छठी इन्द्रिय अन्य इन्द्रियों से कहीं अधिक प्रचण्ड है । मन इन्द्रियों का प्रकाशक है, ज्योतिस्वरूप है । वैदिक ऋषियों ने मनुष्य के ह्रदय-गुहा में स्थित इस ज्योति को देखा व पहचाना है । श्रद्धेय विनोबा भावे ने अपनी पुस्तक महागुहा में प्रवेश में कहा है:

“मनुष्य के द्वारा जो कुछ होता है, वह मन के द्वारा ही होता है । तो जिसके द्वारा काम होता है, वह एजेंसी अगर बिगड़ी हुई हो, तो सारा काम बिगड़ जायेगा । आंख अच्छी है, लेकिन मन ख़राब है, तो देखने का काम अच्छा नहीं होगा । इस प्रकार यद्यपि कर्म इन्द्रियों द्वारा होता है, तो भी कर्म का अच्छा या बुरा होना मन पर निर्भर करता है । इसलिये अपना मन क्या है, यह देखना, उसका परीक्षण करना बहुत जरुरी है ।”

स्वामी करपात्रीजी महाराज का कथन है:

“स यत्कृतर्भवति तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते”

अर्थात् पुरुष जैसा संकल्प करने लगता है, वैसा ही आचरण करता है और जैसा आचरण करता है, फिर वैसा ही बन जाता है । उनके अनुसार कर्म का आधार मन में उठने वाले विचार है । भारतीय वाङ्गमय में मन एवं उसके निग्रह पर मनीषियों ने बहुत कुछ कहा है ।

शिवसंकल्पसूक्त का संबंध भी मन से है । ईश्वर से की गई अपनी प्रार्थनाओं में वैदिक ऋषि कहते हैं कि वह उन्हें शारीरिक तथा वाचिक ही नहीं अपितु मानसिक पापों से भी दूर रखें । उनके मन में उठने वाले संकल्प सदैव शुभ व श्रेयस्कर हों । मनुष्य का मन अपूर्व क्षमतावान् है, उसमें जो संकल्प जाग जाएं, उनसे उसे विमुख करना बहुत कठिन कार्य है । इसीलिए ऋषि मन को शुभ व श्रेष्ठ संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करत्ते हैं ।

शिवसंकल्पसूक्त

ऋचा १:

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ।

दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

यत् जाग्रतः दूरं उदैति सुप्तस्य तथा एव एति तत् दूरं गमं ज्योतिषां ज्योतिः एकं दैवं तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ

हे परमात्मा ! जागृत अवस्था में जो मन दूर दूर तक चला जाता है और सुप्तावस्था में भी यह मन कहीं और ही दूर दूर चला जाता है, वही मन इन्द्रियों रुपी ज्योतियों की एक मात्र ज्योति है अर्थात् इन्द्रियों को प्रकाशित करने वाली एक ज्योति है अथवा जो मन इन्द्रियों का प्रकाशक है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

व्याख्या:

शिवसंकल्पसूक्त के प्रथम ऋचा में ऋषि कहते हैं कि जागृत अवस्था में मन दूर दूर तक गमन करता है । सदैव गतिशील रहना उसका स्वभाव है और उसकी गति की कोई सीमा भी नहीं है । मन इतनी प्रबल क्षमताओं से युक्त है कि एक स्थान पर स्थित हो कर भी सुदूर क्षितिज के परले पार पहुँच जाता है । वेगवान पदार्थों में वह सबसे अधिक वेगवान है ।

“चन्द्रमाँ मनसो जातः”

यह श्रुतिवाक्य है । उपनिषदों में कहा गया है कि मन ही चन्द्रमा है। मन ही यज्ञ का ब्रह्मा है। मुक्ति भी वही है । यहाँ मन और मन मन में उठे विचारों की अत्यन्त तीव्र और अनन्त गति की ओर संकेत है । मन और मन के विचारों को घनीभूत करके कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। उसे किसी आधार की आवश्यकता नहीं होती। वस्तुतः मन स्थिर होता है जब उसमें विघटन न हो और वह विक्षेप से रहित हो । विषयों से विभ्रांत मन विघटन की स्थिति को प्राप्त होता है । अस्थिर व चंचल मन मनुष्य को मुक्त नहीं होने देता तथा नए नए बंधनों में बांधता चला जाता है । जागृत अवस्था में जीवन-यापन करने के लिए लोक-व्यवहार एवं सांसारिक प्रपंचों में उलझा रहता है, अतः दूर दूर तक निकल जाता है, क्योंकि यही मन तो व्यक्ति को कर्म करने की प्रेरणा देता है ।

गायत्र्युपनिषद् की तृतीय कण्डिका के प्रथम श्लोक में कहा गया है ‘मन एव सविता’ अर्थात् मन ही सविता या प्रेरक तत्व है । मन की ये गतिशीलता सुप्तावस्था में भी दिखाई देती है । सुप्तावस्था में मन के शांत होने के कारण मन को अद्भुत बल मिलता है । कहते हैं कि सोते समय वह अपने सृजनहार से संयुक्त होता है, जो वास्तव में शांति का स्रोत है । श्रद्धेय विनोबा भावे अपनी पुस्तक महागुहा में प्रवेश में कहते हैं कि “… नींद में अनंत के साथ समरसता होती है ।” यहाँ से प्राप्त शांति मनुष्य के आने वाले दिन की यात्रा का पाथेय बनती है ।यही कारण है कि रात्रि में अनिद्रा की स्थिति में रहने वाला व्यक्ति अगले दिन सवेरे उठ कर क्लांत-श्रांत व उद्विग्न-सा अनुभव करता है । परमात्मा से प्राप्त सद्य शांति के अभाव को कोई भी भौतिक साधन पूरा नहीं कर सकता है । यह बात और है कि जाग जाने पर सुप्तावस्था की बातें याद नहीं रहतीं, अनुभूत होती है शांति केवल, क्योंकि वह आध्यात्मिक क्षेत्र से आती है ।

ऋषियों ने परमात्मा से प्रार्थना करते हुए मन को इन्द्रियों का प्रकाशक कहा है

“ज्योतिषां ज्योतिरेकम्”

मन के द्वारा सभी इन्द्रियां अपने अपने विषय का ज्ञान ग्रहण करती है । स्वाद रसना नहीं लेती अपितु मन लेता है, नयनाभिराम दृश्य मन को मनोहर लगते हैं । मन यदि अवसाद से भरा हो तो अमृतवर्षा करती चंद्रकिरणें अग्निवर्षा करती हुईं प्रतीत होती हैं । वाक् इन्द्रिय वही बोलती है व श्रवणेंद्रिय वही सुनती हैं जो मन अभिप्रेरित करता है । यही मन स्पर्शेन्द्रिय से प्राप्त संवेदनों को सुखदुःखात्मक, मृदु-कठोर मनवाता है। सब इन्द्रियां निज निज कार्य करती हैं, किन्तु उनकी अनुभूतियों के ग्रहण में मन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जिसे नकारा नहीं जा सकता । हिंदी साहित्यकार श्री बालकृष्ण भट्ट अपने निबंध मन और नेत्र में मन को सभी इन्द्रियों का प्रभु बताते हैं तथा शास्त्रों से उदाहरण देते हैं:

“मनः कृतं कृतं लोके न शरीरं कृतं कृतं ।”

इसका अर्थ लेखक के अनुसार यह है कि जग में मन द्वारा किया हुआ कृत ही वास्तव में कृत अर्थात् कर्म है, न कि शरीर द्वारा किया हुआ । यह मन जीव का दिव्य माध्यम है, इन्द्रियों का प्रवर्तक है मन को दार्शनिक छठी इन्द्रिय बताते हैं और यह छठी इन्द्रिय अन्य सभी इन्द्रयों से कहीं अधिक प्रचंड है । तात्पर्य यह कि इन्द्रियां, जिन्हें ज्योतियां कह कर पुकारा गया है, उनका प्रकाशक मन ही है । यजुर्वेद के ऋषियों ने मानवमन के भीतर स्थित इस दिव्य-ज्योति को देखा और पहचाना है, अतः उसे ज्योतिषां ज्योतिरेकम् कहते हुए ऋषि प्रार्थना करते हैं कि हे परमात्मा ! ऐसा हमारा मन श्रेष्ठ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

ऋचा २:

येन कर्मण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः ।

यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

येन अपसः मनीषिणः यज्ञे धीराः विदथेषु कर्माणि कृण्वन्ति यत् अपूर्वं प्रजानां अंतः यक्षं तत् मे मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ:

जिस मन से कर्मनिष्ठ एवं स्थिरमना प्रज्ञावान जन यज्ञ आदि कर्म और गंभीर व साहसी लोग विज्ञान आदि से संबद्ध कर्म सम्पादित करते हैं, जो अपूर्व है व सब के अंतःकरण में मिश्रित है अर्थात् मिला हुआ है, विद्यमान है, ऐसा हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

व्याख्या:

शिवसंकल्पसूक्त के दूसरे ऋचा में ऋषिगण सबसे पहले यह बात कहते हैं कि मन से ही यज्ञ आदि कर्मों का सम्पादन होता है । शुद्ध मन ही यज्ञ आदि सत्कार्यों का करने वाला है । यही कारण है कि वैदिक ऋषि ईश्वर का आवाह्न करके उन्हें अपने ह्रदय में प्रविष्ट होने की प्रार्थना करते हैं, जिससे उन्हें दिव्य ऊर्जा प्राप्त हो और वे निष्पाप, निष्कलुष रहें । तैत्तिरीयोपनिषद् के दशम अनुवाक् में कहा गया है कि त्रिशंकु नामक ऋषि ने परमात्मा को प्राप्त होकर अपना अनुभव व्यक्त किया था । त्रिशंकु के वचनानुसार अपने अंतःकरण में परमात्मा की भावना करना भी उसकी प्राप्ति का साधन है । दसवें अनुवाक् में यही बात बताई गई है ।

“अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । उर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणं सवर्चसम् । सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदनुवचनम् ।”

इसका भावार्थ यह है कि मैं ही प्रवाहरूप से अनादिकाल से चलते हुए इस जन्म-मृत्यु रूप संसारवृक्ष का उच्छेद करने वाला हूँ । यह मेरा अंतिम जन्म है और इसके बाद मेरा पुनः जन्म नहीं होने वाला है । मेरी कीर्ति पर्वत-शिखर की भांति उन्नत और विशाल है । अन्नोत्पादक शक्ति से युक्त सूर्य में जैसे उत्तम अमृत का निवास है, उसी प्रकार मैं भी रोग-दोष आदि से पूर्णतया मुक्त हूं, अमृत-स्वरूप हूँ । मैं सुप्रकाशित धन का भंडार हूँ, परमानंद रूप अमृत में निमग्न एवं श्रेष्ठ धारणा युक्त बुद्धि से सम्पन्न हूं । इस प्रकार त्रिशंकु मुनि के यह वचन हैं । तात्पर्य यह कि मनुष्य के संकल्प में यह अपूर्व और अद्भुत शक्ति है कि वह जिस प्रकार की भावना करता है, वैसा ही बन जाता है ।

तैत्तिरीयोपनिषद् के चतुर्थ अनुवाक् में उन मन्त्रों का वर्णन किया गया है, जिनमें कहा गया है कि किस प्रकार अपने मन को अधिकाधिक शुद्ध बनाने के लिए आचार्य को हवन करना चाहिए । एक छोटा-सा उदाहरण प्रस्तुत है ।

“स मा भग प्रविश स्वाहा ।

तस्मिन् सहस्रशाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा।”

अर्थात् इस उद्देश्य से मंत्रोच्चारण कर के स्वाहा शब्द के साथ अग्नि में आहुति डालनी चाहिए कि हे भगवन् ! आपके उस दिव्य रूप में मैं प्रविष्ट हो जाऊं। इसके बाद मंत्रोच्चार कर के स्वाहा शब्द के साथ अग्नि में अगली आहुति डालनी चाहिए इस उद्देश्य के साथ कि आप का दिव्य स्वरूप मुझ में प्रविष्ट हो जाये, मेरे मन में आ जाये। हजार शाखाओं वाले आपके दिव्य रूप में ध्यान-मग्न हो कर मैं स्वयं को परिशुद्ध बना लूं । इस अनुवाक् के अनुसार आचार्य को अपना मन अधिक से अधिक शुद्ध बनाने के हेतु इस प्रकार अग्नि में आहुतियां देते हुए स्वाहा शब्द के उच्चारण के साथ याग-कर्म करना चाहिए । वस्तुतः धीर-गंभीर प्रतिभाशाली लोग विज्ञान आदि के कर्म, नवीन खोजें आदि स्वस्थ और सधे हुए मन से करते हैं । वैदिक विज्ञान एवं वैदिक गणित का ज्ञान आज के युग में भी प्रासंगिक है तथा प्रत्येक युग की चुनौती व कसौटी पर खरा उतरा है । हमारे तत्कालीन ऋषि-मुनियों की खोजों को ही आज नए नाम दे कर, अपने आविष्कार बता कर पुनः संसार के सामने लाया जा रहा है । वे खोजें चाहे चिकित्सा के क्षेत्र की हों या मनोविज्ञान के क्षेत्र की, यान बनाने की कला हो या वास्तु-कला हो, साहित्य, कला, दर्शन, ज्योतिष, गणित आदि सभी क्षेत्रों को हमारे मनीषियों ने समृद्ध किया है । इस मन्त्र के अनुसार ज्ञान-विज्ञानं के ऐसे सभी कर्मों के पीछे मन की दृढ संकल्प-शक्ति वर्तमान होती है, तब ही यह सब संभव होता है ।

शिवसंकल्पसूक्त के दूसरे ऋचा में कहा है कि मन सब के शरीर में विद्यमान है । पातंजलि योगसूत्र के अनुसार सभी को भौतिक अस्तित्व के रूप में शरीर तथा मानसिक अस्तित्व के रूप में मन मिला हुआ है । मन शरीर से सूक्ष्म है । कठोपनिषद् के अनुसार मन इन्द्रियों से परे है, उनसे उत्कृष्ट है:

“इन्द्रियेभ्यः परं मनः ।”

इस मन्त्र में यह बात कही गई है कि सभी श्रेष्ठ कर्मों को इसी मन की स्वस्थ व शुद्ध अवस्था में किया जा सकता है । यही मन गृहस्थ को कर्मठ बनाता है एवं उसे नीति से जीविकोपार्जन की बुद्धि देता है । सन्यासी को भी यही मन विषयों से विमुख रखता है, जिससे वह सद्चिन्तन में रत रहे, विकारों की उत्पत्ति एवं उपद्रव से वह बचा रहे । तब ही सन्यासी तपस्या, संध्या, पूजा आदि सत्कर्मों का करने वाला बन सकता है । यजुर्वेद में मन के नियंत्रक देवता को मनस्पत: कहा गया है । मन की शुद्ध व शांत स्थिति ही स्वस्थ चिंतन एवं नवोन्मेष के हेतु नवीन क्षितिजों का उद्घाटन करती है । समस्त समाज के लिए सबसे पहले मन का निर्विकार होना आवश्यक है । अतः ऋषि परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हमारा मन शुभ-कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

ऋचा ३:

यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु ।

यस्मान्न ऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

यत् प्रज्ञानं चेतः उत धृति च यत् प्रजासु अन्तः अमृतं ज्योतिः यस्मात् ऋते किंचन कर्म न क्रियते तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ:

जो मन प्रखर ज्ञान से संपन्न, चेतना से युक्त्त एवं धैर्यशील है, जो सभी प्राणियों के अंतःकरण में अमर प्रकाश-ज्योति के रूप में स्थित है, जिसके बिना किसी भी कर्म को करना संभव नहीं, ऐसा हमारा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो !

व्याख्या:

शिवसंकल्पसूक्त के तृतीय ऋचा में ऋषियों का कथन है कि मन प्रखर ज्ञान से संपन्न है । वस्तुतः वह मन ही है जो लौकिक व अलौकिक बातों का ज्ञान रखता है, ग्राह्य व त्याज्य का निर्णय लेता है । स्वस्थ मन ही ईश्वर से असदो मा सद्गमय मृत्योर्मा अमृतगमय की प्रार्थना करता है । वैदिक ऋषि मन्त्रों के द्रष्टा होते थे । प. श्रीराम शर्मा आचार्य का कथन है कि “प्रत्येक पदार्थ और विधान के जड़ तथा चेतन दो विभाग होते हैं । आत्मज्ञानी पुरुष मुख्यतः प्रत्येक पदार्थ में चेतन शक्ति को ही देखता है, क्योंकि वास्तविक कार्य और प्रभाव उसीका होता है।” उनके अनुसार फलतः वैदिक ऋषि वेद के मन्त्रों एवं उनकी शक्ति को चेतना से अनुप्राणित मानते थे तथा प्रकृति की संचालक शक्तियों को देवता मान कर उनसे प्रार्थना करते थे, उनकी स्तुति करते थे । यह उनका अंधविश्वास नहीं उनका उत्कृष्ट कोटि का ज्ञान था, जो जड़ में अवस्थित चेतन के दर्शन कर लेता था । सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थ की मूलभूत शक्ति व उनके कार्योंके वैज्ञानिक रहस्य इन ऋषियों के ज्ञानचक्षुओं के आगे प्रकट होते थे । उन्होंने स्तुति प्राकृत शक्तियों के स्थूल रूप की नहीं अपितु उनकी शासक अथवा अहिष्ठात्री चेतन शक्ति की है । वेदों में आध्यात्मिक विषयों का और अथर्ववेद में विविध प्रकार की व्याधियों के निवारण के उपाय, औषधियों और मन्त्र-तंत्र का विधान है और इन सबको इसमें देवता माना गया है । इनके मन्त्र गूढ़ार्थ लिए हुए होते हैं । बिना आत्मज्ञान के इन्हें हृदयंगम नहीं किया जा सकता ।

वस्तुतः पदार्थ में निहित चेतन शक्ति उन्हीं के सम्मुख सक्रिय होती है जो निर्मल मन से पूरी तरह निजी स्वार्थ से या अन्य मनोविकार से अलिप्त रहते हैं तथा जो आत्मवत् सर्वभूतेषु के भाव से सब में एक ही चैतन्य शक्ति के दर्शन करते हैं । ऐसे महान ऋषियों के आश्रम के निकट रहने-बसने वाले, वहां घूमने वाले हिंस्र पशु भी अहिंसक हो जाते थे । वैदिक ऋषि जानते थे कि शरीर की शक्ति से मन की शक्ति अनेक गुनी अधिक है । यही कारण है कि इस मन्त्र में मन को प्रखर ज्ञान, चेतना व धृति से युक्त कहा गया है । धृति का अर्थ केवल धैर्य ही नहीं अपितु स्थैर्य भी है । इस शब्द में स्फूर्ति, दृढ संकल्प, साहस तथा सहारा देने के भाव भी समाहित हैं । अतएव इसका संकुंचित अर्थ न लेकर इसे विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखना अपेक्षणीय है । आगे इस मंत्र में कहा गया है कि यह मन सब में अमर-ज्योति के रूप में स्थित है । यह चेतना ऋषियों ने सभी में पायी है। यही कारण है कि जगत के सर्वप्रथम आदि कवि वाल्मीकि एक दुर्दांत डाकू से मुनि बन गए, महामूर्ख कालिदास महाकवि के रूप में उभर कर आये । यह चेतना मनुष्य के भीतर निहित वह अमर ज्योति है जिसके बिना कुछ भी कर पाना सम्भव नहीं है । ज्ञान जो सब के भीतर ढंका हुआ है, वह मन के द्वारा प्रकशित किये जाने के कारण मन को अमर-ज्योति कहा है । सब के अंतःकरण में जलती हुई भी यह ज्योति केवल वहीँ अपना आलोक बिखेर सकती है, जहाँ मन मल से रहित हो, अमल हो, निर्मल हो । रामचरितमानस में श्रीराम विभीषण से ये कहते हैं कि

“निर्मल मन जान सो मोहि पावा ।

मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।”

गोस्वामीजी मानस में जानकीजी से निर्मल मति प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं ।

“जनकसुता जगजननी जानकी ।

अतिसय प्रिय करुणानिधान की ।।

ताके जुग पदकमल मनावउं ।

जासु कृपा निर्मल मति पावउँ ।।”

इस प्रकार मन की पावनता और निर्मलता पर बल दिया गया है भारतीय संस्कृति में सर्वत्र । क्योंकि यह प्रकृष्ट ज्ञान का साधन है । ऋषि कहते हैं की ऐसा हमारा मन श्रेष्ठ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो !

ऋचा ४:

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम् ।

येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

येन अमृतेन इदं भूतं भुवनं भविष्यत् सर्वं परिगृहीतं येन सप्तहोता यज्ञः तायते तत् मे मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ:

जिस सनातन मन से भूत, भविष्य व वर्त्तमान- तीनों कालों का प्रत्यक्षीकरण होता है, जिसके द्वारा सप्त होतागण यज्ञ का विस्तार करते हैं, ऐसा हमारा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो !

व्याख्या:

शिवसंकल्पसूक्त के चतुर्थ ऋचा के अनुसार मन में सभी कालों का ज्ञान निहित है । मन को वश में किये हुए मनस्वी, योगी जब अहम् भाव से मुक्त हो जाते हैं तो ज्ञान की समस्त थाती को निज अंतःकरण में पा लेते हैं । मन वस्तुतः अंतःकरण की ही एक वृत्ति है । अपनी वृत्तियों के कारण अंतःकरण मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार- इन चार नामों से कहा जाता है । अंतःकरण अपनी वृत्तियों के आधार पर चार तरह का हो जाता है । इन्हें अन्त:करण चतुष्टय कहते हैं । संकल्प-विकल्प मन में उठते हैं । “मनस्यति अनेन इति मनः” अर्थात् साधक मन और इन्द्रियों को वश में करके आतंरिक उत्थान में उन्हें लगा कर आध्यात्मिक उन्नति करता है, एवं विराट चेतना अर्थात् परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ता है । किन्तु यह सब मन की विशुद्ध अवस्था पर निर्भर करता है । मन के द्वारा ही समय को, तीनों कालों को जाना जाता है । इस मन के भीतर ही मनुष्य के जन्मजन्मांतर का ज्ञान निहित है । साधक अपनी साधना की उन्नत अवस्था में अपने अतीत एव भावी को जानने में समर्थ होता है । मन को वशवर्त्ती करने वाला योगी तीनों कालों में होने वाली घटनाओं को अनुभूत करने में सक्षम होता है । किन्तु इस ज्ञान से वे आसक्त न होकर इसके प्रति उदासीन रहते हैं । अपने मन में स्थित विश्व-कल्याण की भावना व चिंतन के कारण वे निरुद्देश्य और निरर्थक अपने ज्ञान का, अपनी ऊर्जा, अपने समय का अपव्यय नहीं करते है । अपितु विश्व-कल्याण के कार्यों को सम्पादित करते हुए उनका विस्तार करते हैं ।

प्रस्तुत ऋचा में आगे कहा है कि इस मन से ही सप्तहोता यज्ञ का विस्तार करते हैं । यज्ञों का विस्तार, शुभ कर्मों का प्रसार, शुद्ध तथा पापरहित मन वाले व्यक्तियों द्वारा ही किया जाता है । ऐसे सत्पुरुष न केवल शुभ संकल्प ही करते हैं, अपितु शीघ्रातिशीघ्र उन्हें पूर्ण करने के साधन भी करते हैं, जैसे शास्त्रों में वर्णित एक कथानुसार राजा निमि के मन में यज्ञ करवाने के संकल्प के उठने पर उनका ऋषि वशिष्ठ से ऋत्विज बनने का निवेदन करना । ऋषि वशिष्ठ उस समय देवराज इंद्र का यज्ञ करावा रहे थे, जिससे उन्होंने कहा कि वे उस यज्ञ के पूर्ण होने के पश्चात् ही आ सकते हैं, जिसमें वर्ष से अधिक समय लग सकता है । महाराज निमि उत्कंठित हो गए और जीवन की क्षणभंगुरता ने प्रश्न उठा दिया कि क्या पता, जब तक इंद्र का यज्ञ पूर्ण हो, हमारे प्रयाण का समय आ जाये । शुभस्यशीघ्रम् सोचते हुए महाराज निमि ने तब गौतम ऋषि से सब वृतांत निवेदन किया, जिसे ऋषि ने मान लिया । यज्ञ का शुभारम्भ किया गया तथा सप्त ज्वालाओं से यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित हो उठी । अग्निपुराण के अनुसार अग्निदेव सात जिह्वाओं से युक्त हैं – कराली, धूमिनि, श्वेता, लोहिता, नीललोहिता, सुवर्ण तथा पद्मरागा । यह सातों अग्नि की सात ज्वालाएँ हैं ।

श्रीविष्णुपुराण के तृतीय अंश व दूसरे अध्याय में लिखा है कि प्रत्येक चतुर्युग के अंत में वेदों का लोप होता है, तथा उस समय सप्तर्षिगण स्वर्गलोक से पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर उनका प्रचार करते हैं । वेदों का ज्ञान यज्ञ-संस्कृति का पोषक है । इस प्रकार वे सप्तऋषि यज्ञकर्मों का विस्तार करते हैं । ज्ञान अथवा ईश्वर का प्रवेश होता ही शुद्ध अंतःकरण में है । गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस में राम यही बात कहते हैं:

“निर्मल मन जन सो मोहि पावा ।

मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।”

यही कारण है कि वे जनकसुता जगजननी जानकी से निर्मल मति पावउं की विनती करते हैं । यज्ञ करने वाले होता या ऋत्विज वही होते हैं, जो पाप से रहित हों, विशुद्ध चित्तवाले हों । इस मन्त्र में कहा गया है कि जिस मन से सप्तहोता यज्ञों का विस्तार करते हैं, हमारे ऐसे उस मन में सदा कल्याणकारी संकल्पों का उदय हो । होता अर्थात् यज्ञ का पुरोहित । भारतीय संस्कृति में सभी संस्कारों के साथ हवन, होम, अग्निहोत्र अथवा यज्ञ की परम्परा जुडी हुई है । यह वैदिक कृत्य है, जिसमें यज्ञ की व्यवस्था करने वाला, व्ययभार उठाने वाला यजमान कहलाता है तथा यज्ञ कराने वाला पुरोहित या ऋत्विज् कहलाता है । शतपथ ब्राह्मण में यज्ञ को देवों की आत्मा कहा गया है:

“यज्ञो वै देवानामात्मा”

और साथ ही श्रेष्ठतम कर्म को भी यज्ञ की संज्ञा दी है:

“यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म”

यज्ञ के मुख्य चार ऋत्विज होते हैं — ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता और उद्गाता । प्रचलित अर्थ में यज्ञ कराने वाले पुरोहित को भी होता कहा जाता है । इस मन्त्र के अनुसार होतागण यज्ञ का विस्तार करते हैं । विस्तार से तात्पर्य कार्य आगे बढ़ाने से है, प्रचार-प्रसार करने से है । होतागण यज्ञ का विस्तार करके, यज्ञ-संस्कृति को समृद्ध करते हैं समृद्धि आतंरिक और बाह्य दोनों प्रकार की होती है । दोनों प्रकार से समृद्ध होकर ही व्यक्ति समृद्धिवान बनता है । इसी को धन की देवी लक्ष्मी का श्री रूप में आना कहते हैं । लक्ष्मी यदि केवल संपत्ति रूप में आये, तो वह केवल क्षणिक सुखों की अतिशयता की देने वाली होती है, वही जब श्री रूप में आती है तो परमपद -प्राप्ति के द्वार भी खुलते हैं, व्यक्ति सद्गुणों से संवलित होकर सत्कर्म, यज्ञकर्म आदि में स्वयं को नियोजित करता है । परिवार से लेकर विश्व-परिवार तक सभी संघटन यज्ञ हैं । केवल अगिहोत्र करना ही यज्ञ नहीं है । परम चैतन्य व उसके अंश रूप मनुष्य की सेवा करना यज्ञ है, धर्म व समाज का उत्थान करना, मानवीय मूल्यों की रक्षा करना यज्ञ है । वेद ने इस सृष्टि को यज्ञमय कहा है ।

“सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनम्”

अर्थात् हमारा मन सभी संकल्पों का अयन (आश्रय) है । अतः ऋषि परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हमारा मन श्रेष्ठ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ।

ऋचा ५:

यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः ।

यस्मिंश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

अन्वय

यस्मिन् ऋचः यस्मिन् सामः यजूंषि रथानाभौ अराः इव प्रतिष्ठिता यस्मिन् प्रजानां सर्वं चित्तं ओतं तत् में मनः शिवसंकल्पं अस्तु ।

सरल भावार्थ:

हे परमात्मा ! जिस मन में वैदिक ऋचाएं समाई हुई हैं, जिसमें साम और यजुर्वेद के मन्त्र ऐसे प्रतिष्ठित हैं, जैसे रथ के पहिये में `अरे` स्थित होते हैं (लगे होते हैं) तथा जिस मन में प्रजाजनों का सकल ज्ञान समाहित है, ऐसा हमारा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो ।

व्याख्या:

शिवसंकल्पसूक्त के पंचम ऋचा में वैदिक ऋषि परमात्मा के सम्मुख मन की शुद्धि की व मन को प्रबलता प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं । मन को श्रेष्ठ संकल्पों से युक्त करने की विनय करते हुए ऋषि यह कहते हैं कि संपूर्ण वेदराशि मन में ही छिपी हुई है । इस मन में तीनों वेदों का अपार-अमाप ज्ञान निहित है । लेकिन भय इस बात का है कि अशुभ विचार भी जाने-अनजाने इस मन में आ जाते हैं । ऋषि मन को दृढ़ व साहसपूर्ण बनाना चाहते हैं ताकि वे अपने परम कर्त्तव्य को कर सके, कठिन तप और साधना में तत्पर रह सकें । उनके द्वारा मनुष्य का हित संपादित हो । मन में उठने वाले अच्छे-बुरे संकल्प कर्मों को प्रभावित करते हैं । ऋषियों के अनुसार मन में ऋग्वेद की ऋचाएं निहित हैं अर्थात् समाई हुई हैं, इसी में सामवेद तथा यजुर्वेद के मन्त्र प्रतिष्ठित हैं । वेदों का समस्त ज्ञान मन के भीतर ही समाविष्ट है और वह भी कुछ इस तरह जैसे रथ के पहिये में अरे लगे होते हैं ।

उपर्युक्त ऋचा में ऋषिगण पहली बात यह कहते हैं कि मन ही में वेदों की ऋचाएं एवं मंत्र समाहित है । तात्पर्य यह कि मनुष्य को शुद्ध मन परमात्मा से प्राप्त हुआ है, क्योंकि विशुद्ध ज्ञान केवल विशुद्ध मन ही में स्थित हो सकता है, विकारयुक्त मन में नहीं । मन में विकारों के आ जाने पर तमस का आवरण उसे आच्छादित कर देता है, फलतः अज्ञान से ज्ञान व उसका आलोक ढँक जाता है । मन में विकार का कारण है मलिन विचार, क्योंकि व्यक्ति जैसा चिंतन करता है, वह वैसा ही आचरण भी करने लगता है । गीता में श्रीकृष्ण का कहना है कि विषयभोगों का रागपूर्वक चिंतन करने से इन विषयों में आसक्ति उत्पन्न हो जाती है:

“ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते”

–गीता २/५९

इसलिए आध्यात्मिक जीवन में विचार और चिन्तन की शुचिता पर विशेष बल दिया जाता है । निर्मल-निर्विकार मन में ईश्वर प्रदत्त प्रेरणा अविलम्ब स्फुरित होती हैं, व्यक्ति को प्रश्नों के उत्तर, समस्याओं के समाधान, निराकरण स्वयमेव आश्चर्यजनक रूप से लब्ध होते हैं । वस्तुतः ज्ञान हमारे भीतर ही निहित है और यह ज्ञान सार्वकालिक, सार्वभौमिक है, इसीलिए मन्त्र में कहा है कि मन में वैदिक ऋचाएं प्रतिष्ठित हैं, सामवेद व यजुर्वेद के मन्त्र समाहित हैं । वेदों में प्रदत्त ज्ञान कालजयी है । वह किसी देश-काल की सीमा में बंधा हुआ नहीं है, प्रत्युत् कालातीत और सीमातीत है जो प्रत्येक युग की कसौटी पर खरा उतरता है, प्रासंगिक है, मानव-सभ्यता की आधारशिला है । व्यक्ति विश्व के किसी भी भाग में हो, युग चाहे कोई भी, लेकिन वेद मन्त्रों के भीतर उसके प्रश्नों के निराकरण मिलते हैं । फिर प्रश्न या समस्याएं वैयक्तिक (व्यक्तिगत) हों, पारिवारिक हों या सामाजिक या चाहे वैश्विक स्तर की हों, भौतिक हों या आध्यात्मिक इन सभी के समाधान और उसके लिए उपयोगी साधन इन वेद-मन्त्रों में मिलते हैं । वेद ब्रह्मवाणी हैं । वेदों में वैदिक ऋषियों का अनुभूतिजन्य तत्व-दर्शन सन्निहित है । छल-कपट रहित, निष्पाप, संयत आत्मा वाले ऋषिगण दिव्य-दृष्टि रखते थे, जो उन्होंने दुःसह, कठोर तपश्चर्या के फलस्वरूप पाई थी । इस प्रकार शुद्ध मन वाले वे प्राणियों के हित-सम्पादन में रत रहते थे तथा स्वयं भी मुक्ति के अधिकारी बने । गीता (अध्याय ५) में भी लिखा है –

“लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।

छिन्नद्वैधा यतात्मनः सर्वभूतहिते रताः ।। २५ ।।”

अर्थात् नष्टपाप, छिन्नसंशय, सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत तथा जीते हुए मन-इन्द्रियों वाले विवेकी साधक ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होते हैं ।

पांचवें मन्त्र में यह भी कहा गया है कि जिस प्रकार रथ के चक्र की नाभि में `अरे` लगे होते हैं, उसी प्रकार वेदों का ज्ञान मन में इस प्रकार प्रतिष्ठित है । रथ के चक में नाभि होती है, उसमें अरे लगे होते हैं । वैदिक ऋषियों को रथ-चक्र की नाभि में स्थित अरों का उपमान बहुत प्रिय था और अनेक स्थलों पर उनके द्वारा इसका प्रयोग देखने को मिलता है । प्रश्नोपनिषद से एक उदाहरण द्रष्टव्य है-

” अरा इव रथानाभौ प्राणी सर्वं प्रतिष्ठितम् । ऋचोयंजूषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ।”

अर्थात् जैसे रथ की नाभि में अरे लगे होते हैं, वैसे ही प्राण में ऋचाएं, यजु, सामगीत, यज्ञ, शक्ति और ज्ञान सभी निहित है । इस मन्त्र में मन के सामर्थ्य को दर्शाने हेतु इस उपमान को दिया गया है, जिससे अभिप्राय यह है कि रथ के पहिये में लगे रहने वाले अरे जैसे पहिये के मध्यस्थ नाभि में प्रविष्ट रहते हैं, वैसे ही ऋचाएं, यजुर्वेद के मन्त्र व सामगीत सब मन में प्रविष्ट रहते हैं । आगे कहा है कि प्रजाजनों का समस्त ज्ञान भी इस मन में प्रतिष्ठित रहता है । प्रकारांतर से मन सम्पूर्ण ज्ञान अपने भीतर समाहित किये हुए है । किन्तु उस ज्ञान के सकारात्मक उपयोग से ही विश्व-कल्याण संभव हो सकता है । संहारक शस्त्रों की खोज करने वाले, बमों और मानव बमों द्वारा विनाश की विभीषिका से विश्व को दहला देने वाले लोगों के पास भी जानकारियों की कमी नहीं है, कमी है तो शुभ भावों व कल्याण-कामना की ।ऐसे लोग अपने विनाशक संकल्पों से मानवता को केवल हानि ही पहुंचाते रहे हैं। अतः ऋषि प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे परमात्मा ! हमारा मन श्रेष्ठ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो ।

साभार- https://www.facebook.com/share/14Soj9K6Dtp/ से

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